देख तमाशा देख ! बिम्मीशर्मा

बिम्मीशर्मा, काठमांडू १३ अक्टूबर |

इस देश में पर्व, त्योहार और जात्रा तो होते ही रहते हैं । पर तमाशा कभी, कभार ही होता है । ऐसा ही तमाशा या नाटक मञ्चन जो भी कहिए प्रधानमन्त्री के चुनाव में संसद मे हुआ उसे देख कर बेचारी शर्मोहया को भी बहुत ही शर्म महसुस हुई ।

राजनीति में कौन दुश्मन है और कौन दोस्त यह तमाशा देखने वाला कोई जान नहीं सकता । यहां पलक झपकते दोस्त और दुश्मन में अदला बदली हो जाती है । यहां की राजनीति का नायाब तमाशा देख कर आने वाली पीढी पढ़ना ही छोड़ देगी । जब आठ कक्षा तक पढ़ा हुआ आदमी बिना किसी योग्यता के देश के सर्वोच्च पद पर पहुंच जाता है और जिसका एक हाथ नहीं चलता और जिसके पास दूसरे का दान किया हुआ एक ही गुर्दा है । वह बडेÞ शान से देश चलाने की बात करता है । यह सब देख कर अस्पताल खोलने वालों और डाक्टर और अन्य स्वास्थ्यकर्मीयों को भी शर्म महसुस होती होगी । वह सोचते हाेंगे ‘हमलोग इतना पढ़ कर भी कोई तीर न मार सके’ ।

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उखान टूक्का (मुहावरा) के सम्राट श्री के.पी. ओली देश की जनता महीनों से आन्दोलन कर रही है । तेल, गैस और अन्य आवश्यक वस्तुओं के अभाव के बारे में जिस ने एक शब्द भी न बोला वही इस देश का प्रधानमन्त्री बन गया । मजे की बात तो यह भी है कि मधेश मे आन्दोलनरत दल के इक सारथी फोरम लोकतान्त्रिक के अध्यक्ष विजय गच्छेदार भी ओली की नैया के खेवैया बन गए ।

मन्त्री पद मिलते ही गच्छेदार मधेश आन्दोलन से ऐसे गायब हुए जैसे गधे के सिर से सिंग । मधेश की जनता अपने इस तारणहार के गद्धारी को बौखलाए हुए देख रही है । गच्छेदार और एमाले के नेताओं को देख कर लगता है यह जन्मजात मन्त्री है । यह पैदा होते समय मन्त्री पद की कुर्सी भी ले कर ही पैदा हुए थे शायद । गच्छदार को अमेरिका का मन्त्री होने का सौभाग्य मिले तो यह देश को ही आधे, पौने दाम मे बेच देगें ।

और सब से आश्चर्य की बात राजतन्त्र और हिन्दू राष्ट्र के बड़े हिमायती इस देश के ‘गउ’ प्राणी अर्थात राष्ट्रिय प्रजातन्त्र पार्टी के अध्यक्ष कमल थापा ने अपने सारे लाज के आवरण को उतार कर न सिर्फ ओली को समर्थन किया और मन्त्री भी बन गए । पञ्चायती व्यवस्था मे मन्त्री होने वाले और प्रजातन्त्रकाल ०६३ साल के आन्दोलन में चरम दमन करने वाले थापा लोकतन्त्र में मन्त्री बन गए ? इस से बड़ा और भद्धा मजाक और क्या होगा ? राजनीति जो न कराए कम है ।

ओली थापा को मनाने और अपने लिए समर्थन जुटाने के लिए खुद गए । जब प्यासे के पास नदी खुद बह कर जाए तो बहना थोडे छोड़ेगा ? बेचारे थापा पिछले ९ साल से बिना मन्त्री पद के कैसे जी रहे थे यह तो उन्हें ही पता है । जब देश में हिन्दू धर्म का शंखनाद नहीं हुआ और अपने हाथ में कुछ नहीं आया तो इन्हें अपनी औकात का पता चल गया । ‘भागते भूत की लगौंटी ही भली’ सोच कर ओली को प्रधानमन्त्री के लिए समर्थन किया और उस के बदले मन्त्री पद हथिया लिया ।

और सबसे ज्यादा दरियादिल होने का नाटक किया प्रचण्ड ने । वह चाणक्य (किगं मेकर) की भूमिका करते करते अपना असली चरित्र सबको दिखा गए । जब पूर्व प्रधानमन्त्री सुशिल कोईराला का जगं बहादुर से तुलना करते हुए प्रचण्ड जगं बहादुर को ही कुत्ता बोल गए । उस समय प्रचण्ड यह भूल गए कि वह कहां पर खड़े हैं और क्या बोल रहे हैं ? जिस ने १० वर्ष तक चले माओवादी जनयुद्ध में १७ हजार लोग मारे । जो खुद भेड़िया है और जनता को जन्तु समझ कर शिकार करता है । वह खुद दूसरे को कुत्ता बोल रहा है । यह दृश्य देख कर राजनीति को भी जरुर ‘लाज’ महसुस हुआ होगा ।

और प्रचण्ड के एक मात्र सुपुत्र प्रकाश दहाल । यह तो आग में पानी नहीं घी डालने का काम करते हैं इन के पास तो अलौकिक शक्ति है जो पिता प्रचण्ड के पास भी नहीं हैं । हव्वा फैलाना और आग को हवा देना कोई इनसे सीखे । भारत के विदेश मन्त्रालय से एस. बि. आई. बैंक खाते पर ९३ करोड भारतीय रुपैंया भेजा जाना और उसको नेपाली कांग्रेस द्धारा व सुशिल कोईराला को सांसद खरीदने के लिए भारत सरकार द्धारा भेजा गया पैसे का षडयन्त्र कह कर खूब प्रचारित किया । नेपाली मीडिया ने भी इसे बढ़ा–चढ़ा कर छापा । पर नतीजा शून्य ‘ढाक के तीनपात’ जैसा ।

बाप चाणक्य की भूमिका करते, करते उब गया तो बेटा षडयन्त्र और अफवाह की राजनीति करने लगा । ‘बापनम्बरी तो बेटा दश नम्बरी’ निकला । ओली को प्रधानमन्त्री बनना था और वह हर हथकण्डा अपना कर कामयाब हुए । बाहर जिस नाटक का पटाक्षेप हुआ है भीतर के नाटक और कुटिल चालों से अभी यहां की जनता अन्जान है । भविष्य में इस नाटक से पर्दा उठेगा ही । उस दिन आज जिस तरह लोग सुशिल कोइराला को कोस रहे हैं और बददुआं दे रहे हैं । उसी तरह एक दिन ओली को भी कोसेगें और बददुआं देगें । बस तब तक राजनीति के दलदल में कीचड़ से नहाए हुए नेताओं का तमाशा देखिए और मजा लीजिए ।(व्यग्ंय)

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