दीपावली और देवी तत्व : : मृणाल पाण्डे

लोग जिन बातों को सबसे कम समझते हैं, उन पर सबसे त्वरित टिप्पणी करते हैं। दिल्ली के एक विश्वविद्यालय परिसर में हाल में एक अग्निगर्भा आलेख की प्रतियां बंटीं और सोशल मीडिया के मार्फत तुरत उस पर बहस शुरू हो गई। लेख में दुर्गा को सवर्णो और काली को दलित पिछड़ों की देवी घोषित कर अवर्णो से अपनी आस्था का केंद्र सिर्फ ‘अपनी’ ही देवी को बनाने का आग्रह किया गया था। रचनाकार को उम्मीद थी कि उसकी स्थापनाएं इतिहास की गहराइयां चाहे न मापें, वे आज के राज समाज में अगड़ा बनाम पिछड़ा के चिर ज्वलंत विवादों से जा जुड़ें। उनकी यह उम्मीद पूरी भी हुई। लेकिन इस लेख को पढ़कर भी भारत के गांवों-मुहल्लों में हर देवी के आगे मत्था टेकने वाले हर वर्ग-वर्ण के समूह क्या अपनी पारंपरिक आस्था छोड़ देंगे? क्या हर समूह जातीय चश्मा लगाकर तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं में से सिर्फ अपनी जाति के लिए पूज्य देवी तय कराने को टेंडर जारी कर देगा? और जो अन्य जाति की देवी को पूजता पाया गया, उसको जात बाहर कर दिया जाएगा? सोचें कि जातिगत वोट बैंकों की सनातन प्यास इस सोच से जुड़कर हमारे राज समाज को कहां ले जा सकती है।

हमारी देवियों के अनगिनत रूपों के जन्म, आराधना और कालक्रम में उनके दुनियाभर से यहां आ बसे विदेशी प्रवासियों के साथ आई देवियों के साथ समन्वय से नए रूप धारण करते जाने का हजारों बरस का इतिहास अद्भुत है। इस इतिहास को लेकर उपरोक्त तरह का अज्ञान व्यापक है और लोक जड़ों और बोलियों से कटे शहरी भारतीय के जीवन से निकला है। गांवों में देव परिवार की जाति को लेकर अधिक उत्सुकता नहीं दिखती। वहां मनोकामना पूरी करते हों तो यक्ष, असुर सब पूजनीय हैं। यह तो हमारे पढ़े-लिखे वर्ग के लोग हैं, जो इसे लेकर उद्वेलित हैं। पर बात शुरू हुई तो अपसंस्कृति, सवर्ण आग्रह, दलित चेतना और सांस्कृतिक हमले जैसे राजनीतिक धरातल के शब्दों के घटाटोप के बीच वे नहीं देख पाते कि मिथकों की जिस नई व्याख्या से वे हाशिए में रहे आए लोगों को उनके द्वारा सदियों से पूजी जा रही देवियों के खिलाफ आगाह करना चाहते हैं, वह कितनी परतदार व परिवर्तनशील है। लेख पढ़ने के बाद लगता है समाज, संस्कृति और स्त्रियों के बारे में वह प्राय: जातिगत पूर्वग्रहों और औपचारिक रूढ़ियों में ही उलझकर रह गया है।

