दुष्चक्र के भंवर में भोजपुरी
प्रियंका पाण्डेय

‘हम रउवा सब के भावना समझतानी।’ तमिल भाषी और उच्च स्तरीय अंग्रेजी बोलने वाले भारत के केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम् ने भोजपुरी की इस एक पंक्ति को बोलने के लिए कितना अभ्यास किया होगा। दो वर्षपर्ूव ही रक्सौल में भारत नेपाल के बीच बनने वाले इंट्रि्रेटेडÞ चेकपोष्ट का शिलान्यास करने आए चिदम्बरम् ने इस शिलान्यास कार्यक्रम के दौरान उपस्थित स्थानीयवासियों को संबोधित करते हुए यह वाक्य बोला था। हालांकि पूरा भाषण उन्होंने अंग्रेजी और हिन्दी की मिलावटी भाषा में दिया था। लेकिन स्थानीय लोगों का मन जीतने के लिए बीच बीच में कभी कभी वे अपनी टूटी फूटी भोजपुरी भाषा बोलकर उपस्थित स्थानीय भोजपुरी भाषायियों की ताली बटोरने में सफल रहे। चिदंबरम् ने हिंदी के लिए कभी अभ्यास नहीं किया। चिदंबरम की छवि या सियासी मंशा की विवेचना हो चुकी है।
नेपाल में भोजपुरी भाषा बोलने वालों की अच्छी खासी तादाद है। चार वर्षपर्ूव हुए संविधान सभा चुनाव में भोजपुरी भाषा जानने वाले कई सभासद चुनाव जीत कर आए लेकिन कभी भी उनके मुख से अपनी भाषा के प्रति प्रेम दिखाई नहीं दिया। हां शपथग्रहण के भी समय जब अपनी अपनी भाषा में शपथ लेने की होडÞ मची हर्ुइ थी तब भी पर्सर्ााबारा, रौतहट या अन्य भोजपुरी जानने वाले सभासदों ने या तो नेपाली में शपथ लिया था या फिर हिन्दी में। भोजपुरी में शपथ लेने वाले सभासद एकाध ही थे। लेकिन उसके बाद चार साल के सत्र के दौरान किसी भी सभासद् या सांसद के मुख से इस भाषा के प्रति प्यार के दो बोल बोलते हुए सुनने को हमारे कान तरस गए। लेकिन अफसोस यह नहीं हो पाया।
संसद में भोजपुरी बोलने वाले अनेक सांसद थे, लेकिन किसी ने भी भोजपुरी में कभी भाषण दिया हो, इसका इल्म मुझे नहीं हैं। मैं अपने प्राइम टाइम शो ‘हेलो तर्राई’ में भोजपुरी भाषा से ही शुरूआत और अन्त करती हूं लेकिन जब काठमाण्डÞू की गलियों में कार्यक्रम की आउटडÞाँर शूटिंग के लिए निकलती हूं तब पाती हूं कि यहां भी भोजपुरी बोलने वालों की संख्या काफी तादाद में है। इन में हमारे पर्सर्ााबारा, रौतहट के अलावा बिहार और उत्तर प्रदेश के भोजपुरीभाषी इलाकों से आए लोग भी काफी तादाद में हैं।
एक और कार्यक्रम का जिक्र मैं यहां करना चाहूंगी। संविधान सभा विघटन से ठीक दो दिन पहले नयां बानेश्वर स्थित इन्द्रेणी कंप्लेक्स में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में मधेश के जाने माने बुद्धिजीवी, पत्रकार नागरिक समाज के दिग्गज की उपस्थिति थी। मधेश महासभा द्वारा आयोजित कार्यक्रम की शुरूआत हिन्दी में हर्ुइ। लेकिन जब लोगों को बोलने का मौका मिला तो मैथिली भाषा की बहुल्यता दिखाई दी। हालांकि उस कार्यक्रम में भोजपुरीभाषी या भोजपुरी क्षेत्र के भी कई लोग मौजूद थे। लेकिन हिन्दी और मैथिली की बहुल्यता में शायद भोजपुरी कही खो गई थी। लेकिन पर्सर्ााजले के निवासी और पर्ूव राजदूत विजयकान्त लाल दास जो कि खुद भी मैथिलभाषी हैं, उन्होंने भोजपुरी बोलकर सबको चौंका दिया। इसलिए वहां मैथिली भाषा में सभी बोल रहे थे तो उन्हें भी अपने परिवार की भाषा से अधिक मातृ भाषा में अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में गर्व महसूस हुआ। इसलिए उन्होंने भोजपुरी में ही बात रखी। उनके इस प्रयास के बाद भोजपुरी जानने वाले कई और लोगों को भी हिम्मत हर्ुइ और उन्होंने भोजपुरी में ही अपनी बात रखी। लेकिन उसी कार्यक्रम में भोजपुरी में किताब प्रकाशित करने वाली बातें एक नामचीन साहित्यकार के तरफ से हिन्दी में बात रखने से भोजपुरी भाषियों को थोडÞी निराशा अवश्य हर्ुइ थी।
