देउवा के अच्छे दिन बारह वर्षों बाद आए हैं, नेपाल के अच्छे दिन कब आएँगे ? श्वेता दीप्ति

किस्तों में बँटी राजनीति, नई किस्त देउवा के नाम – श्वेता दीप्ति

वैसे देउवा के अच्छे दिन बारह वर्षों के बाद आए हैं देखना यह है कि नेपाल के अच्छे दिन कब आएँगे ? संसद के बड़े दल काँग्रेस के सभापति शेरबहादुर देउवा इससे पहले तीन बार प्रधानमंत्री बन चुके हैं

देश को शेरबहादुर के रूप में अपना चालीसवाँ प्रधानमंत्री मिल चुका है । पूर्व प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने अपने किए हुए वादे को निभाते हुए सत्ता की बागडोर तयशुदा रूप में छोड़ दिया । इस मायने में वो इमानदार निकले कि काँग्रेस से किया गया वादा उन्हें याद रहा । अमूमन राजनीति में वादों के लिए कोई खास जगह नहीं होती क्योंकि नेता वादा करते हैं जनता को लुभाने के लिए, जो सत्ता प्राप्ति के बाद अगले चुनाव तक के लिए फिक्स डिपोजिट की तरह कहीं एकान्तवास के लिए चला जाता है । परन्तु प्रचण्ड ने एक मिसाल कायम की है प्राप्त सत्ता को छोड़ कर । इन सबमें जो खास बात हुई वो यह कि राजपा नेपाल ने एक बार फिर पूर्व की तर्ज पर ही सरकार को समर्थन दिया है । क्यों दिया है यह तो वही जानें क्योंकि सिर्फ सरकार का नाम बदला है, न तो समीकरण बदला है और न ही परिवेश । ऐसे में समर्थन का औचित्य शायद उनकी विवशता ही है क्योंकि सार्थक उम्मीद की किरण कहीं से भी नजर नहीं आ रही है । एमाले का उग्र रूप मधेश के लिए आज भी पूर्ववत ही है । कई बार जब यह सुनने को या पढ़ने को मिलता है कि मधेश का चुनाव वहिष्कार या मधेश की माँग, मधेश विखण्डन की राह बना रही है तो अजीब सी कोफ्त होती है । यहाँ अधिकार और पहचान की माँग को विखण्डन बताया जा रहा है । विखण्डन के उदाहरणस्वरूप कभी मुसलिम लीग की चर्चा होती है तो कभी बंगला देश की तो कभी कश्मीर की । जबकि इन सभी की परिस्थितियाँ नेपाल और मधेश के परिप्रेक्ष्य में बिल्कुल अलग है ।


क्या है राजनीति ?
ऐसे में कई बार जेहन में यह खयाल आता है कि आखिर राजनीति क्या है ? वह जो हम देख रहे हैं या कुछ और ? सामान्यतया हम जानते हैं कि राजनीति वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोगों का कोई समूह निर्णय लेता है । सामान्यतः यह शब्द असैनिक सरकारों के अधीनयवहार के लिए प्रयुक्त होता है किन्तु राजनीति मानव के सभी सामूहिकयवहारों (यथा, औद्योगिक, शैक्षणिक एवं धार्मिक संस्थाओं ) में सदा से उपस्थित तत्व रहा है । राजनीति उन सामाजिक सम्बन्धों से बना है जिसमें सत्ता और शक्ति समाहित होते हैं ।
राजनीति शब्द का विश्लेषण करें तो यह दो शब्दों, ‘राज’ और ‘नीति’ से बना है । राज मतलब राजा अथवा राज्य । पहले पहल राजा, रजवारे हुआ करते थे और वे एक निश्चित भौगोलिक सीमा में बंधे भूभाग पर राज्य करते थे । अपने राज्य की प्रजा और अपना सिंहासन सुरक्षित रखना उनका परम कर्तव्य होता था । अपनी शक्ति विस्तार के लिए वे अगल बगल के राजाओं (राज्यों के नेता) से या तो सामान्य आग्रह कर अपने अधीन करना चाहते थे या फिर शक्तिबल, युद्ध कर के अपने अधीन कर लेते थे । थोड़ा और विश्लेषण करें तो साम, दाम, दंड भेद का इस्तेमाल कर अपनी ताकत को बढ़ाते थे । इसे फिर कूटनीति भी नाम दिया गया । अच्छा राजा वह है जो युद्ध नहीं, अपनी कूट नीति (कुटिल बुद्धि ) का इस्तेमाल कर अन्य राज्यों यथा राजाओं को अपने अधीन रखे ।
पौराणिक युग की बात करूँ, तो इसमें सबसे पहले देवासुर संग्राम की चर्चा करनी होगी – पौराणिक कथा के अनुसार देवता लोग तो स्वयम स्वर्ग का सुख भोगते थे और असुरों को हमेशा निकृष्ट मानकर उसे पृथ्वी लोक पर राज करने के लिए, या कहें कि नाना प्रकार के कष्ट भोगने के लिए प्रतारित भी करते रहते थे । असुरों में चेतना लौटी तो वे भी स्वर्ग के सिंहासन के लिए देवताओं से युद्ध करने लगे । देवता पराजित होकर भगवान विष्णु के पास गए और उनके परामर्श अनुसार समुद्र मंथन हुआ और उससे निकले अमृत को बाँटने में भी कूटनीति का इस्तेमाल हुआ ।
इस कूटनीति का सबसे अच्छा उदाहरण रामायण है । जहाँ रावण के मारने के लिए उसके ही भाई विभीषण का सहारा भगवान राम को लेना पडा था । अब आते हैं महाभारत काल में – जन्म से अंधे होने के कारण धृतराष्ट्र बड़े होने के बावजूद राजा नहीं बनाये गए, जिसके संताप को वे जीवन भर नहीं भुला सके और अपने साले शकुनी और पुत्र दुर्योधन के कुटिल चालों से पांडवों को समाप्त करने में कोई कसर न छोड़ी और अंत में वे श्री कृष्ण की कूटनीति के आगे हार गए ।
ये सब बहुत पुरानी बाते हैं, बावजूद इसके यह हमें बहुत कुछ सिखाती है, पर हम सबक कहाँ लेना चाहते हैं ? सत्ता मोह कुछ ऐसा सर चढकर बोलता है कि हमारे नेता फिर उसी कुटिलता का सहारा लेकर अपनी सार्वभौमिकता को प्राप्त करने में सतत लगे रहते हैं ।


