दिन में क्रांतिकारी और रात में रंगदारी के कारण खस-गोर्खाली मालामाल और मधेशी कंगाल होने लगे हैं

गोपाल ठाकुर, कचोर्वा-१, बारा, जनवरी १४, २०१६
पिछले अगस्त १५ से जारी मधेश बंद और सितंबर २४ से जारी नेपाल-भारत सीमा नाकाबंदी से तबाही की खबरें निरंतर संप्रेषित होती आई हैं । मधेश बंद के दौरान पिछली कोइराला सरकार ने दर्जनों मधेशियों की हत्या करवाई । निहत्थे मधेशी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान मौत के घाट उतार दिये गये । इन नृशंस हत्याओं के पिछे सिर्फ एक ही उद्देश्य था, तथाकथित जनप्रतिनिधियों का हवाला देकर फर्जी संविधान सभा से मधेश सहित की उत्पीड़ित राष्ट्रियताओं के विरोध में सातवाँ संविधान जारी करना । हुआ भी वही, खस-गोर्खाली साम्राज्यवादियों ने मधेश सहित के अपने उपनिवेशों को सदा सर्वदा गुलाम बनाने की मानसिकता से पिछले सितंबर २० को वह संविधान जारी कर ही डाला । इसके बाद संयुक्त लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा ने नाकाबंदी का सहारा लिया । मधेश आम हड़ताल को सैन्य बल के जरिए निस्प्रभावी बनाने के सारे टिकड़म गर्त में मिले । राजधानी घाटी काठमांडू सहित के पहाड़ी जनजीवन में कोहराम मच गया । नाकाबंदी को भारत के शर मढ़ने के भी सारे कुकर्म किये गये । यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ को भी इस घिनौना खेल में घसीटा गया । फिर भी नाकाबंदी प्रभावी रही और साम्राज्यवादियों का जीवन दुरुह बनता जा रहा था ।

