दूर अभी हैं संविधान-निर्माण की बातें

कुमार सच्चिदानन्द:बाँलीवुड का एक प्रसिद्ध संगीत है कि ‘भैया देख लिया है बहुत तेरी चतुरर् ाई रे, अब तो हमरी बारी रे ना…।’ आशा से, लोभ से, मोह, दुःख या व्यथा से देश की जनता ने तीस राजनैतिक दलों को संविधान सभा में जगह दी और किसी को विजय तथा किसी को पराजय की अवधारणा देकर अपनी चतुर्राई का एहसास कराया। मगर चुनाव परिणामों के आने के बाद देश का अब तक की जो राजनैतिक कवायद है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि जनता की यह चतुर्राई को नहीं चलने देने के लिए हमारे राजनैतिक दल प्रतिबद्ध हैं। शायद यही उलटी-सीधी चाल राजनीति की फितर त है जिसकी जमीन पर ये राजनैतिक दल अपनी स्वार्थ-साधना के लिए जगह तलाशते हैं। अगर गौर करें तो कहा जा सकता है कि हमारे देश की राजनीति की यह चरित्रगत विशेषता है कि वह व्यवस्था की बात तो करती है मगर अराजकता को भी निमंत्रण देती है। कारण बातों की चर्वणा हमारे राजनैतिक दलों के नेताओं का सबसे बडÞा शगल है।hindi-magazine_sambidhan

विगत छः वर्षों की असफल कालावधि को इसी पृष्ठभूमि में देखा और समझा जा सकता है। समय का चक्र चलता रहता है। समस्याएँ आतीं हैं और समाधान भी निकल ही आते हैं, मगर यह कितना बौद्धिक, दूरगामी और न्यायसंगत है इसी पर इसकी सफलता या विफलता निर्धारित होती है। दर्ुभाग्यवश हमारी राजनीति जो ताना- बाना बुनती है, वह तात्कालिक समस्याओं के ही मद्देनजर। यही कारण है कि देश आज भी राह तलाश रहा है और समस्याएँ सामने खडÞा होकर मुँह चिढÞा रही हैं। हमारे राजनैतिक दल उसी दिशा में अग्रसर हैं जिस अतीत को वे पीछे छोडÞ आए हैं। इसलिए परिस्थितियाँ आज भी सुलझी हर्ुइ नहीं कही जा सकती। आज संविधानसभा में निर्ण्ाायक भूमिका अदा करने वाले तीनों ही प्रमुख दल अर्न्तर्कलह में बुरी तरह उलझे हुए हैं। सत्ता की भागीदारी की तो बात ही हम छोडÞ दें, पद के भी समय निर्धारण की बात सामने आ रही है और यह भी माना जा सकता है कि सरकार की भी आवधिक बँटवारे की बात सामने आ सकती है। सवाल है कि मौजूदा संविधानसभा की प्राथमिकता संविधान-निर्माण होना चाहिए और है भी, मगर राजनैतिक दलों के एजेण्डे में सरकार की प्राथमिकता है।

मौजूदा संविधानसभा की सबसे बडÞी पार्टर्ीीें जो घमासान और घात-अन्तर्घर्ााहै, वह तो जग जाहिर है ही, नेकपा एमाले ने भी नई सरकार के नेतृत्व का प्रस्ताव नेपाली काँग्रेस के समक्ष फेंककर एक ओर तो उदारता दिखलाने का नाटक कर रहा है दूसरी ओर राष्ट्रपति के चुनाव का मुद्दा उठाकर लेन-देन का अपना इरादा जाहिर कर दिया है। नेपाली काँग्रेस ने भी उसके प्रस्ताव के प्रति असहमति दिखलाकर देश की भावी राजनीति का संकेत एक तरह से दे ही दिया है। एनेकपा माओवादी की सबसे बडÞी समस्या यह है कि लम्बे संर्घष्ा और बलिदान के बाद यह दल राजनीति की मुख्यधार में आया, सम्पर्ूण्ा राज्य सत्ता अपने हाथ में लेने का इसका सपना था। कारण चाहे जो भी रहा हो, आज यह दल विभाजन की पीडÞा से तो गुजर ही रहा है, संविधानसभा में निर्ण्ाायक भूमिका अदा करने की भी स्थिति में नहीं। इसलिए वह सहमति की सरकार का राग अलाप रहा है। यहाँ भी अर्न्तर्कलह की जमीन तैयार हैं और शर्ीष्ा नेताओं में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। प्रमुख राजनैतिक दलों की इस खींचतान का असर किसी न किसी रूप में संविधानसभा की आगामी कार्ययोजना पर पडÞना लाजिमी है।