क्या सचमुच राजनीति बुरी चीज है ?
नेपाल राजतंत्र का सुख तो कुछ समय पहले तक लेता रहा है । लोकतंत्र अभी यहाँ शैशवावस्था में ही है, इसलिए राजतंत्र वाली मानसिकता बहुत हद तक कायम ही है । सही है आदत बदलने में वक्त तो लगता ही है । इन बातों को अगर हम परे रखें तो भी एक अत्यावश्यक बात जो है वह यह है कि किसी भी राष्ट्र के विकास में अगर सबसे अहम कुछ होता है तो वह है स्थिरता जिसका अभाव लोकतांत्रिक नेपाल की राजनीति में शुरु से रहा है । राजनैतिक अस्थिरता यहाँ की नियति बन गई है । देश और देश का विकास राजनेताओं के स्वार्थ की वेदी में समिधा बन गई है । नेपाल की राजनीति में अब तक का यह इतिहास ही है कि किसी भी पार्टी या प्रधानमंत्री ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है । देखा जाय तो यहाँ सत्ता और राजनीति किस्तों में बँट गई है । ये परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि आम जनता के मन में देश की राजनीतिक अवस्था को देख कर राजनीति शब्द के लिए वितृष्णा पैदा करती है । एक जुमला प्रायः सभी कहते हैं किराजनीति बहुत बुरी चीज है । परन्तु क्या सचमुच राजनीति बुरी चीज है ? इतिहास जिन्हें महान मानता आया है, जो इस राष्ट्र, समाज और संस्कृति के सृजनहार कहे जाते रहे हैं, क्या वे भी राजनीति को इतनी ही गंदी चीज मानते थे ? इतिहास के आइने में देखें तो ऐसा नहीं लगता । हमारे समाज पर रामायण और महाभारत का प्रभाव जगजाहिर है । साहित्यिक कृतियां होने के बावजूद इनके कथापात्रों के प्रति लोकश्रद्धा इतनी प्रबल है कि वे समाज में देवता के रूप में स्थापित हैं । रामायण के कथानायक राम राजनीति को लोकनीति जितना ही महत्वपूर्ण मानते हुए लक्ष्मण को मरणासन्न रावण के पास राजनीति का ज्ञान लेने भेजते हैं । महाभारत के भीष्म पांडवों को श्रेष्ठ राजनीति का उपदेश देते हैं । विदुर नीति श्रेष्ठ राजनीति का ही पर्याय है । महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध दोनों राजपरिवारों से आए थे । उन्होंने राजकाज में सीधे हिस्सा नहीं लिया, लेकिन वे अपने–अपने समय में बड़े साम्राज्यों के संपर्क में रहे । धर्म–दर्शन के विस्तार के लिए उन्होंने उनका सहारा लिया । चाणक्य प्रणीत ‘अर्थशास्त्र’ उस समय का महत्वपूर्ण राजनीतिक विमर्श है ।
एक प्रसंग है कि अकबर के बुलावे पर फतेहपुरी सीकरी पहुंचे कुंभनदास ने उसे सीधे–सीधे संबोधित किया—‘संतन को कहा सीकरी सो काम आवत–जात पनहियां टूटी बिसर गयो हरिनाम रजा को मुख देखे दुख लागे ताको करन परी परनाम ।” उन्हीं के समकालीन तुलसीदास ने भी मंथरा के मुंह से कहलवाया, ‘कोउ नृप होय हमें का हानि । चेरि छांडि़ न होइब रानी ।” यह असल में एक दासी द्वारा अपनी रानी को उलाहना था, जिसके द्वारा वह कैकयी को अयोध्या में चल रही राजनीतिक गतिविधियों से सावधान कराना चाहती है । मंथरा का उद्देश्य राजनीति से पलायन नहीं है । वह तो राजनीति की दौड़ में आगे रहने के लिए रानी कैकयी को उकसावे भरी सलाह देती है । कुंभनदास भी राजनीति का तिरस्कार नहीं करते । बल्कि सत्ता द्वारा दूसरों के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप का विरोध उनके कथन में है । यह जनसाधारण का आक्रामक सत्ता के अनाचारों से दूर रहने तथा उसको अपनी नैतिक सत्ता से परिचित वाला अनुभव–सिद्ध बोध था ।
अच्छी राजनीति के लिए अच्छे और बड़े नैतिक संकल्प की आवश्यकता पड़ती है । दुरावस्था से मुक्ति के लिए संकल्प का धनी, नैतिक और निष्ठावान केवल एकयक्ति पर्याप्त है, जिसका लोकतंत्र में अटूट विश्वास हो और जो अतीत की अपनी सभी दुर्बलताओं को भुलाकर परिवर्तन को अपना एकमात्र लक्ष्य बना ले ।
केवल सत्तासीन हो जाना राजनीति नहीं है । सत्ता को लोकोन्मुखी बनाए रखने के लिए किया जाने वाला संघर्ष भी राजनीति ही है । किन्तु नेपाल की राजनीति की परिभाषा इन सबसे परे है । नेपाल में राजनीति का अर्थ सिर्फ चन्द लोगों में सिमटा तंत्र है जहाँ समुदाय विशेष हावी रहा है और आगे भी रहने की कोशिश कर रहा है । यहाँ राजनीतिक सुधार की गुंजाइश नजर नहीं आ रही है, क्योंकि मुख्य पार्टी की नजरों में जो है वह पूर्ण है । जहाँ नए नवेले विश्व के उत्कृष्ट संविधान में संशोधन की माँग को सीधे सीधे विखण्डन से जोड़कर देखना दुर्भाग्यपूर्ण है वहीं उसकी आड़ में राष्ट्रवाद की आग में सत्ता प्राप्ति की रोटी सेंकना अतिदुर्भाग्यपूर्ण । संविधान एक जीवित दस्तावेज है जिसमें समयोचित सुधार की समभावना आद्योपान्त बनी रहती है । क्योंकि यह जीवन, समाज और उससे जुड़ी सामाजिक राजनीतिक और आर्थिकयवस्था परिवर्तित होती रहती है इसलिए इससे जुड़ा विधान भी समयानुसार परिवर्तित होता रहता है । किन्तु नेपाल की राजनीति इस परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पा रही है । जो कल था, उसे उसी रूप में लागू कर वह शासन करना चाहती जो कि वर्तमान परिवेश में अकल्पनीय है ।

