देर न हो जाय कहीं

मधेशियों ने नेपाल पुलिस, सशस्त्र पुलिस को आजमा लिया है । वर्तमान में किए गए नरसंहार के बाद भी जय मधेश का नारा कम नहीं हो पाया है ।  
सेना की शाख अभी बाँकी है । उनको सड़क पर ला कर बदनाम मत करो ।
 क्योंकि जो हुंकार मधेशी÷थारुओं ने भरा है उसको दुनिया की कोई ताकत नहीं झुका सकती है और यह जमीनी सच्चाई है ।

रणधीर चौधरी :इस संविधान के निर्माण से पहले नेपाल छः संविधानों के विधान से गुजर चुका है । हरेक संविधान निर्माण के बाद यही कहा गया कि— यह संविधान दुनिया का सबसे सबल और उत्कृष्ट संविधान है । परंतु हुआ क्या ? नेपाली जनता ध्रुवीकृत होती गई । ध्रुवीकरण था, पंचायत और बहुदलवादी के बीच, राजतंत्र और प्रजातन्त्र के बीच । परंतु अब जो ये ताजा संविधान आया है, २०१५ का इसने देश को एथनिसिटी के आधार पर धु्रवीकृत कर दिया है । संविधान घोषणा के तुरन्त बाद एकतरफ दीवाली मनाई गई और दूसरी तरफ मातम मनाना शुरु हुआ । स्पष्ट भाषा मे कहा जाय तो देश पहाड़ी भरसेज मधेशी÷थारु में बँट चुका है और काठमांडू का रवैया वही पुराने समय की

