दूसरे चरण का चुनाव सम्पन्न : माहोल कहीं खुशी और कहीं गम

श्वेता दीप्ति, कहीं खुशी, कहीं गम, सम्पादकीय (जुलाई अंक )

बारिश का मौसम इंतजार का मौसम होता है । कृषक इसका इंतजार करते हैं, अच्छी उपज के लिए और आम जन इसका इंतजार करते हैं मौसम की तपिश कम करने के लिए । पर कई जगहों पर बारिश डर बन कर आती है । बारिश का होना यानि नदियों में जल का स्तर बढ़ना और फिर बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से हर वर्ष गुजरना कुछ जगहों की नियति होती है । सप्तरी इस आपदा से जूझ रहा है । विडम्बना तो यह है कि जब कहर आता है, तभी इसकी चर्चा होती है । अगर वक्त रहते इस समस्या का समाधान खोजा जाय तो निदान अवश्य सम्भव होगा । पर देश की यह अवस्था है कि यहाँ जनता की समस्याओं को सुलझाने की अपेक्षा, सत्ता की सुरक्षा और उम्र बढाने में सरकार की शक्ति अधिक खर्च होती है । बाढ़ का कहर, सड़कों की बदहाल स्थिति, इसकी वजह से आए दिन होने वाली दुर्घटनाएँ रोज के समाचार का हिस्सा बन गए हैं । देश की ऐसी समस्याएँ अपनी जगह कायम हैं और जनता बेबस और लाचार इस का हिस्सा बनी हुई है । ।
दूसरे चरण का चुनाव सम्पन्न हो चुका है और परिणाम भी नेपाली जनता के समक्ष है । माहोल कहीं खुशी और कहीं गम का है । राष्ट्रवाद की लहर ने एमाले की नैया को किनारे लगा दिया है । काँग्रेस किसी तरह अपनी शाख बचाने में सक्षम हुई है वहीं माओवादी का तो कई जगह सूपड़ा ही साफ है । नया शक्ति और ससफो मिलकर भी कोई कमाल नहीं दिखा पाए । राजपा नेपाल को हाशिए पर लाने में इस बार तो सत्ता कामयाब रही, अब देखना यह है कि दो नम्बर प्रदेश के चुनाव से पहले सरकार क्या कदम उठाती है ? वर्तमान में सरकार का रवैया मधेश की माँग को लेकर फिलहाल शिथिल नजर आ रहा है । आश्विन में दो नम्बर प्रदेश का स्थानीय चुनाव और फिर कार्तिक तथा माघ में प्रदेश और केन्द्र का चुनाव वर्तमान अवस्था में सम्भव नजर नहीं आ रहा । सत्ता समीकरण में बदलाव की सम्भावना भी बलवती है । राजपा नेपाल की उम्मीदें काँग्रेस सरकार से टूटती नजर आ रही हैं । सरकार समर्थन का कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आ रहा । अब देखना यह है कि ऊँट किस करवट बैठता है ?
आज पर ही कल की ताबीर लिखी जाएगी
कल उस पर ही हमारी जीत लिखी जाएगी ।
हौसलों को जिन्दा रख यकीन को कायम
एक दिन इतिहास में हमारी तारीख लिखी जाएगी ।

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