राजनीतिक सुधार की आवश्यकता ः
इन सारी बातों को अगर विश्लेषित किया जाय तो हमें यह मानना होगा कि नेपाल की राजनीति में राजनैतिक सुधार की आवश्यकता है । राजनीतिक सुधार का मतलब है जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप कानूनों और संविधानों का सुधार । जनता की अपेक्षाओं में सभी लोगों की अपेक्षाएं शामिल हैं । चाहें वह अमीर हो या गरीब, दक्षिणपंथी हो या वामपंथी, पूंजीवादी हो या साम्यवादी, विकेन्द्रवादी हो या केन्द्रवादी, अतिवादी हो या मध्यमार्गी, आस्तिक हो या नास्तिक, देशी हो या विदेशी, स्वार्थी हो या परमार्थी । लोकतंत्र में इन सबको एक वोट का समान अधिकार प्राप्त होता है, किंतु राज्य की अर्थव्यवस्था की निर्णय प्रक्रिया में इनकी समान भागीदारी नहीं होती । भागीदारी की न्युनतम समता के लिए राजनीतिक सुधार की जरूरत है । राजनीतिक सुधार का आशय ऐसी चुनाव प्रणाली विकसित करने से है, जिससे बुद्धिमान लोगों के साथ साथ सज्जन लोगों को राजसत्ता तक पहुंचाना सम्भव हो सके । राजनीतिक सुधार का आशय राजनीतिक पार्टिर्यों का एक ऐसा संविधान विकसित करने से है, जिससे वह पार्टी राजनीतिक सुधारों का काम करने में सक्षम हो । राजनीतिक सुधार का आशय एक ऐसी राजव्यवस्था विकसित करने से है, जिससे केवल क्षैतिज प्रभुसत्ता (यथा देशों की प्रभुसत्ताओं) को ही नहीं, मंजिलेदार प्रभुसत्ताओं (यथा विश्व, अर्धविश्व, व चौथाई विश्व) को भी मान्यता मिल सके और राजसत्ता व अर्थसत्ता में उनका हिस्सा मिल सके । आदि ।
राजनीतिक सुधार की इस परिकल्पना को अगर हम नेपाल के सन्दर्भ में सोचें तो इससे देश का परिदृश्य बदल सकता है । सही मायने में एक नए नेपाल का निर्माण सम्भव हो सकता है । उस नए नेपाल का जिसका सपना यहाँ के आम नागरिक ने देखा था । नेपाल में राजनीतिक सुधार से काफी हद तक विषमताओं के बावजूद आर्थिक गुलामी से पैदा हुई गरीबी का खात्मा हो सकता है । हर समुदाय को अपनी अपनी आस्थाओं और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ जीने की आजादी मिल सकती है । देश को अगर संघीयता मिलती है तो प्रदेश सरकार को प्राप्त विशेषाधिकार से संस्कृतियों को सुरक्षा कवच मिल सकता है । सत्ता तक सही लोगों की पहुँच हो सकती है । जो वर्ग संघर्ष आम लोगों में असंतोष पैदा कर रहा है उससे मुक्ति मिल सकती है और देश विकास की राह पर अग्रसर हो सकता है । हालाँकि यह सारी बातें नेपाल के वर्तमान अवस्था में महज कपोलकल्पना लगती है परन्तु एक नई सोच के साथ आगे बढने की उम्मीद तो हम कर ही सकते हैं ।