कांग्रेस, एमाले और माओवादी में रहे मधेशियो को कहना चाहुँगा— “दिखाओ चाबुक ये कमाल करते हंै, यह वो शेर हैं जो सरकस मे काम करते है ।” इनको नही भूलना चाहिये की मधेश आन्दोलन से आने बाली उपलब्धियाें का हकदार वे भी होंगे । उनके बच्चे भी उन उपलब्धियों का लुत्फ उठाएँगे
नीति और बन्दूक के बल पर अपनी हेजेमोनी को दुहराने वाली दिखाई दे रही है । उनको ये पता होना चाहिये कि यह “टुुइटर जेनरेशन” है जहाँ लोग इक्कीसवीं सदी के मूल्य और मान्यताओं को बड़े बारीकी से समझते हंै और अपने अधिकार को पाने के लिये कुछ भी कर जाने को तैयार होते हंै ।
अखण्डता पर आँच
कहा जाता है कि राष्ट्र निर्माण देश निर्माण की एक ऐसी प्रक्रिया है, जहाँ नागरिक आपस में अपना स्वार्थ, लक्ष्य और प्राथमिकता के प्रति साझा और समान अधिकार महसूस कर सकता है । ताकि उनलोगाें में आपस में पृथक होने की इच्छा और चाहत कभी भी नहीं आ पाए । क्योंकि असमानता की भावना ही असंतोष लाती है और यही असंतोष अधिकार प्राप्त करने की राह पर लोगों को या किसी समुदाय विशेष को भेजती है । किन्तु वर्षों से चली आई परिपाटी को ही नेपाल में आजतक लागु करने की कोशिश की जा रही है शायद यह सम्भव न होने देने की काठमांडू के कुछ कुलीन वर्गों ने जिद ठान रखी है । वरना वर्तमान संविधान को अन्तरिम संविधान से भी पश्चगामी बनाने को क्यों सोचते ? चाहे वो नागरिकता का मुद्दा हो, निर्वाचन का हो, प्रादेशिक बँटवारे की बात हो या और कुछ ।
मधेशी÷थारु पर लादी गई आन्तरिक औपनिवेश हो या नेपाल के अन्य क्षेत्रों की समस्या । सब के सब पीडि़त हैं । हिमाल तो मै नही जा पाया हूँ । लेकिन, पिछले दो सालों से मुझे मधेश में काम करने को मौका मिला है जिससे मंै यहाँ की राजनीतिक परिदृश्य, क्षेत्र की माँग, पिछड़ापन इन सभी बातों को समझने का प्रयास करता रहा हूँ । जिस तरह शासकों द्वारा बिना हक अधिकार देते हुए मधेशी÷थारु से राष्ट्रीयता का राग अलापने की अपेक्षा की जा रही है वह सम्भव नही दिखाई दे रहा । वर्तमान अवस्था यह है कि मधेश की जनता में एलिनेसन (अलग–थलग) की भावना बढ़ती दिखाई दे रही है, और यह स्वाभाविक भी है क्योंकि उपेक्षा और अपमान की पीड़ा को वो वर्षों से सहते आए हैं । अड्रियन गउलके ने अपने किताब, पोलिटिक्स इन डिपली डिभाइडेड सोसाइटी में कहा है कि, वैसा देश जहाँ की जनसङख्या एथनी सिटी की आधार पर पूरी तरह खण्डित होती है वहाँ राज्य द्वारा की गई किसी भी सहमति और फैसलों की वैधानिकता पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है । खास कर उपेक्षित समुदाय की तरफ से । गउलके ने आगे कहा है, अगर उपेक्षित वर्ग को लम्बे समय तक हक अधिकार नहीं दिया जाता है तो वे सब अपना राजनीतिक निकास तलाशने में लग जाते हैं और वह निकास होता है— सेसेसन या पार्टिसन का ।
समय द्वारा प्रमाणित इस सिद्घान्त को काठमांडू अनदेखा कैसे कर सकता है ? उसे इस सिद्धान्त को स्वीकार करना ही होगा कि आज अधिकार की जिस माँग को वो नहीं मान रहे हैं वही कल अलगाव की माँग में बदल जाएगी । पिछले एक महीने से मैंने, मधेश के गाँव—गाँव का दौरा किया है । राज्य की गोली से मारे गये नागरिकों के परिवारजनों से मिल रहा हूँ । हरेक गाँव में जनता आक्रोशित है । अबकी बार आर या पार की लड़ाई है, यह भावना प्रायः सभी सचेत मधेशी÷थारु में मैंने देखा है । यह भावना देश की अखण्डता के लिए खतरा बन सकती है, आश्चर्य है कि सत्तापक्ष इस बात की गम्भीरता को क्यों नहीं समझ पा रही है या फिर वो दमन के बल पर शासन करना चाह रहे हैं ? चुँकि मैं देश की अखण्डता को प्यार करता हूँ, इसलिए मुझे डर लगता है कि कहीं जनता अड्रियन गउल के द्वारा प्रतिपादित सिद्घान्त को न अपना ले ।
निकास पे निगाहेँ
मधेशियाें की जायज माँगों को जल्द सम्बोधन कर देश को सही राह पर लाना चाहिये । समय के साथ–साथ चलना अगर नहीं आता है तो वहाँ विनाश होता है । मधेशी मुद्दों को भारत का मुद्दा कह कर समस्या का समाधान अगले जनम तक भी होने की सम्भावना नहीं है । वार्ता के नाम पर चल रही नौटंकी को मधेशी नेताओं को भी समझना चाहिये और बाध्य कर देना चाहिये, ओली, कोईराला और दहाल को कि वो भारदह, जलेश्वर, बिरगंज या जनकपुर में आ कर वार्ता के लिये तैयार हो जाय । मधेशियों ने नेपाल पुलिस, सशस्त्र पुलिस को आजमा लिया है । वर्तमान में किए गए नरसंहार के बाद भी जय मधेश का नारा कम नहीं हो पाया है । सेना की शाख अभी बाँकी है । उनको सड़क पर ला कर बदनाम मत करो । क्योंकि जो हुंकार मधेशी÷थारुओं ने भरा है उसको दुनिया की कोई ताकत नहीं झुका सकती है और यह जमीनी सच्चाई है ।
अन्त में कांग्रेस, एमाले और माओवादी में रहे मधेशियो को कहना चाहुँगा— “दिखाओ चाबुक ये कमाल करते हंै, यह वो शेर हैं जो सरकस मे काम करते है ।” इनको नही भूलना चाहिये की मधेश आन्दोलन से आने बाली उपलब्धियाें का हकदार वे भी होंगे । उनके बच्चे भी उन उपलब्धियों का लुत्फ उठाएँगे ।

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