दुनिया के लिए संत हो गई मदर टेरेसा : विनोदकुमार विश्वकर्मा

विनोदकुमार विश्वकर्मा, काठमांडू , १० सेप्टेम्बर |

आमतौर पर लोग अपने, अपनों और अपनी खुशी के लिए ही जीते हैं, लेकिन दुनिया में कुछ ऐसे भी लोग गुजरे हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी दूसरों की सेवा में लगा दी । उन महान् लोगों में एक नाम ममता की देवी मदर टेरेसा का है । मदर टेरसा का हृदय संसार के तमाम दीन–दरिद्र, बीमार, असहाय और गरीबों के लिए धड़कता था और इस कारण उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन उनकी सेवा और भलाई में लगा दिया । उनका असली नाम अगनेस गोंझा बोजाशियु (Agnes Gonxha Bojaxhia) था । अल्लेलियन भाषा में गोंझा का अर्थ ‘फूल की कली’ होता है । इसमें कोई दो राय नहीं है कि मदर टेरेसा एक ऐसी कली थीं, उन्होंने छोटीसी उम्र में ही गरीबों, दरिद्रो और असहायों की जिन्दगी में प्यार की खुशबू भर दी थी ।

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मदर टेरेसा का जन्म २६ अगस्त १९१० को स्कॉप्जे (मेसोदोनिया) में एक अबलेनियाई परिवार में हुआ था । माना जाता है कि जब वह मात्र ०१२ साल की थीं, तभी उन्हें यह अनुभव हो गया था कि वो अपना सारा जीवन मानव सेवा में लगाएंगी । मदर टेरेसा ने आयरलैंड से ७ नजवरी, १९२९ को कोलकता के लोरेटो कॉन्वेन्ट स्कूल में कदम रखा । और वर्ष १९४४ में वह स्कूल की प्रधान अध्यापिका बन गई ।

अल्बानिया में जन्मी अगनेसा गोंंझा बोजाशियु १९२८ में ‘नन’ (मठ–वासिनी, भक्तिन) बनने के बाद सिस्टर टेरेसा बन गई और २४ मई, १९३७ को उन्होंने गरीब, शुद्धता और आज्ञाकारिता के जीवन को चुना और ‘लोरेटो नन’ की प्रथा के अनुसार ‘मदर की उपाधि ली ।

मदर टेरेसा ने कोलकता में मिशनरीज ऑफ चौरिटी’ की स्थापना १९४८ में की थी, जिसका मकसद निसहाय लोगों की मदद करना था । अपनी लगन व सेवा की भावना से उस महान् महिला ने इस मिशनरी को न केवल एक संगठन, बल्कि एक आन्दोलन के रुप में तबदील कर दिया ।

इसी प्रकार उन्होंने कोलकता में ‘निर्मल हृदय’ और असाध्य बीमार से पीड़ित रोगियों व गरीबों का सेवा करना था, जिन्हें समाज ने बाहर निकाल दिया हो । ‘निर्मल शिशु भवन’ की स्थापना अनाथ और बेघर बच्चों की सहायता के लिए हुई सच्ची लगन और मेहनत से किया गया कार्य कभी असफल नहीं होता । यह कहावत मदर टेरेसा के साथ सच साबित हुई । जब वह भारत आयीं तो उन्होंने वहां बेसहारा और विकलांग बच्चों और सड़क के किनारे पड़े असहाय रोगियों की दयनीय स्थिति को अपनी आँखों से देखा । इन सब बातों ने उनके हृदय को इतना द्रवित किया कि वे उनसे मुंह मोड़ने का साहस नहीं कर सकी । इसके पश्चात् उन्होंने जनसेवा का जो व्रत लिया, जिसका पालन वह अनवरत करती रहीं ।

अपनी परमार्थ कार्यों की वजह से २०वीं सदी के मानवीय जगत और ईसाई समुदाय में काफी मुकाम हासिल करने वाली मदर टेरेसा ४ सितंबर को सतं (ईश्वर का सेवक) घोषित हुई । उन्हें रोमन कैथोलिक चर्च के संत का दर्जा नेपाली समयानुसार २ बजकर १५ मिनट में बेटिकन सिटी के सेंट पीटर्स स्क्वायर में विशेष जनता के सामने ‘पोप फ्रान्सिस’ के द्वारा संत घोषित किया गया । मदर टेरेसा को संत की उपाधि उनकी १९वीं पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर प्रदान की गई । ५ सितंबर १९९७ को उनकी मृत्यु हुई थी । संत घोषित करने से पूर्व मदर टेरेसा की संक्षिप्त जीवन पढ़कर सुनाई गई और उसके बाद एक प्रार्थना हुई । प्रार्थना के बाद ‘पोप प्रंmसीस’ लैटिन भाषा में केननाइजेशन (संत चुने जाने की प्रक्रिया) का फॉर्मूला पढ़ा । इसके बाद उन्होंने कहा– क् In the name of the father and of the song and of the holi spirit और सब ने कहाAmen(तथास्तु) । (So’ It) यही मदर टेरेसा की सन्त होने की आधिकारिक मान्यता हुई ।

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