दिल्ली है दिलवालों की !
मुकुन्द अचार्य

जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है !मर्दा दिल क्या खाक जीते हैं !!
कीन मानिए, दिल्ली दिलवालों की है। हमारे जैसे मनचले लोग भी कभी कभार दिल्ली के दर्शन कर लेते हें। फिर जिन्दादिली न हो तो जिन्दगी का क्या मजा ! वैसे दिल्ली तो मैं बहुतों बार हो आया हूँ, मगर दूसरे के सर पर नारिवल फोडÞकर खाने को मिले तो नारिवल का स्वाद और लजीज हो जाता है। उसका मजा ही कुछ और होता है। कभी खा कर देखीए न !
बी.पी. कोईराला इण्डिया-नेपाल फाउण्डेशन, नेपाल राजदूतावास नई दिल्ली एवं कविमंच को न जाने क्या सूझा। भारत-नेपाल हास्य कवि सम्मेलन कराने का फितूर उनके दिमाग में कैसे आया। नेपाल से पाँच कवियों को हाँककर दिल्ली की गरम भट्टी में झोंकने के लिए एक जाना-सुुना और हिमालिनी में बहुतों बार पढÞा हुआ नाम, रुचि सिंह एक महिला व्यक्तित्व को मुस्तैदी के साथ भेजा गया था। कवियों को हाँकर लेजाने वाली मोहतरमा को आप आदर के साथ ‘कोअर्डिनेटर’ भी कह सकते हैं।
श्रीमती रुचि सिंह के नेतृत्व में गत ११ जून सोमबार के रोज हम पाँच साहित्यकार-पत्रकार एयर इंडिया के एयर बस में सवार हुए ! नेपाल के अन्तर्रर्ाा्रीय त्रिभुवन विमान स्थल में मेरी और मित्र गोपाल अश्क की लापरवाही ने अच्छा गुल खिलाया। कुछ देर के लिए सभी घबडाए, मगर इन्तजारी की बोरियत किसी को झेलनी नहीं पडÞी। मुझे अपनी गल्ती का एहसास हुआ। आइन्दा वैसी गल्ती फिर न हो यह सबक सीखने को मिला। हम दोनों ने अपनी-अपनी नागरिकता का प्रमाणपत्र घर में छोडÞकर ‘निरंकुशाः कवयः’ को र्सार्थकता प्रदान की। साहित्यकार वास्तव में आजाद-मिजाज के होते ही हैं। और अपनी कमी कमजोरी को लच्छेदार शब्दों में छुपाना भी वे अच्छी तरह जानते हैं। मैं वेवकुफ तो इस कला में भी कुछ कमजोर ही हूँ।
खैर, राम-राम कहते हुए आराम से एयर इण्डिया के विशाल जहाज के अन्दर प्रवेश किया। जैसे सुरसा के मुँह में हनुमान जी घुसे थे। जीवन के सत्तर के दशक में बडेÞ जहाज में बडेÞ मजे ले रहा था। शानदार भोजन पर हाथ साफ किया गया। अन्य तीन सहयात्री दोस्त थे, राजेश्वर नेपाली, सीताराम अग्रहरि और ज्ञानुवाकर पौडेल। सब के अपने-अपने निराले ठाट थे। लगता था, हम किसी शादी में बाराती बन कर जा रहे हैं। सभी के चेहरे से, बातों से, हावभाव कटाक्ष से हर्षोंन्माद की लहरे छा रही थीं।
तकरीबन डेढ घंटे का सुहाना सफर पलक झपकते ही गुजर गया। दिल्ली इन्दिरा गान्धी अन्तर्रर्ाा्रीय विमान स्थल की भव्यता देखते ही बनती थी। वहाँ पहुँचते ही पता चला गर्मी किसे कहते हैं। दिल्ली में जून की गर्मी। सारे लोगों को परेशान करते हुए गर्मी अपनी पूरी जवानी में इठला रही थी। बल खा रही थी। पसीने से नहा रहे थे, हम सब !
करोल बाग के होटेल अमन पैलेस में हमारा संक्षिप्त स्वागत हुआ और हम ऐसी रुम में ठहराए गए, जहाँ गर्मी का प्रवेश निषेध था। दिल्ली में गर्मी को ठेंगा दिखाते हुए हम लोग नेपाली राजदूतावास के आधिकारियो से मिले, एक कमसीन लडÞकी की चित्रकला का रसास्वादन किया। हमारे दूतावास ने कवि मण्डली को उतना भाव तो नहीं दिया मगर हमारे कवि सम्मेलन में दूतावास सपरिवार हमारी हौसला अफजाई के लिए मौजूद था। खैर भागते भूत की लंगोटी भली !