आगामी कार्य-याजे ना क े सम्बन्ध म ंे दला ंे के बीच ऊहापोह की स्थिति क्या है, इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रमुख दूर अभी हैं संविधान-निर्माण की बातें @ कुमार सच्चिदानन्द राष्ट्रपति के चुनाव पर दलों की सहमति नहीं हर्ुइ तो आगामी संविधानसभा के संभावित गणित में अप्रत्याशित उलटफेर होने की संभावना है। इसके बाद जो परिस्थिति पैदा होगी उसमें फिलहाल के कमजोर से लगनेवाले दल महत्वपर्ूण्ा स्थिति में आ सकते हैं और तब सरकार का संचालन ही मौजूदा संविधानसभा का महत्वपर्ूण्ा मुद्दा होगा और संविधान निर्माण की बातें नेपथ्य में रहेगी।

हिमालिनी l फरवरी/२०१४ ठ अच्छा व्यक्ति तो कोई भी बन सकता है, परन्तु दूसरों के लिए अनुकरणीय श्रेष्ठ जीवन कितने लोग जीते हैं – तीन दल सहित अधिकांश दल संविधानसभा की पहली बठै क स े पवर्ूर् व र्त्तर्ी सं िवधानसभा म ंे हर्इर्ु सहमति का स्वामित्व लेने की प्रतिबद्धता का कायार्न् वयन करन े स े चकू े ह।ंै दसू री सं िवधानसभा की पहली बैठक बिना एजेण्डा ९ गते, माघ का े कछु दरे बठै कर समाप्त हा े गर्इ। कागं से्र , एमाले और एमाओवादी मात्र नहीं, मधेश केन्द्रित अधिकाशं दला ंे न े भी चनु ावी घाष्े ाणापत्र आरै बहपु क्षीय सहमति म ंे पहली बठै क स े ही विगत की सं िवधान सभा क े कायार् ंे का स्वामित्व लने े की प्रतिबद्धता जतलाई थी। पर्ूववर्ती संविधानसभा द्वारा घोषित गणतंत्र, धर्मनिरपेक्षता आदि विषय म ंे पथृ क दृ िष्टकाण्े ा रखनवे ाल े रापप्र ा नपे ाल क े अतिरिक्त प्रायः समस्त दल इस बिन्दु पर एक मत थे।

लेकिन लापरवाही के कारण ऐसा नहीं हो सका। नपे ाली कागँ से्र का तकर् ह ै कि दला ंे क े बीच पयार्प् त गहृ कायर् न हाने े क े कारण प्रि तबद्धताआ ंे का कार्यान्वयन नहीं हो सका जबकि नेकपा एमाल े किन-किन विषया ंे का े सहमति क े अन्तगर्त माना जाए, इसका निर्ण्र्ाान होने के कारण दूसरी संविधानसभा की पहली बैठक के द्वारा स्वामित्व न ले सकने की बात कहता है। चौथी बडÞी शक्ति राप्रपा नेपाल की राजनैतिक दिशा अलग है। एमाओवादी और मधेश केन्द्रित दल मौजूदा राजनै ितक वातावरण म ंे उनकी स्थिति कहा ँ ह,ै यह जमीन तलाशन े म ंे लगा हअु ा ह।ै परिस्थितिया ँ चाह े जा े भी हा े ले िकन सच्चार्इ यह ह ै कि दला ंे क े बीच अर्न्तर्दलीय कलह इतना गहरा है कि जाने अनजान े उन्हानंे े फिसलन भरी राह तयै ार करना प्रारम्भ कर दिया है। सवाल उठता ह ै कि जब एजण्े डा नहीं ता े बठै क क्या ंे – फिर जा े सहमतिया ँ हा े चकु ी ह ंै उस े स् वीकार करन े म ंे समस्या क्या ह ै – आज जो एक ठहराव सा देखा जा रहा ह ै उसका मलू कारण ता े दला ंे का अन्तकर्ल ह ह ै आरै नते ाआ ंे की सारी ऊजार् इसक े समाधान की दिशा म ंे लगी हर्इर्ु ह।

