देउवा ,प्रचण्ड ने समावेशी समानुपातिक की धज्जी उडाई : अमरदीप मोक्तान

अमरदीप मोक्तान ,डाडा खर्क ,दोलखा , २७ अगस्त |
 तीन सप्ताह की कडी मशक्कत के बाद  कांग्रेस पार्टी में  मंत्रियो  के लिस्ट   पर सहमति हो गई  अन्ततः अब प्रचण्ड मन्त्रीमंडल  पूर्णतापन   निश्चित प्रायः है, प्रचण्ड मन्त्रीमंडल का स्वरुप समावेशी समानुपातिक शब्द पर क्रुर प्रहार है .  माओवादी, काँग्रेस, राप्रपा, नेकपा संयुक्त द्वारा प्रचण्ड मंत्रिमंडला में समावेश किए गए मंत्रियो में   नेकपा माओबादी केन्द्र के  आठ  मन्त्रियो में  २  क्षत्रिय, (कृष्णबहादुर महरा,  राम कार्की,)  ३  बाहुन   ( जनार्दन शर्मा  , हितराज पाण्डे,  धनीराम पौडेल) १ मधेशी   (अजयशङ्कर नायक) , १  दलित (दलजित श्रीपाली),१ आदिवाशी थारु (गौरीशंकर चौधरी) मन्त्रि बनाए गए है ्र नेपाली कांग्रेश के तरफ से  १५  मंत्रियो में  २  मधेशी (बिमलेन्द्र निधि , सीतादेवी यादव ) ,३ बाहुन (रमेश लेखक,  नविन्द्रराज जोशी, शंकर भण्डारी)       ७ क्षत्रिय  (ठकुरी अर्जुननरसिंह केसी, प्रकाश शरण महत ,बालकृष्ण खाँड , जीवनबहादुर शाही, गगन थापा, केशवकुमार बुढाथोकी, हृदयराम थानी )   २ आदिवासी ( सुर्यमान गुरुङ  ,रोमीगौचन थकाली) और १ गिरि समुदाय से (दीपक गिरि) मन्त्री बने हैं, राष्ट्रिय प्रजातन्त्र पार्टी के हिस्से के २ मंत्रियो में  एक क्षत्रिय से दिपक बोहरा और बाहुन से विक्रम पाण्डे को मन्त्रि बनाया गया है ,नेकपा संयुक्त के हिस्से के एक मन्त्री जयदेव जोशी (बाहुन) ने मन्त्री बनने का सौभाग्य प्राप्त किया है, छोटे दल के हिस्से मे प्राप्त होने वाले  मन्त्री चयन मे  समावेशी समानुपातिक प्रति ध्यान दिया जाएगा या नही देखना बाकी है लेकिन अब तक के मन्त्री चयन को देख्कर स्पस्ट रुप से कहा जा सकता है कि प्रधानमन्त्री  प्रचण्ड ने मन्त्रीमंडल गठन मे  समावेशी समानुपातिक शब्द का  तिरस्कार  तथा संबिधान के  मूल मर्म पर जोरदार प्रहार  किया है, संबिधान निर्माण होना निश्चित रुप मे राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण उपलव्धि है लेकिन   संबिधान में  लिपिबद्ध हे शब्द का यदि  अक्षरस पालना न हुआ तो संबिधान  रद्दी कागज मे परिणत होने का शंका बन रहेगा,  नेपाली जनता ने  संबिधान तो प्राप्त किया लेकिन संबिधान कार्यान्वयन चालक का नियत स्वक्ष  एवं  पूर्वाग्रह रहित न हो तो  संबिधान कि  सफलता पर  प्रश्न चिन्ह उत्पन्न हो सकता है |

prachand-&-Deuba