भोजपुरा राज्य की मांग कर वीरगंज को राजधानी बनाने के लिए जो आन्दोलन होते हैं, वहां भी हिन्दी और नेपाली का ही वर्चस्व देखा गया है। इसका एकमात्र कारण यह है कि भोजपुरी बोलते समय लोग आज भी हीन भावना रखते हैं। जब तक भोजपुरी बोलने में हमें गर्व का अनुभव नहीं होगा तब तक शायद यही स्थिति बनी रहेगी।
पहले भी यही स्थिति रही होगी। भोजपुरी जानने वाले पहले भी काफी लोग थे लेकिन परिस्थितिवश लोग भोजपुरी बोलते हुए झिझकते थे। लेकिन अब स्थिति धीरे धीरे बदल रही है। इसलिए कि सदियों से विस्थापित होकर अपने श्रम से दाल रोटी कमाने वाला भोजपुरी समाज कहीं न कहीं बराबरी की स्थिति में आता जा रहा है।
यह ठीक है कि भोजपुरी का साहित्य मैथिली, मराठी या बांग्ला की तुलना में कुछ भी नहीं है, लेकिन भोजपुरी पहचान की भाषा बनने लगी है। श्रम की भाषा तो हमेशा से रही है। भारत के पहले राष्ट्रपति देशरत्न राजेद्रप्रसाद भोजपुरी बोलते थे। उनके ही प्रयास और प्रेरणा से भोजपुरी की पहली फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढÞÞइबो’ बनी थी। आज भोजपुरी फिल्मों का अपना अलग बाजार, साख और आकर्षा है।
काठमाण्डÞू में हजारों लोग भोजपुरी बोलने वाले मिल जाएंगे। दौर ही कुछ ऐसा है। बाजार मिल जाता है तो सरकार पाने की चाहत होने लगती है। भोजपुरीभाषी राजनीतिक समाज जातिगत पहचान को र्सवाेच्च मानता रहा है। अब कहीं न कहीं वह भोजपुरी को भी इस पहचान में जोडÞना चाहता है। हिंदी के समानांतर पहचान की चाहत नजर आने लगी है। अब जब वह महानगरों में अपनी आर्थिक घुसपैठ से राजनीतिक घुसपैठ की दिशा में बढÞÞने लगा है, उसकी मांगे कुलीन होने लगी हैं। इससे भाषा समाज को व्यापक फायदा नहीं होता, लेकिन राजनीतिक पूंजी जरूर बन जाती है। पी चिदंबरम उसी राजनीतिक पूंजी को हासिल करने के लिए भोजपुरी प्रेम का पर््रदर्शन कर रहे थे।
भोजपुरीभाषी भी तो यही चाहते हैं। काठमाण्डÞू से लेकर पोखरा तक और दिल्ली से लेकर मुर्ंबई तक में उनकी भाषा की ताकत स्वीकार की जाए। जिन इलाकों में भोजपुरी बोली जाती है, वहीं भोजपुरी की क्या हालत है – कान्वेंट स्कूलों की चाहत क्या भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता दे दिए जाने से कम हो जाएगी – क्या भोजपुरी के गानों में जो अश्लीलता और लंपट तत्वों की भरमार है, वह दूर हो पाएगी – भोजपुरी के पास क्लासिकल संगीत का खजाना है। उसे हिंदी और अंग्रेजी का कुलीन तबका पाल रहा है। क्या हम चौपाई, ठुमरी और कजरी को भोजपुरी में फिर से स्थापित कर पाएंगे –
भोजपुरी दुनिया भर के १६ देशों में २० करोडÞÞ से भी ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली लगभग एक हजार साल पुरानी भाषा है, जो हिंदी के बाद सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाती है। इसके पास अपना समृद्ध साहित्य, अपार शैक्षणिक सामर्थ्य, एक समृद्ध सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत विद्यमान है। आज नेपाल सहित भारत के भी अनेक विश्वविद्यालयों में भोजपुरी की पÞर्Þाई हो रही है, जिससे भोजपुरी का दायरा बढÞÞ रहा है। दुनिया के सबसे बडÞे विश्वविद्यालय इग्नू में इसका फाउंडÞेशन कोर्स चलाया जा रहा है। दिल्ली सरकार ने मैथिली-भोजपुरी अकादमी तथा बिहार सरकार ने भोजपुरी अकादमी की स्थापना कर भोजपुरी भाषा, कला व संस्कृति को नए आयाम प्रदान करने के साथ-साथ इन्हें नई पहचान दी है। मूल रूप से नेपाल के मधेश सहित भारत के पर्ूवांचल क्षेत्र में मनाया जाने वाला महापर्व छठ आज धीरे-धीरे संपर्ूण्ा देश में उत्साहपर्ूवक मनाया जाने लगा है। यह भोजपुरी की संस्कृति की व्यापकता का परिचायक है। सरकार द्वारा अब छठ महापर्व पर र्सार्वजनिक अवकाश भी दिया जाने लगा है जबकि पहले यह सिर्फमधेश के जिलों में ही दिया जाता था।