बहिर्दलीय संवाद इनके बीच नहीं हो पा रहा है। दूसरा कारण यह भी हो सकता ह ै कि विगत सं िवधानसभा म ंे एमाआवे ादी प्रमुख राजनैतिक दल थे और मधेश केन्द्रित दल सशक्त भू िमका म ंे थ।े विगत सं िवधानसभा क े अनके निर्णर्य ा ंे म ंे इन दाने ा ंे दला ंे की भू िमका आरै दृ िष्टकाण्े ा महत्वपण्ू ार् रह े ह।ंै आज य े दाने ा ंे ही शक्तिया ँ हाशिय े पर ह।ंै इसलिए परु ान े निर्णर्य ा ंे का े यथावत ् स्वीकार करन े म ंे पम्र खु ता पा्र प्त कर रह े दाने ा ंे ही दल खदु का े असहज महससू कर रह े हा।ंे कहा भी जान े लगा ह ै कि माआवे ादिया ंे क े जातीय राज्य की अवधारणा के साथ-साथ एक मधेश प्रदेश की अवधारणा भी जनता ने चुनाव परिणामा ंे क े द्वारा ठकु रा दिया। कही ं सघं ीयता क े इस माहालै म ंे राष्ट ्र की अखण्डता का नारा देकर एक तरह से संघीयता के लिए नकारात्मक वातावरण तैयार किया जा रहा है, कहीं ‘एक भेष म’ंे सभासदा ंे का े शपथ लने े का फरमान जारी कर राष्टी्र यता की परिभाषा का े एक परिधि म ंे समटे न े की कोशिश की जा रही है। एक बात तो हमारे राजनै ितक दला ंे आरै उसक े नते ाआ ंे का े समझना ही चाहिए कि लोकतंत्र और इसकी परिभाषा कागज क े पन्ना ंे पर ही नही ं हमार े मना-े मस्तिष्क पर भी अंकित होनी चाहिए।

इतनी आशा तो की ही जानी चाहिए कि हमारे नवचयनित सम्मानित सभासद सं िवधानसभा म ंे शपथ की भाषा आरै भष्े ा का निधार्र ण स्वय ं कर सकत े ह।ंै यह माना जाना चाहिए कि इतनी तमीज उन्ह ंे ह।ै अगर दला ंे का े अपन े सभासदा ंे क े ऊपर इतना भी भरासे ा नहीं तो उनके उम्मीदवार चयन की पात्रता पर सवालिया निशान उठाया जा सकता है। आज संविधानसभा में प्रतिनिधित्व कर रहे चार प्रमुख दलों की अपनी-अपनी मनोवैज्ञानिक समस्या है। चौथी बडÞी शक्ति राप्रपा नेपाल को खोने के लिए कुछ नहीं है, विगत की उपलब्धियों को आत्मसात् करना भी उसके लिए मजबूरी नहीं है। इसलिए मौजूदा संविधानसभा उसके लिए ऐसा खेल का मैदान है जहाँ वह पहले से स्थापित दल और उसकी उपलब्धियों पर प्रहार करने का आक्रामक रुख अख्तियार कर सकता है और हार को भी विजय समझ सकता है। नेपाली काँग्रेस आन्तरिक अर्न्तर्कलह से ग्रस् त है और दल के नेता के लिए हुए आन्तरिक चुनाव में शेरबहादुर देउवा की पराजय के बाद एक बार फिर पार्टर्ीीें स्पष्ट विभाजन रेखा देखी जा सकती है और एक नई तरह की गुटबंदी का सूत्रपात हो सकता है। सबसे पुरानी और मध्यममार्गी पार्टर्ीीोने के कारण तथा संविधानसभा की सबसे बडÞी पार्टर्ीीोने के कारण भी उसके दायित्व अधिक हैं। लेकिन इस दायित्व के निर्वहन के लिए नेतृत्व की जिस स्वीकार्यता की आवश्यकता है, उसका किंचित् अभाव यहाँ देखा जा रहा है। नेकपा एमाले जैसी पार्टर्ीीें भी आन्तरिक अर्न्तर्कलह तो है ही लेकिन उसकी सबसे बडÞी समस्या है कि वह प्राचीन अैर नवीन राजनैतिक चेतना में समन्वय नहीं स्थापित कर पा रहा है। विगत संविधानसभा के चुनाव में मिली उपलब्धियों के मद्देनजर क्षेत्रीय मुद्दे के प्रति उपेक्षा का भाव इनके नेतृत्व वर्ग में पनपने लगा है। दूसरी ओर सरकार के मुद्दे पर नेपाली काँग्रेस से सहकार्य भी इनकी चुनौती है। इस बिन्दु पर जटिलता इनके लिए इसलिए भी अधिक है कि नेपाली काँग्रेस इनके प्रस्तावों के प्रति बहुत उदार नहीं दिखलाई दे रही। फिर महाधिवेशन की चुनौती भी इनके सामने है। इसलिए शीघ्र संविधान निर्माण फिलहाल इसकी भी प्राथमिकता नहीं है। विगत सं िवधानसभा म ंे नवीन चते ना क े वाहक क े रूप म ंे स्थापित हएु एनके पामाआवे ादी तथा मधशे के िन्दत्र दल आज हाशिय े पर ह।ंै माआवे ादिया ंे की समस्या ह ै कि उन्हानंे े साम्यवाद क े सिद्धान्ता ंे का लाके तत्रं ीकरण करन े का पय्र ास उस धरती पर किया, जहाँ लोकतंत्र की जमीन पहल े स े तयै ार थी आरै इस व्यवस्था म ंे कछु नयापन का स्वाद दने े म ंे व े असमथर् रह।े आज की परिस्थितिया ंे म ंे क्रां ित-प्रि तक्रां ित की बात ंे ड हिमालिनी l फरवरी/२०१४ निर्बल व खाली मन कभी भी र्समर्थ संकल्प उत्पन्न नहीं कर सकता।

