देउवा का कठिन कार्यकाल

लिलानाथ गौतम :बाराबार की उम्मीदवारी और पराजय के बावजूद १३वाँ महाधिवेशन से नेपाली कांग्रेस की बागडोर शेरबहादुर देउवा के हाथों में आयी है । तीन–तीन बार देश का कार्यकारी प्रमुख अर्थात् प्रधानमन्त्री बन चुके देउवा के लिए पार्टी नेतृत्व का अनुभव नया नहीं है । इससे पहले कांग्रेस प्रजातान्त्रिक गठन कर वो पार्टी नेतृत्व का अभ्यास कर चुके हैं । लेकिन इसमें वह सफल नहीं हो पाए । अन्ततः देउवा पुनः पार्टी एकीकरण में आने के लिए बाध्य हुए थे । उसके बाद नेपाली कांग्रेस के भीतर स्पष्ट रूप में ‘संस्थापन पक्ष’ और ‘देउवा पक्ष’ कह कर दो गुट दिखाई दे रहा है । पार्टी एकीकरण के बाद से ही बहुत लोग कहते आ रहे हैं कि अभी तक नेपाली कांग्रेस भावनात्मक रूप से एक नहीं हुआ हैं । कांग्रेस को भावनात्मक रूप से एकीकृत बनाने के लिए उल्लेखित दो गुटों का अन्त होना चाहिए, ऐसी आवाज भी उठती रही है । हर महाधिवेशन में यह मुद्दा प्रमुख विषय बनता था । लेकिन व्यवहारतः ऐसा नहीं हुआ । परिणामतः ‘संस्थापन पक्ष’ और ‘देउवा पक्ष’ कायम रहा । दोनों पक्षों के बीच ६०–४० का भागबण्डा औपचारिक रूप में जारी रहा । ऐसी अवस्था में क्या नवनिर्वाचित सभापति शेरबहादुर देउवा कांग्रेस को वास्तव में ही भावनात्मक रूप से एकीकृत बना सकते हैं ? कांग्रेसीजनों के लिए अभी का जटिल प्रश्न यही है । Sher Bahadur Deuba
सिर्फ कांग्रेस को एकीकृत कराना ही नहीं है, समग्र देश को ही एकीकृत करना और अस्थिर राजनीति से देश को बाहर निकालना भी अब देउवा की जिम्मेदारी है । देश के सबसे बड़े और प्रजातान्त्रिक पार्टी होने के नाते इस जिम्मेदारी से देउवा भाग नहीं सकते और भागना भी नहीं चाहिए । इसके लिए देउवा के आगे बहुत कुछ चुनौतियाँ भी हो सकती हैं ।
पदाधिकारी व्यवस्थापन
पार्टी के आन्तरिक राजनीति में लम्बे समय से संस्थापन विरोधी नेता के रूप में परिचित शेरबहादुर देउवा को संस्थापन पक्ष से ही नहीं, अपने ही मित्रों की वजह से संकट में पड़ सकते हैं । सभापति में निर्वाचित होने के लिए उन्होंने जितना भी व्यक्तिगत पहल किया, उससे कहीं ज्यादा सहयोगी भूमिका खुमबहादुर खड्का और विमलेन्द्र निधि ने किया । निर्वाचन के समय में संस्थापन से देउवा समूह में प्रवेश कर महामन्त्री का उम्मीदवार बननेवाले अर्जुननरसिंह केसी का भी थोड़ा–बहुत योगदान है । अगर इन लोगों को सन्तुष्ट नहीं किया जाएगा तो, आगामी दिन में संस्थापन पक्ष से ज्यादा परेशान यही लोग करनेवाले हैं । खड्का और निधि ऐसे पात्र हैं, जिसके सहारा बिना देउवा आगे नहीं बढ़ सकते हैं, वह पार्टी के भीतर ही अल्पमत में पड़ते हैं ।
महाधिवेशन से निर्वाचित केन्द्रीय सदस्यों का चेहरा देखा जाए तो देउवा स्पष्ट बहुमत में हैं । सभापति होने के नाते देउवा तीन पदाधिकारी (उपसभापति, महामन्त्री और सचिव) और २१ केन्द्रीय सदस्य भी नियुक्त कर सकते हैं । जिसके चलते केन्द्रीय कमिटी के भीतर देउवा और अधिक मजबूत भी हो सकते हैं । लेकिन अपने पक्ष में दिखाई देनेवाले बहुमत सदस्यों को देख कर ही पार्टी सञ्चालन नहीं किया जाएगा और यह सम्भव भी नहीं है । पार्टी सभापति में पराजित तथा संस्थापन पक्षों की बात भी सुननी पड़ती है । लेकिन उससे पहले देउवा के लिए अपने साथी–संगी की व्यवस्था ही भारी पड़ने वाली है । महाधिवेशन के समय में देउवा को सहयोग करनेवाले मुख्य दो हस्ती खुमबहादुर खड्का और विमलेन्द्र निधि ही हैं । अनुमान लगाया जा रहा है कि इन लोगों का व्यवस्थापन ही देउवा के लिए महंगा साबित होने वाला हैं । अभी तक बाहर चर्चा है कि विमलेन्द्र निधि को उपसभापति बनाने का वचन देउवा ने महाधिवेशन पहले से ही दिया है । लेकिन उसी पद के लिए खुमबहादुर खड्का ने भी देउवा को सहयोग किया है, ऐसी चर्चा है । बताया जाता है कि निर्वाचित बहुत केन्द्रीय सदस्यों में खड्का का प्रभाव हैं और खड्का जो चाहते हैं, वे लोग वही करते हैं । ऐसी अवस्था में अगर देउवा, खड्का को सन्तुष्ट नहीं करते तो कोई भी वक्त वह देउवा के साथ छोड़ सकते हैं । उस वक्त देउवा अल्पमत में ही नहीं लंगडा भी साबित हो जाएंगे । इधर विमलेन्द्र निधि के सवाल में भी ऐसी ही हालात है ।