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किंतु सत्तालिप्सा में मोर्चा के नेताओं की जीभ से लार टपकना बंद नहीं हुआ । इसलिए जिस सदन को संविधान निर्माण प्रक्रिया में वे बहिष्कृत कर दिये थे, चल दिये प्रधानमंत्री का चुनाव करने उसी व्यवस्थापिका-संसद में अक्तुबर ११ को । यह उनका अक्षम्य अपराध रहा । उनका सब से बड़ा दिवालियापन रहा । किसी ने केपी ओली को वोट दिया तो किसी ने सुशील कोइराला को । बस, क्या था ! वहीं से इनकी औकात फिरंगी खस-गोर्खालियों तौल ली ‌और इन्हें अपनी औकात पर खड़ी करने लगी मधेशी जनता ने भी । एक ओर खस-गोर्खाली फिरंगियों ने वार्ता के नाटक में इन्हें उलझाये रखा तो दूसरी ओर मधेशी जनता भी निराश होने लगी । महीनों लगाकर पचीसो बार वार्ता का नाटक हुआ ‌किंतु अब तक विषय प्रवेश भी नहीं हो पाया । परिणाम यह हुआ कि जितनी भी कोशिस के बाद रक्सौल-वीरगंज नाका के अलावा अन्य किसी भी नाका को बंद नहीं किया जा सका ।
दूसरी ओर धानचोर ओली ने तस्करों का अपने प्रशासकों के जरिए स्वाभिमान बढ़ाना सुरू किया । तस्करी पर राज्य चलने लगा । ऊधर चीन से भी इंधन लाने का उपक्रम शुरू हुआ तो शुरू हुआ भारत से संबंध सुधारने का नाटक भी । अभी कहा जाने लगा है कि भारत के साथ इनका संबंध सुधरता जा रहा है । हकिकत तो यह है कि भारत के साथ इनका संबंध अच्छा-बुरा जहाँ था अब भी वहीं है । केवल उतार-चढ़ाव आया है तो मधेश बंद और नाकाबंदी के प्रभाव में । मोर्चा के नेताओं के दोहरे मापदंड ने भी कल-कारखाना, सवारी साधन ‌चलवाकर इंधन आपूर्ति में तस्करी को भी बढ़ावा दिया है । अब तक मधेश बंद औपचारिक रूप से किसी ने वापस नहीं लिया है, किंतु अब तो लंबी और छोटी दूरी की सभी सवारी साधनें चलने लगे हैं । वीरगंज के अलावा छोटे नाके सभी खुल गये हैं । जहाँ नहीं खुले हैं, वहाँ भी दिन में क्रांतिकारी और रात में रंगदारी आचरण खुलेयाम दिख रहे हैं । फलतः खस-गोर्खाली फिरंगी मालामाल हुए हैं तो स्वयं मधेशी लोग ही कंगाल होने लगे हैं । एक तरफ सिंचाई आदि कृषि कार्य के लिए डिजल, निजी सवारी साधनों के लिए पेट्रॉल, रसोईघर के लिए गैस दुर्लभ है तो कालाबाजारी के बल पर इन फिरंगियों के लिए सबकुछ सुलभ है । अब अगर कुछ बंद रह गई है तो केवल वीरगंज सीमाशुल्क कार्यालय में दाखिला प्रक्रिया ।
किंतु जिस तरह से मधेश बंद और आम हड़ताल निस्प्रभावी होकर जनजीवन सामान्य हो गया है बिना किसी सूचना के, उसी तरह वीरगंज की नाकाबंदी भी निस्प्रभावी बनने में अब अधिक देरी होने के आसार नहीं । ऐसा हुआ या हो रहा है क्यों ? इससे फायदा किसे ? इससे तबाह कौन ?
निश्चित है बिना उद्देश्य का प्रहार लक्ष्यबिहीन होता है । वही हुआ इस तिसरे मधेश आंदोलन के साथ । सबसे पहला अपराध पिछले मधेश आंदोलनों से स्थापित राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार सहित के समग्र मधेश एक प्रदेश के मुद्दा से पश्चगमन, दूसरा अपराध समझौताहीन संघर्ष से धोखाधड़ी, तिसरा अपराध सत्ता और संघर्ष के बीच आँख-मिचौली, चौथा अपराध मोर्चाबंदी में वैमनस्यता और पाँचवाँ अपराध आंदोलन से मधेश मुक्ति के बजाय मधेश मसीहा बनने का होड़ ।
अतः इन अक्षम्य अपराधों के बीच जारी मधेश आंदोलन से भौतिक रूप से क्षति हुई है मधेश को ही । सबसे अधिक धोखाधड़ी तो मधेश के साथ यह हुई है कि पाँच महीना मधेश आंदोलन चलाकर तीन महीना के जाली तमसुक पर लेनदेन होना करीब सुनिश्चित सा हो गया है । अब मधेशी जनता इन मोर्चा के धोखेबाज नेताओं से कुछ सवाल जरूर पुछेगी । अगर तीन महीना की शर्तबंदी विश्वसनीय है तो संविधान में लिखकर भी मधेश को अधिकार क्यों नहीं मिले ? फिर पाँच महीना तक आंदोलन चलाकर तीन महीना की शर्तबंदी क्यों ? क्या पचासों की शहादत की भरपाई इस जाली तमसुक से की जा सकती है ? अगर इन सवालों के सही जवाब खोजे जायें तो सब से पहले अब किसी न किसी रूप में इन मोर्चा या गठबंधन के नेतृत्व को भी सबक सिखाना जरूरी होगा । क्योंकि ये न आंदोलन छोड़ना चाहते हैं न ठीक से चलाना चाहते हैं । इनका मूलमंत्र ये है कि किसी तरह अगले चुनाव तक मधेश को उलझाये रखें ‌और इन्हीं मुद्दों के बल पर पुनः अपना बर्चश्व बनावें जिसके बल पर पुनः इन्हें पहली संविधान सभा की भाँति चाँदी काटने को मिले ।
किंतु संसार में विकल्पविहीन कुछ भी नहीं होता । इनका भी विकल्प है । अब जरूरत है आंदोलनों में दिखी कमी-कमजोरी को सहेजते हुए आंदोलन को नये सिरे से पुनः ऊपर उठाना होगा । यह आंदोलन सशक्त हो, समझौताहीन हो, राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार ‌सहित समग्र मधेश एक प्रदेश के लिए हो, पूर्ण समानुपातिक प्रतिनिधित्व, सर्वत्र समान मताधिकार, पूर्ण धर्मनिरपेक्षता और मधेश में आप्रवासन पर पूर्ण बंदेज के लिए हो । साथ ही अगर संघीयता के लिए खस-साम्राज्यवादी नहीं मानता तो यह संघर्ष स्वाधीनता के लिए भी हो ।

 

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