और इसके द्वारा सत्ता परिवर्तन का सपना कपोल कल्पना की तरह ही है। जमीनी सच्चाई लोकतंत्र के साथ-साथ सुशासन, तीव्र विकास और सामाजिक न्याय की अवधारणा है। चुनाव म ंे अगग्र ामी परिणाम हासिल करन े क े लिए इन तत्वा ंे का े लाके म ंे ल े जाना आवश्यक ह।ै लेकिन इसके लिए नेतृत्व की जो विश्वसनीयता और र्सवस्वीकार्यता की अपेक्षा की जानी चाहिए, उसका सम्यक् अभाव यहाँ भी है। आज माआवे ादिया ंे क े समक्ष सबस े बडीÞ चनु ातै ी यह ह ै कि जिस राजनैतिक नवचेतना के वाहक वे बने ह,ंै माजै दू ा सं िवधानसभा म ंे उस े सरु क्षित रखना। लेकिन इसके लिए जिस संसदीय गणित की आवश्यकता ह ै वह इनक े पक्ष म ंे नही।ं मधशे आधारित दला ंे की स्थिति यह ह ै कि आज ये अपने बिखरे हुए स्वरूप को एकत्रित रूप दने े की कवायद कर रह े ह।ंै एक हद तक यह उचित भी ह ै आरै इनकी मजबरू ी भी। क्यांेि क विगत सं िवधानसभा म ंे गणितीय आधार पर भी व े सशक्त अवस्था म ंे थ,े मगर आज विभाजन के कारण इनकी स्थिति कमजोर हर्ुइ है और एक तरह स े नपे ाल की राष्टी्र य राजनीति म ंे इनकी क्षेत्रीय शक्ति का अवमूल्यन किया जाने लगा है। एसे े म ंे एकीकरण क े अलावा अन्य कार्इर्े विकल्प भी इनक े पास नही ं ह।ै अब तक क े घटनाक्रमा ंे स े दखे ा जा रहा ह ै कि दा े माचर्े े इनक े बनन े जा रह े ह,ंै मगर सबस े बडीÞ चनु ातै ी इन दला ंे की यह ह ै कि विभिन्न दला ंे स े आए लागे एक दल क े रगं म ंे कसै े एकाकार हा े सकत े ह ंै – विभिन्न दला ंे क े शिखर नेतृत्व दल के सामान्य कार्यकर्त्तर्ाानकर कसै े रह सकत े ह ंै – य ँू ता े नपे ाल की राजनीति की ही यह विशेषता है कि कोई भी दल रचनात्मक विपक्ष की राजनीति नहीं करना चाहता। सहमति की सरकार बनने-बनाने का निहितार्थ भी यही ह।ै कहा जा सकता ह ै कि सत्ता की चकाचाधंै म ंे इन्हानंे े अपनी छवि गमु ायी ह।