इधर अपने को पराजित पक्ष कहते हुए रामचन्द्र पौडेल समुह ने उपसभापति लगायत कुछ केन्द्रीय सदस्यों में अपना दावा प्रस्तुत किया है, जो अस्वाभाविक भी नहीं है । इसीलिए १९ साल के वाद कोइराला परिवार के चंगुल से नेपाली कांग्रेस को बाहर लाया गया है, ऐसी आत्मरति में रमना देउवा पक्ष के लिए सान्दर्भिक नहीं होगा । चुनौतियों को सामना करते हुए समस्या का सही समाधान निकालना ही सक्षम नेतृत्व की खूबी है । अगर देउवा ऐसा कर सकते हैं तो हर चुनौतियाँ उनके लिए अवसर भी बन सकती है ।
संस्थागत पद्धति का विकास
वैसे तो सभापति निर्वाचित होने के बाद ही देउवा ने कहा था कि संस्थागत पद्धति का विकास और गुटगत राजनीति का अन्त करना ही मेरी प्राथमिकता है । साथ में उन्होंने यह भी कहा था कि वह पार्टी के भीतर किसी के ऊपर भी अन्याय नहीं होने देंगे और मूल्यांकन पद्धति स्थापित करेंगे । इस तरह की वचनवद्धता इससे पहले सभापति निर्वाचित होने वालें भी करते थे । पर किसी ने भी इसका व्यवहारिक प्रदर्शन नहीं किया । इस बार अपने वचन को कार्यान्वयन करने का अवसर देउवा के पास है ।
इसके लिए महाधिवेशन में विजय अथवा पराजय दोनों पक्षों को समेट कर पार्टी एकीकृत बनाने के लिए कोई भी कसर बाकी नहीं रखना चाहिए, इसका सन्देश प्रारम्भ में ही देना चाहिए था । पदाधिकारी में पराजित कुछ व्यक्तियों को केन्द्रीय सदस्य मनोनित कर देउवा ने कुछ उदारता तो प्रदर्शन किया है, लेकिन यही पर्याप्त नहीं है । विशेषतः पार्टी को भावनात्मक रूप में एक बनाने के लिए पार्टी संसदीय दल के नेता में दावेदारी प्रस्तुत कर रहे नेता तथा सभापति पद में पराजित रामचन्द्र पौडेल की मांग के प्रति देउवा अभी तक सकारात्मक नहीं हो पा रहे हैं । सिर्फ पौडेल ही नहीं, संस्थापन कहलाने वाले सभी लोग संसदीय दल के नेता में रामचन्द्र पौडेल को देखना चाहते हैं । लेकिन अवस्था कुछ अलग दिखाई देती है, सहमति के नाम में देउवा, संसदीय दल के नेता के लिए अपने पक्ष में पौडेल का समर्थन मांग रहे हैं । इस तरह बात नहीं बनने से आखिर दो पक्ष के बीच चुनावी प्रतिस्पर्धा ही होने वाली है । इसीलिए जितना भी आदर्श भाषण किया जाए, अगर चुनाव मार्फत संसदीय दल का नेता चयन किया गया तो कांग्रेस के भीतर व्याप्त गुटगत राजनीति इस बार भी खत्म होनेवाली नहीं है ।
इसीतरह नेपाली कांग्रेस, लोकतन्त्र और संस्थागत पद्धति के लिए अपने को अगुवा मानता है । लेकिन स्वयं कांग्रेस के भीतर लोकतान्त्रिक पद्धति और व्यवहार शून्य है, ऐसा आरोप लगता आ रहा है । पार्टी के तरफ से होने वाले प्रायः सभी निर्णय में नेतृत्व की इच्छाशक्ति ही हावी होना और निर्णायक बनना कांग्रेस के भीतर आम बात है । पहले कार्यकाल से ही विभिन्न भातृ संगठनों का निर्वाचन नहीं हो पा रहा है । केन्द्रीय स्तर में पहुँच रखनेवाले नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और स्वार्थ के कारण ही भातृ संस्था पुनर्गठित तथा निर्वाचित नहीं हो पाया है । यह इतिहास नेपाली कांग्रेस के भीतर बार–बार देखने को मिलता है । पार्टी के भीतर व्याप्त इस तरह का संस्कार अन्त करना देउवा के लिए कम चुनौतिपूर्ण नहीं है । कांग्रेस के भीतर व्यक्तिवादी चिन्तन और व्यवहार यहाँ तक है कि पार्टी सभापति तथा नेता लोग पार्टी कार्यालय नही जाते है, निवास से ही पार्टी सञ्चालन करते हैं । कांग्रेस को निकट से समझनेवाले लोग कहते है कि जिसके चलते कांग्रेस के भीतर संस्थागत पद्धति का विकास नहीं हो पा रहा है । इस को गलत साबित करने के लए भी देउवा को कुछ तो करना ही होगा ।
इगो व्यवस्थापन
जो जितना भी पार्टी एकीकरण सम्बन्धी आदर्श भाषण दे, कांग्रेस के भीतर स्पष्ट रूप से दो समूह है, जिसमें कोई भी एक पक्ष दूसरे पक्ष की बात सुननेवाला नहीं है । कांग्रेस–एकीकरण की बात तो दोनों पक्ष करते हैं, लेकिन हर कोई अपने को सही और दूसरों को गलत समझते हैं । कांग्रेस को वास्तव में ही एकीकृत कराना है तो इन दो पक्षों के बीच संवाद होना चाहिए, एक दूसरे को समझना चाहिए । इसके लिए दोनों पक्ष के नेताओं में रहे महत्वाकांक्षा और अहम् ‘इगो’ को अन्त होना जरूरी है । सभापति होने के नाते देउवा को ज्यादा झुकना ही क्यों न पड़े !