 महत्वपूर्ण मन्त्रालय  हथियाने के बाद  समावेशी समानुपातिक शब्द के खाली स्थान को  पूर्ति करने के लिए चतुर प्रचण्ड तथा देउवा  राज्य मन्त्री मे छोटे दल  से कुछ आदिवाशी दलित मधेशी को समावेश कर के मुर्ख बनना लगभग पक्का है ्र वंश है तो अंश(हिस्स्सा) मिलन तय होता है लेकिन  दुर्भाग्य नेपाल के  शासन सत्ता मे अब तक जो भी  सत्तासीन हुए है उनलोगों ने अंश की बात तो छोड ही दे, अंश, हक  अधिकार की मांग करने वालो के  वंश ही  समाप्त करने का  षड्यन्त्र रच जाता  है, नेपाल मे न तो  राजा ने  राज्य को अभिभावक बनने का प्रयत्न किया  न तो  प्रधानमन्त्री , मन्त्री ने  राष्ट्र के  प्रधानमन्त्री, होने का आभास  दिया और तो और भविष्य की परवाह किए बिना अपने परिवार  अपने समुह के घेरा से बाहर निकालने का प्रयत्न भी नही किया  फलस्वरूप नेपाल मे हमेशा राजनेता की  रिक्तता बनी रही,   महात्मा गान्धी ने  राष्ट्र को विषय मे  परिवार को कभी भी  हस्क्षेप नही करने दिया , महात्मा  गान्धी की  दृष्टि में भारत की  सम्पूर्ण जनता समान थी  उन्होने  जात पात धर्म  के आधार पर किसी के साथ  भेदभाव  न किया न होने दिया शायद इसीलिए  भारतीय जनता ने मोहनदास करमचन्द गान्धी  को  महात्मा तथा राष्ट्रपिता  जैसे आदरणीय शब्द से  विभूषित किया,  महात्मा गान्धी के कितने  सन्तान और उनके नाम के विषय मे यदि जनमत संग्रह किया जाय तो  बहुसंख्यक  भारतीय जनता को इसके बारे मे जानकारी नही है  क्योकि  राष्ट्र और  परिवार में कितनी दुरी होनी चाहिए  महात्मा गान्धी अच्छी तरह समझते थे, महात्मा गान्धी ने  परिवार वाद को राष्ट्र और राजनीति के साथ कभी नही जोडा और सदैव दूरी बनाए ही रखा, आज तक नेपाल के किसी भी क्षेत्र के नेता राजनेता  क्यो नही बन सके ,  नेपाली जनता नेता को क्यो  घृणा कि  दृष्टि से देखते हैं । नेता जनता की नजर में क्यों  आदरणीय नही बन सके इन सारे प्रश्न का  सरल उत्तर है  हाल तक  सत्तासीन हुए  नेता लोग अपने  परिवार नाता सम्बन्ध  के घेरा से  बाहर  न निकलना   प्रमुख कारण है  ्र राजा ज्ञानेन्द्र राष्ट्र के  अभिभावक विपरित   पारस  पिता बनने के कारण राजसंस्था का अन्त और हमेशा के लिए सत्ताच्युत  होना पडा ,स्वर्गीय गिरिजा प्रशाद कोइराला पुत्री मोह तथा आफन्तजन के  मोह से बाहर नही निकल सके  गर्व बोध  के साथ अपने को मधेश  का मसीहा समझने वाले  राजेन्द्र महतो ,राजकिशोर यादव ,अनिल झा पत्नीमोह में उलझे हुए है और वर्तमान प्रधानमन्त्री  पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड का पुत्र मोह  लिप्त होने का  उदाहरण नेपाली जनता देख रही है ।
ऐसे नही विगत मे भी  नेपाल मे संबिधान  का निर्माण हुआ था  लेकिन संबिधान  सफल  क्यो नही हुआ ? क्यो  असफल हुआ  ? जब जब संबिधान  मूल मर्म तथा भावना के साथ खिलवाड की गई संबिधान स्वतः निरस्त एवं असफल हो गया,  नेपाल में जितने भी  संबिधान का निर्माण हुआ वह संबिधान  कुछ सीमित वर्ग के लोगो द्वारा अपने  अनुकुल कि  ब्याख्या करने के लिए   मात्र  निर्माण हुआ था  उत्पीडित समुदाय को  संबिधान की  धारा उपधारा तथा कानुन का डण्डा दिखाकर  त्रसित  और दास बनाने के अलावा कुछ नही हुआ .