यही कारण है कि कोई भी दल आज अकेला नेतृत्वकारी भू िमका म ंे नही ं ह।ै सत्ता क े प्रि त इनका आकषर्ण् ा इतना गहरा है कि प्रत्यक्ष निर्वाचन का परिणाम सामने आते ही मधेश आधारित एक महत्वपर्ूण्ा दल सबस े बडीÞ पार्टर्ी नपे ाली कागँ से्र का े समथर्न देने की घोषणा कर डालता है। न नीति, न मुद्दे, न शर्त्त- आखिर कौन सा आकर्षा है कि बिन माँगे र्समर्थन की थाल लेकर हम तैयार दिखलाई दते े ह ंै – अगर इनक े एकीकरण का मनाे िवज्ञान यही ह ै ता े एक बात उन्ह ंे समझना ही चाहिए कि यह अन्तिम चुनाव नहीं है। वर्जना सत्ता या सरकार से नहीं, वर्जना इसे साध्य समझ लेने स े ह।ै जनाकाक्ष्ं ाा यह ह ै कि सरकार म ंे अगर इनकी सहभागिता होती है तो उसका वैज्ञानिक आधार भी होना चाहिए। एक बात यह भी सच ह ै कि माजै दू ा सं िवधानसभा म ंे सं िवधान-निमार्ण् ा की दृष्टि से इनकी स्थिति निर्ण्ाायक नहीं। इसलिए सामूहिक प्रयास द्वारा आक्रामक रणनीति के तहत य े क्षत्रे ीय हिता ंे का े सरु क्षित करान े का पय्र ास कर ंे इसी म ंे इनकी सफलता हागे ी आरै इसी जमीन स े इनकी सशक्त पुनर्वापसी की भी संभावना है। आज संविधान-निर्माण की राह में राष्ट्रपति का चुनाव एक बडÞा पत्थर बनकर सामने आया है। नेपाली काँग्रेस यह कहकर राष्ट्रपति का चुनाव टाल रहा है कि एक साल के भीतर चूँकि संविधान जारी करना है, इसलिए इसमें अनावश्यक समय निकलेगा। विरोधाभास यह है कि इसी दल के बरिष्ठ नेता सरकार बनने के छः महीने के भीतर स्थानीय निकायों के चुनाव की बात करते हैं। एक आर्थिक वर्षमें एक आमचुनाव से देश गुजर चुका, दूसरे आमचुनाव की जमीन हमारी राजनीति तलाश रही है और आम जनता के लिए तीव्र विकास का सपना बाँट रही है । एक बात यह भी निश्चित है कि अगर राष्ट्रपति के चुनाव पर दलों की सहमति नहीं हर्ुइ तो आगामी संविधानसभा के संभावित गणित में अप्रत्याशित उलटफेर होने की संभावना है। इसके बाद जो परिस्थिति पैदा होगी उसमें फिलहाल के कमजोर से लगनेवाले दल महत्वपर्ूण्ा स्थिति में आ सकते हैं और तब सरकार का संचालन ही मौजूदा संविधानसभा का महत्वपर्ूण्ा मुद्दा होगा और संविधान निर्माण की बातें नेपथ्य में रहेगी। एक बात तो कहा ही जा सकता है कि विगत चुनाव में जिस उत्साह से आम लोगों ने अपनी सहभागिता दी, उसका प्रभाव हमारे राजनैतिक दलों पर नहीं पडÞा है। वे जीत और हार के अवसर के रूप में इसका चिंतन-मनन कर रहे हैं और फिर जोडÞ-तोडÞ की उसी र ाजनीति की दिशा में क्रमशः अग्रसर हैं जिस पर चलकर पिछली बार वे असफल हो चुके हैं। यह सच है कि राजनीति अगर अवसर की जमीन देती है तो यहाँ उर्त्र्सग और त्याग के भी आधार होते हैं। राष्ट्र की आवश्यकता आज एक संविधान है, एक विभेदमुक्त समाज है और समाज की आवश्यकता एक सम्मानपर्ूण्ा तथा सुरक्षित जीवन और सम्यक विकास है। इसके बिना सब कुछ अधूरा है। इसके लिए मुठ्ठी भर त्याग की आवश्यकता है, जिसकी कला हमार ी राजनीति को सीखनी ही होगी अन्यथा हम संक्रमण के अंधकार से गुजरते ही रहेंगे और आम आदमी के होठों पर एक ही शब्द होगा-‘

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