दुर्भाग्य मधेश का ! देश में दो मधेश – एक सम्पन्न अौर दुसरा विपन्न

कैलाश महतो, परासी २९ अप्रिल |

वैशाख ४ गते का दिन । बीरगंज की अोर मेरी यात्रा । स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन के चार जिलों का संयुक्त बैठक । सुबह ११ बजे शुरु होने बाला वह बैठक मेरे लेट होने के कारण ३:४० से बैठक शुरु हुआ । शाम के करीब ८ बजे तक बैठक विभिन्न मुद्दों पर आधारित । स्वराजियों में काफी उत्साह ।

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उस दिन की बैठक के बारे में पर्सा प्रहरी प्रशासन ने जानकारी प्राप्त कर ली थी । वे यह जान गये थे कि उस कार्यक्रम में डा-राउत या उनके दुसरे तीसरे तह के नेता पहुँचने बाले थे । सबेर से ही वे बैठक स्थल अौर नेताओं की लिष्ट पता लगाने के लिए अपनी सारी शक्ति लगा दी थी । बैठक किसी भी शर्त पर नहीं होने देने की बात थी । चारों अोर प्रशासन ने अपना फन फैलाये बैठी थी । मगर उनकी कोई परवाह किए बगैर आयोजकों ने तोके हुए स्थान पर कार्यक्रम की ।

कल्ह होकर ठाकुरराम बहुमुखी क्याम्पस के छात्र छात्राओं ने क्याम्पस में एक अन्तरक्रिया कार्यक्रम रखी । वहाँ पर जितने विद्दार्थियों की उपस्थिति रही, उससे कई गुणा ज्यादा स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन के प्रति उनकी झुकाव अौर आकर्षण देखा गया ।

मैं परासी से बीरगंज मोटरसाइकल से यात्रा कर रह था । रास्ते में मैंने देखा कि चितवन से मकवानपुर तक के खेतों में हरियाली राज कर रही है । हजारों हजार हेक्टरों में धान की रोपाई हो चुकी है । धान की मस्ती उसके बगल से यात्रा कर रहे यात्रियों में एक तरफ हरियाली की तोहफा बिखेर रही थी तो वहीं पर मुझ जैसे मधेशियों को तरसा रही थी यह कहते हुए कि उसे मधेशियों के खेतों में हँसने की इजाजत नहीं है ।

मैं बार बार यह सोंचने को बाध्य हो रहा था  कि उस हरियाली को शासकों ने कैद क्यूँ कर रखा है । नेपाल सरकार अपने को विश्व के सामने कृषि प्रधान देश के नाम दे रखा है । उसने कृषि उत्पाद के लिए मधेश को ही तराई के नाम पर प्रचार प्रसार किया है, पर उसी तराई की वो बस्ती जहाँ पर पहाडियों का पकड है, में इस चिलचिलाती हुई धुप में भी हरियाली नाचती है, खेती इस तरह मस्त है, मानो वह पंजाब का कोई हिस्सा हो, चीन के हुनान का एक टुक्रा हो या इजरायल के कृषि का कोई उद्दोगशाला हो । मगर मधेश के बाँकी विशाल वह भू-भाग जहाँ मधेशियों की घनी अावादी है, उसकी खेत है, उनके खेत के बगल में ही नदीयाँ बहती है । मगर उनके खेत आषाढ अौर श्रावण में भी सुखे होते हैं । उनके खेतों के लिए न कोई सिचाईं की व्यवस्था है न तो मल खाद की अापूर्ति की कोई सरकारी जिम्मेबारी है । भगवान् के दया पर टिके मधेशी किसानों के खेतों में अाकाश से पानी भी नसीब हो जाये अौर मधेशी किसान अपने खेतों को उब्जाने के लिए अपने घर से सटे भारतीय बाजारों से मल खाद लायें तो नेपाली प्रहरियों से उन्हें प्रताडित होना पडता है, गालियाँ सुननी पडती है, पिटाई खाने पडते हैं, घुस देने पडते हैं अौर उनकी मर्जी हुई तो उनके क्रिषी प्रयोजनों के सामानों को भंसार चलान कर देते हैं । दैनिक जीवन यापन हेतु भारतीय बाजारों से लाये गए सामानों को जब्त कर अपने घर तक ले जाते हैं अपने घर परिवारों की आवश्यकता पूर्ती के लिए । उसके देखा सिखि सीमा पर तैनाथ भारतीय प्रहरी भी मधेशियों से अनावश्यक फायदे उठाते नजर अाते हैं ।

वैसे ही पहाडी बस्तियों के पहाडी किसानों के उत्पादों को सुरक्षा देने, बाजार उपलब्ध करबाने तथा उनके क्रिषी उत्पादों को उचित मूल्य उपलब्ध करबाने हेतु सारा अत्याधुनिक कोल्ड स्टोर अौर महलों की व्यवस्था कि गयी है । झापा के बिर्तामोड, दमक, इटहरी, चितवन, हेटौडा, बुटवल, दाङ्ग, कैलाली तथा कंचनपुर के पहाडी किसानों के सम्पूर्ण क्रिषि उत्पादों को बाजार, मूल्य अौर सुरक्षा प्रदान की जाती है, वहीं मधेशी किसान दिन प्रति दिन अनेक ऋणों के बोझ तले दबते जा रहे हैं । एैसा प्रतित होता है कि मध्य देश में दो मधेश बनाये गये हैं: एक सम्पन्न अौर दुसरा विपन्न ।

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एक ही मध्य देश में दो देशों की रुप रेखा अौर प्रणाली क्यूँ अपनाये जाते हैं ?  इन सारे इरादों के पिछे के कारण क्या हो सकता है ? एक कारण स्पष्ट यह होता जा रहा है कि नेपाल सरकार जानकर मधेशी किसानों की अार्थिक स्थिति कमजोर ही नहीं, दयनीय करना चाहती है ताकि अार्थिक रुप में कमजोर मधेशी किसान दैनिक जीवन यापन को लेकर घरायसी, सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक तथा सांस्क्रितिक व्यवहारों को निर्वाह करने के लिए उनके पास बाँकी रहे भूमियों को बेच कर वे कंगाल हो जायें । वे भूमिहीन होकर नेपालियों के दास अौर गुलाम हो जाये अौर अन्तत: वे मधेश छोडकर कहीं अौर पलायन हो जाये ।

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