भोजपुरी की उपयोगिता एवं बढÞÞते प्रभाव का अंदाजा इस बात से भी लगता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब अपने विज्ञापन भोजपुरी में भी बनाने लगी हैं। भोजपुरी टीवी चैनलों पर आने वाले विज्ञापन एवं भोजपुरी इलाकों में जगह-जगह पर लगाए जा रहे बोर्डÞ एवं होडिर्Þङ्स इसके गवाह हैं। भोजपुरी फिल्म इंडÞस्ट्री आज हिंदी फिल्म इंडÞस्ट्री को कडÞी टक्कर दे रही है। आबादी और प्रचुर समृद्ध साहित्य जैसे मानदंडÞों पर भोजपुरी किसी भी दूसरी भाषा से कम नहीं है। भारत में अगर सिर्फबोलने वालों की संख्या के लिहाज से ही देखें तो २००१ की जनगणना के अनुसार वहां के संविधान की आठवीं अनुसूची में जिन आठ भाषाओं को बोलने वालों की कूल संख्या ३ करोडÞÞ १६ लाख ४४ हजार है, जबकि आज भोजपुरी बोलने वालों की संख्या २० करोडÞÞ का आंकडÞा पार कर चुकी है।
अभी पिछले साल ही सरकार ने मैथिली भाषा की समृद्धि और विकास के साथ प्रोत्साहन के लिए विद्यापति राष्ट्रीय मैथिली पुरस्कारों के लिए कोष की व्यवस्था की थी। लेकिन अब तक सरकार की तरफ से भोजपुरी भाषा के लिए इस तरह का कोई भी प्रयास नहीं किया गया है। और ना ही भोजपुरी के नाम पर यहां राजनीति करने वाले और भोजपुरी के नाम पर विभिन्न संघ संस्था चलाने और सरकारी पदों पर बैठनेवाले लोगों के द्वारा ही इस तरह का कोई प्रयास होता दिख रहा है।
सरकार या प्रवेश परीक्षा में भाषा को शामिल कराने के लिए उछलने से पहले सोचना होगा कि जब हिंदी ही अंग्रेजी होते इस समाज में सरकती जा रही है तो भोजपुरी कैसे टिकेगी। मेरा मतलब भाषा के वजूद का मिटने से नहीं है। मेरा सवाल है कि क्या संवैधानिक मान्यता मिल जाने भर से और किसी भाषा को मूल धार में शामिल करने से यथार्थ की चुनौतियां मिट जाती हैं – क्या यह सिर्फभोजपुरी समाज के भीतर पैदा हुए कुलीन तबके की चाह नहीं है, जिसे वह महफिलों में शान से बता सके कि हमारी भोजपुरी भी कम नहीं है। महफिलों में भोजपुरी बोलने से कौन रोक रहा है। मुर्ंबई की फिल्मों में हमारी शारदा सिन्हा जी उच्च स्तरीय भोजपुरी गीत गाकर चली आती हैं। अश्लील गाने से मना कर देती हैं।
भोजपुरी के सम्मान के लिए जो लोग इस तरह से संर्घष्ा कर रहे हैं, उन्हें संवैधानिक मान्यता के सहारे की जरूरत नहीं है। देखना होगा कि भोजपुरी जातिगत वोट बैंक का दूसरा नाम तो नहीं है। अगर ऐसा है तो हासिल कुछ नहीं होने वाला। यह और बात है कि चिदंबरम् को भोजपुरी बोलते सुना तो मैं भी उछलने लगी। कौन नहीं चाहेगा कि उसकी बोली, उसकी भाषा सत्ता और समाज की हर देहरी और शिखर पर बोली जाए। लेकिन यह मौका भोजपुरी को संकर्ीण्ाता के दायरे में धकेलने का नहीं है। हिंदी का साम्राज्य बढÞÞेगा तो दरकेगा भी। कोई भी साम्राज्य जब बहुत फैल जाता है, तब टूटन होने लगती है। मैथिली और भोजपुरी की मांग को उसी दिशा में देखा जाना चाहिए। फिर भी हिंदी का वर्चस्व रहेगा। आज सत्ता प्रतिष्ठान अंग्रेजीमुखी हो चुके हैं। भारत के सबसे बडÞे प्रान्त मध्य प्रदेश में उद्योगपतियों ने मांग की है कि अधिकारियों को अंग्रेजी आनी चाहिए, तभी वे निवेश कर सकेंगे। इस हालत में जब हिंदी के लिए लडÞने वाला नहीं है तो भोजपुरी के लिए कौन लडÞेगा। जैसे-जैसे हम हिंदी और बोलियों को अलग करेंगे, हम हर लडर्Þाई हारेंगे। छोटी लडर्Þाई की जीत, बडÞे युद्ध में मिली हार से कभी बेहतर नहीं हो सकती।
-आलेख की रचनाकार नेपाल में टेलीविजन पर भोजपुरी कार्यक्रम की पहली प्रस्तोता हैं।)

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