सचमुच दिल्ली दिलवालों की है। उस झुलसाती गर्मी में भी १२ जून की शाम को बंग संस्कृति भवन, नई दिल्ली में कवि सम्मेलन सम्पन्न हुआ। उस में नेपाल की ओर से पाँच और मित्र देश भारत के पाँच कवियों ने मंच पर कविता को साकार उतरने पर मजबूर किया। भारतीय कवियों में र्सव श्री वेद प्रकाश, जैनेन्द्र कर्दम, सत्यदेव हरियाणवी, एक सुन्दर सी कवियित्री और एक जैन बन्धु थे। सुन्दर सी कवियित्री ने सुन्दर सी हास्य व्यंग्य कविता सुनाकर सब को मोह लिया। उसी रात को उन्हें अमेरिका उडÞ जाना था। हम बहुत देर तक उनका सौर्न्दर्य और साहचर्य से खुद को लाभान्वित नहीं कर पाये। बहुत सारे श्रोता असमंजस में रह गए, कविता सुन्दर थी या कवयित्री ! कवि मंच की संयोजिका गायत्री वाशिष्ठ की रुचि और हम पाँच नेपाली कवियों को हाँक कर लेजानेवाली रुचि सिंह की रुचि को दाद तो देनी ही होगी, साथ में खाज खुजली और दिनाय भी देने को जी चाहता है।
हमारे नेपाली कवियों ने भी अपने-अपने साहित्यिक करतब दिखाए। भारतीय कविगण विशुद्ध व्यावसायिक लग रहे थे और नेपाली कवि अपनी क्षमता का पर्ूण्ा पर््रदर्शन विशुद्ध कवि के रुप में कर रहे थे। मित्र गोपाल अश्क और ज्ञानुवाकर जी ने गजल सुनाकर शाम को सलाम किया। कवि-पत्रकार मित्र राजेश्वर नेपाली ने नेपाल-भारत की मित्रता को मजबूती और ऊँचाई देने की बात कविता के माध्यम से कही। पहली बार पता चला मित्र सीताराम अग्रहरि सिर्फपत्रकार नहीं हैं, साहित्यकार भी हैं। मैंने व्यंग्यात्मक मुक्तक और कविता से दिल्ली का दिल को मोह लिया था दहला दिया-क्या किया मैं अभी तक कुछ यकीन नहीं कर पाया।
खैर, नेपाली राजदूतावास के प्रमुख खगनाथ अधिकारी महोदय ने भी एक सुन्दर सी, प्यारी सी कविता सुना कर यह साबित कर दिया कि हम किसी से कम नहीं। मंच में हम कवियों की भावभीनी विदाई भी हर्ुइ। हमारी टोली ने चर्चित अक्षर धाम का घूम-घूम कर अवलोकन किया। हम दो अर्थात् मुकुन्द आचार्य और राजेश्वर नेपाली सुबह सबेरे होटल अमन पैलेस से निकल कर हनुमान जी को ढूँढकर दर्शन कर लेते थे। यह बुढापा जो न कराए।
जिस शान से हम गए थे, उसी शान से लौटना भी सम्भव हुआ। सीताराम अग्रहरि और गोपाल अश्क ने जमकर खरीददारी की। कुछ पुस्तकों का खरीदना र्सार्थक रहा। नए-नए अनुभवों से लैस होकर, कुछ ऊर्जावान हो कर संयोजिका रुचि की सुरुचिको धन्यवाद देते हुए हम सभी १३ जून की शाम को अपनी कान्तिपुरी नगरी में लौट आए। मैंने मन ही मन सच्चिदानन्द -भगवान -) का शुक्रिया अदा किया। मुझे इस बात का पÞmख्र था कि चलो दिल्ली के दिलवालों को ‘हिमालिनी’ से रू-ब-रू तो कराया। मजेदार सफर से कुछ तसल्ली तो मिली !
प्रिय पाठकों ! जीवन का एक खट्टा मीठा सच सुनाना चाहता हूँः- कुछ बातें न पूछने की होती हैं, न बताने की होती  है, सिर्फसमझने की होती हैं, और समझकर चुप रहने की होती हैं ।

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