एक नजर नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री पर ः
वैसे देउवा के अच्छे दिन बारह वर्षों के बाद आए हैं देखना यह है कि नेपाल के अच्छे दिन कब आएँगे ? संसद के बड़े दल काँग्रेस के सभापति शेरबहादुर देउवा इससे पहले तीन बार प्रधानमंत्री बन चुके हैं । २००४ साल में डडेलधुरा में आपका जन्म हुआ । राजनीतिक संघर्ष के क्रम में आपने नौ वर्ष जेल में बिताया है । प्रजातांत्रिक विद्यार्थी आन्दोलन से आपने राजनीति में कदम रखा । देउवा नेविसंघ के प्रथम सभापति बने और २०४६ में प्रजातंत्र आने के बाद से अब तक तीनों संसदीय निर्वाचन और दूसरे जनआन्दोलन के बाद दोनों संविधान सभा में लगातार विजयी होते आए हैं । ४५ वर्ष की उम्र में आप गृहमंत्री बने और पाँच वर्ष के भीतर ही प्रधानमंत्री की कुर्सी इन्हें मिल गई थी । २०४८ के आमनिर्वाचन के बाद २०५२, २०५८, २०६१ में आप प्रधानमंत्री का पद सम्भाल चुके हैं । आप सत्ता के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं बावजूद इसके आप पर असफल प्रधानमंत्री होने का आरोप भी लग चुका है । देखना यह है कि इस बार उनकी कार्यक्षमता देश की राजनीति में कौन सा मुकाम हासिल करती है । क्योंकि चुनौतियाँ उनके सामने भी वही हैं जो एमाले और माओवादी सरकार के सामने थी । इसके पहले आपने प्रधानमंत्री के रूप में १८ महीने, १४ महीने और ८ महीने कार्य किया है, यह कार्यकाल चंद महीनों में या वर्षों में जाएगा यह देखना बाकी है ।

देउवा के अच्छे दिन बारह वर्षों बाद आए हैं, नेपाल के अच्छे दिन कब आएँगे ? श्वेता दीप्ति

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