सच तो यह है कि भारत ही नहीं, हर सभ्यता में अपनी पहचान को लेकर उग्र आक्रामकता और सारे समाज को एकजुट करने में सक्षम उदात्त नैतिक मूल्यों की तलाश, ये दोनों परस्पर विरोधी रुझान सदा मौजूद रहते हैं। और पुराने समय में जब सैकड़ों घुमंतू कबीले तमाम देशों से तमाम देशों तक आते-जाते रहते थे, तब जीवन की अनिश्चितता और अनेक छोटे-बड़े आध्यात्मिक सवालों को सुलझाने के लिए मानव ने भाषा का माध्यम अधूरा पाया। तब जीवन की रक्षक और भक्षक आदिशक्तियों के रूप में देवियों की पूजा शुरू हुई। यूनान-मिश्रो-रोमां से भारत तक अफ्रोदीत, नूबी, हेरा, दुर्गा, काली या लक्ष्मी सरीखे हजारों देवी मिथकों ने लगातार आकार लिया है। हर सभ्यता ने दूसरी सभ्यता से जुड़ने पर उससे अपनी पसंद के तत्व उठाकर अपनी जरूरतों के मुताबिक देवियां सिरजी हैं। देवियों के नए मिथकों ने कालक्रम में हमारे यहां भी वैदिक युग की उषस् या अदिति सरीखी देवियों की जगह पौराणिक कथाओं की नए भौतिक स्वरूप, नए गण, वाहन और साथी वाली देवियों को ला बिठाया है। लिहाजा आज जिन देवियों को धर्मगत और जातिवादी आधार पर टिकट दिलाए जा रहे हैं, वे तो अनगिनत जातियों, वर्णो, धर्मो और संस्कृतियों की सदियों से एकत्रित थाती ठहरती हैं। मिसाल के लिए दक्षिण भारत में सर्वपूज्या देवी हैं मरियम्मन, जिसका तन ब्राह्मण और सर दलित माना गया है। इस लेखिका को कैरिबियाई द्वीपों की यात्रा के दौरान भी भारतीय आप्रवासियों के मोहल्ले में मरियम्मन देवी का मंदिर देखने को मिला। वहां उन्हें गर्भवती महिलाओं की रक्षिका और शीतला माता की मिली-जुली महिमा से मंडित कर दिया गया है। इसी तरह महाराष्ट्र में पुणो से कुछ दूर एक किले में जरमली देवी का ख्यातनाम मंदिर है, जो दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वहां कैद रखे जर्मन सैनिकों द्वारा इलाके के ग्रामीणों को होमियोपैथी गोलियों के नि:शुल्क वितरण कर चंगा करने की स्मृति से जुड़ा बताया जाता है। करणी देवी या छींकमाता के मंदिर भी राजस्थान में हैं, उनको जातिवाद के किस खांचे में डालेंगे? देवी के तमाम मिथक कविता के छंद की तरह, दुर्गा या काली की तरह अमूर्त आकाशचारी हैं। दुर्गा का तो नाम ही यह कहता है : जो कठिनाई से समझ आए (दुर्गेण गम्यते)। शक्ति के मूल में असली तत्व है जनआस्था का छंद और छंद शब्दों से सदा ऊपर ही रहता है।

इधर लक्ष्मी को भी संपन्न वर्ग की भौतिकवादिता का स्रोत बताया जाता रहा है, पर वर्णाश्रमी व्यवस्था से सदियों पहले ऋग्वैदिक युग में उपजा लक्ष्मी का मिथक एक निराकार भाववाचक संज्ञा है, जो धन की अधिष्ठात्री नहीं, तेज, कल्याण, तृप्ति और सुंदरता की अमूर्त प्रतीक है। धन पाने के लिए तब अग्नि, अश्विनी कुमार, इंद्र या यक्षों से प्रार्थना की जाती थी। बाद में खेतिहर बनकर लोकमानस ने जब स्त्रियों का धनधान्य उत्पादन में योगदान समझा तो उसने चटपट धन शक्ति के पुराने देवताओं इंद्र, पूषन्, मरुत वगैरा को विदा कर यक्षों की सुरक्षा में लक्ष्मी और श्री को धनधान्य, भौतिक संपदा और बौद्धिक तेज की देवी बनाकर पूजना शुरू कर दिया। जब पुराणकाल (गुप्तकाल) में समाज पितृसत्ताक बन बैठा और तमाम सांपत्तिक अधिकार बेटों को ही मिलने लगे, तब तेजस्विनी आजाद लक्ष्मी का दोहरा रूप बनाया गया, जिसके तहत चंचला मुक्तविहारिणी पूंजी विष्णुप्रिया के रूप में चित्रित की गईं। इधर लोकतंत्र में वोट और समान शिक्षा का हक पाने के बाद लक्ष्मी का रूप फिर चंचला (लिक्विड कैपिटल) में बदलने लगा है तो अचरज की बात नहीं। चिंतक चंद्रभान प्रसाद की दलितों के लिये बनाई अंग्रेजी देवी की छवि भी लक्ष्मी, अदिति, दुर्गा या सरस्वती की तरह जीवन के सुखद प्रवाह की कामना से जुड़ी है। विश्वस्य स्थातुर्जगतां जनित्री, यानी दुनिया को बनाने और मानव जाति को कायम रखने वाली शक्तियों के रूप में स्त्री शक्ति के यह सारे रूप समान ग्राह्य क्यों न हों?

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