ऐतिहासिक संबिधान सभा द्वारा निर्मित   संबिधान विगत के  संबिधान कि तरह  घोर उल्लङ्घन तथा अपने अनुकूल ब्याख्या तर्फ उन्मुख होने का ज्वलन्त  उदाहरण वर्तमान मन्त्रीमंडल गठन मे  समावेशी समानुपातिक के  घोर  उपेक्षा  से कहीं विगत की तरह संबिधान असफल होने की तरफ उन्मुख   प्रतीत हो रहा है, राज्य के सभी  निकाय में  समावेशी समानुपातिक हो शब्द तो संबिधान मे  लिपिबद्ध तो हुआ लेकिन  नेपाल के शक्तिशाली राजनैतिक दल द्वारा क्यो नियम का पालन नहीं किया जा रहा है  ? अग्रगामी संबिधान का  निर्माण हुआ कहकर  गर्व बोध मात्र करने से संबिधान सफल नही होगा  संबिधान को  सफल बनाने के लिए संबिधान में लिखित शब्द का अक्क्षरस पालना करने के वातावरण  के निर्माण के विषय में  सोच बनानी जरुरी है   ।   काँग्रेस ने  नुवाकोट  जिल्ला से   २ मन्त्री अर्जुन नर्सिङ्ग केसी तथा प्रकाश शरण मन्त्रि  को मन्त्री बनाया है  यदि नुवाकोट  जिल्ला से ही मन्त्री चयन करना ही था तो  नुवाकोट क्षेत्र के  बहादुर सिङ्ग तामांग को यदि  मन्त्री बनाया जाता तो कौन सा  पहाड गिर पड़ता   ? काँग्रेस पार्टी ने  प्रदेश ३ मे इतने सारे जिला होते हुए नुवाकोट जिले से दो लोगों को  मन्त्री बनाकर  प्रदेश ३ का  प्रतिनिधित्व दिखाना   राजनीतिक बेइमानी के अलावा कुछ नही है  ्र  यदि विगत की   असफल परम्परा की  निरन्तरता तथा अपने पर ही दृष्टि रखने की परम्परा   यथावत रही तो  ऐतिहाशिक संबिधानसभा  निर्मित संबिधान  असफल होना  निश्चित है, संबिधान का  पालन  राष्ट्र अनुकुल होना चाहिए न  कि अपने  परिवार अपने  समुह अपने  मित्र अनुकुल  होना चाहिए ्र राष्ट्रीय स्वाभिमान की बाते  कुछ लोगो के स्वस्थ होने से नही होने वाला है राष्ट्रीय स्वाभिमान मजबूत तथा सफल  तब होगा  जब राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक राष्ट्र मे  अपनत्व बोध महसूस करे, राष्ट्रीय स्वाभिमान किसी की  जमीन्दारी नहीं है  सम्पूर्ण नेपाली जनता की  समान हिस्सेदारी और अपनत्व से  मात्र  राष्ट्रीय स्वाभिमान की नींव मजबूत होना  सम्भव है, नेपाली जनता की  विडम्बना है  माओवादी दस्तावेज में  काँग्रेस  पार्टी को प्रधान शत्रु उल्लेखित किया गया है इसके बावजूद, माओवादी को  जनयुद्ध मे  जबरदस्ती धकेलने  वाले कांग्रेस, माओवादी गठबन्धन समावेशी समानुपातिक शब्द का  घोर उपहास  करते हुए एक ही मंच पर   विराजमान हो कर  नेपाली जनता को  मुर्ख  बना रहे हैं विगत में जो हुआ  सो हुआ अब भी नेपाल के  राजनीतिक  पार्टियों ने अपने  आचरण में सुधार नही किया तो  नेपाल  नये रुप के  भयङ्कर द्वन्द तरफ उन्मुख होना  निश्चित है ।
Amardip Moktan,Writer

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