संविधान कार्यान्वयन और सीमांकन विवाद
संविधान जारी होने के बाद देश आर्थिक उन्नति के राह पर आगे बढ़ना चाहिए था । लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है । विभिन्न कारणों में से एक कारण है– जारी नया संविधान के प्रति असन्तुष्ट समुहों की गतिविधि । विशेषतः तराई÷मधेश से आवाज आ रही है कि संविधान अपूर्ण है, इस में संशोधन होना चाहिए । इसी मांग को लेकर पाँच महीने से जारी आन्दोलन तो खत्म हुआ है, लेकिन पुनः आन्दोलन की बात हो रही है । ऐसी अवस्था में इस मांग को सम्बोधन किए बिना संविधान का सही कार्यान्वयन असम्भव है । इसीलिए सीमांकन सम्बन्धी विवाद तथा तराई आन्दोलन द्वारा सिर्जित परिस्थिति को जितनी जल्दी हो सके औपचारिक सम्बोधन आवश्यक है । देउवा, इस समस्या को किस तरह सम्बोधन करते हैं, अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं दिख रहा है । लेकिन इसका सम्बोधन बिना देउवा की राजनीति आगे बढ़ने वाला नहीं है । देउवा और पौडेल में से देउवा ही मधेश के लिए हितकारी हो सकते हैं, ऐसी बात महाधिवेशन के समय से ही आ रही थी । ऐसी पृष्ठभूमि में देउवा किस तरह सीमांकन सम्बन्धी विवाद को सम्बोधन करते हैं, प्रतीक्षा हो रहा है ।
हिन्दू राष्ट्र और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध
देउवा के कंधे पर सिर्फ नेपाली कांग्रेस की ही जिम्मेदारी नहीं है, पूरे देश के बारे में भी उन को सोचना आवश्यक है । देश की सब से बड़ी और प्रजातान्त्रिक पार्टी के सभापति होने के नाते वह इस जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते । सच कहें तो अभी सबका ध्यान देउवा की ओर ही केन्द्रित है । सिर्फ राष्ट्रीय स्तर में ही नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र से भी देउवा का आगामी कदम और नेपाल की राजनीतिक भविष्य को जोर कर देखा जा रहा है । जिसमें देउवा की तरफ से परिपक्व भूमिका की प्रतीक्षा हो रही है ।
बहस और चर्चा में रहे सीमांकन सम्बन्धी मुद्दा से लेकर धर्मनिरपेक्षता सम्बन्धी बहस ने भी नेपाल को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर में परिचित कराया है । नेपाल को पुनः हिन्दू राष्ट्र कायम करना चाहिए, इस मुद्दा को लेकर नेपाली कांग्रेस के भीतर आगामी दिन में बहुत बड़ा ही हंगामा होनेवाला है । पिछले महाधिवेशन से केन्द्रीय समिति में निर्वाचित सदस्यों में से कुछ ऐसे हैं, जो नेपाल को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए लगे हुए हैं और वे लोग कुछ भी करने के लिए तैयार दिखते हैं । अब यह मुद्दा सिर्फ नेपाली कांग्रेस और नेपाल के लिए ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में भी उत्सुकता का विषय बन गया है । इसी तरह भारत के साथ बिगड़े सम्बन्ध को लेकर भी अभी काफी बहस हो रही है । इसमें सकारात्मक सुधार करने का दायित्व भी देउवा के कंधे पर हैं । इसीलिए ऐसे बहुत से जटिल और पेचीदा मुद्दों के प्रति देउवा की धारणा और व्यवहार क्या होता है, वही उनके कार्यकाल को सफल और असफल सिद्ध करेगा ।

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