Thu. Sep 20th, 2018

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान कितना बदल गया इंसान

श्वेता दीप्ति,  देश कोई भी हो, घटना किसी के साथ भी हो पीडा एक सी होती है । आखिर हैवानियत का ये कौन सा रुप है ? क्या इंसान अब इ.सान नहीं रह गया ? अगर इंसान ये हैं तो दरिंदा क्न्हिें कहा जाएगा ? जहाँ देखो, जिधर देखो मीडिया, अखवार हर जगह बलात्कार …बलात्कार…. बलात्कार यह शब्द आज इतना आम हो गया है कि बच्चे भी यह सवाल नहीं करते कि इसका अर्थ क्या है ? एक समाचार जेहन से उतरता नहीं है कि दूसरा सामने आ जाता है । पिता, भाई, मित्र, पति किस पर भरोसा करे दुनिया की आधी आबादी ? ऐसी ऐसी घटनाएँ जिसे कहने में शर्म आए, क्या ऐसी घिनौनी हरकत करने वालों की रुह नहीं काँपती ? वो भूल कैसे जाते हैं कि एक माँ, बहन, पत्नी उसी का रुप है जिसे वो रौंद रहा है ? समाज खामोश है उसे, सरकार से उम्मीद है, सरकार मुआवजा देती है और अपने कत्र्तव्य का इतिश्री समझ लेती है और कानून उसमें तो फँसने का एक रास्ता है तो बचाव के इतने छेद हैं कि मुजरिम आसानी से निकल जाता है । भारत के मुम्बई शक्ति मिल गैंग रेप केस में पहली बार फाँसी की सजा सुनाई गई । किन्तु एैसे मामले में एक ऐसा त्वरित कानून हो जहाँ इंतजार कम करना पडे । केस बंदायू का हो, कपिलवस्तु का हो या मलेशिया का या फिर विश्व के किसी भी कोने का, जूर्म एक ही है और उसे भोगने का दर्द भी एक ही है तो क्यों नहीं एक ऐसा विश्वस्तरीय कानून बने कि सजा भी एक ही हो । शायद यह सम्भव नहीं हो पर क्या करें जब पीडा होती है तो दिमाग नहीं दिल काम करता है । आज का यह समाज अगर सभ्य है तो अच्छा होता कि हम असभ्य ही होते । इंसानियत शर्मसार है और इंसान फिर भी जिन्दा है ।

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of