देवकोटा अध्ययन केन्द्र का उद्घाटन

देवकोटा अध्ययन केन्द्रका उद्घाटन कार्यक्रम चेल्सी स्कूल की सभा कक्ष में हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता अध्ययन केन्द्र के कार्यबाहक अध्यक्ष तथा पर्ूवमन्त्री रामहरि जोशी जी ने किया। प्रमुख अतिथि के रुप में डा. प्रा. चुडामणि बंधुजी मञ्चासीन हुए थे। केन्द्र के सचिव सरोज खनाल ने स्वागत भाषणा किया। देवकोटा अध्ययन केन्द्र और देवकोटा के जीवन पर प्रकाश डालतेु हुए डा. रामदयाल राकेश ने कहा कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी देवकोटा के जीवन पर प्रकाश डालना र्सर्ूय को दीपक दिखाने जैसा होगा। मुना-मदन गीति काव्य के आधार पर तिब्बत में देवकोटा की मर्ूर्ति स्थापित हो पूजा होतीहै । देवकोटा की रचनाओं में हिन्दी साहित्य के प्रसाद, पन्त और निराला तीनों की प्रतिभा एक साथ देखी जा सकती है। प्रसाद, पन्त, निराला के साथ देवकोटा का तुलनात्मक अध्ययन होने के साथ साथ विद्यावारिधि के लिए सोध का विषय बनना चाहिए, ऐसा उन्होंने कहा।
प्रमुख अतिथि डा. प्रा. चूडामणि बंधुजी ने कहा कि ने.सा. देवकोटा की रचनाओं से उच्चता पाया है। इसमें कोई दो मत नहीं। पडÞोसी साहित्यकारों को ने.सा.से परिचित कराने के लिए नेपाली किताबों का अनुवाद हिन्दी-बंगला भाषाओं में होना चाहिए तो हिन्दी बंगाली किताबों का अनुवाद नेपाली भाषा में होना चाहिए। जैसे देवकोटा रचित बापू को हिन्दी अनुवाद जोशी जी ने किया, उसी तरह महाराणा प्रताप के जीवन से सम्बन्धित किताब ‘हल्दीघाटी’ का अनुवाद नेपाली भाषा में होना चाहिए। देवकोटा के जीवनकाल में प्रकाशित रचनाओं तथा उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित रचनाओं को वर्गीकरण होना चाहिए।
अध्याक्षीय भाषण करते हुए रामहरि जोशी ने कहा कि देवकोटा के जीवन एवं साहित्य पर बोलने के लिए घंटों चाहिए। देवकोटा शब्द के जादूगर थे। देवकोटा के सर्न्दर्भ में एक अमेरिकन व्यक्ति द्वारा व्यक्त विचार का उल्लेख करते हुए कहा- देवकोटा निश्चय ही नेपाली साहित्य के डेकोटा विमान ही है। देवकोटा जैसे प्रतिभावान व्यक्ति कभी कभी सैकडÞों हजारों वर्षों में जन्म लेता है। देवकोटा जी के बारे में तुलनात्मक अध्ययन होना चाहिए। हम विश्व की बात करते है, किन्तु नेपाल में ०६२-६३ में ऐसी क्रान्ति आई, जो कहाँ – कब – उठाकर फेंक देगी पता ही नहीं। देवकोटा बहुभाषाविद् और बहुभाषा प्रेमी थे। लेकिन नेपाल में गलत राजनीति के कारण सात समुद्र पार अंग्रेजी भाषा को हम आदर करते हैं पर पडÞोसी समृद्ध भाषा हिन्दी को अनादर करते हैं, जो गलत बात है। कवि मन अदृश्य एवं दूरगामी भावना को पकडÞ लेता है और हमें बताता है कि हम कहाँ जा रहें है – साहित्यकारों की विचार प्रधान रचनाएं समाज और देश को आगे बढÞाती है।
हम अपनी संस्कृति से कट रहे हैं, जो उचित नहीं हैं। यदि हमारे पास साधन नहीं है तो हमे विदेशियों को खोजना होगा। विदेशी लोग संस्कृति के भूखे है। विदेशी लोग हमारे जैसे संकर्ीण्ा मानसिकता वाले नहीं होते हैं। हम में नकल्ची प्रवृति ज्यादा है। आज के पढÞेलिखे युवाओं की तुलना में हमारे पर्ूवज लोग अधिक उदार थे। तर्राई के लोग विद्यापति के गीतों को और अपनी परम्पराओं को भूलते जा रहे हैं, पर काठमांडू के नेवार जाति अभी भी सुबह शाम धार्मिक स्थानों में विद्यापति के भजन गीतों को सहर्षगाते हैं। पहले विशेष सामाजिक उदरता थी। अभी तो सबके सब संकुचित विचारों से भरे है। भारत को जो जितना अधिक गाली दे वो उतना बडÞा राष्ट्रवादी माना जाता है तो जो पहडिÞया को जितना अधिक गाली दे वो बहुत बडा मधेशियों का नेता माना जाता है। अभी संकट काल है। संकट में ही कवि या साहित्यकारों का जन्म होता है। कवि लोग अपनी कविता के माध्यम से राजनीति की शुरुवात करते हैं। जब तक कृष्ण द्वारा गीता का उपदेश नहीं आया, तब तक अर्जुन का गाण्डीव नहीं उठा। साहित्य के बाद मेल मिलाप का समय आता है। अब हमें भी मेल मिलाप का मार्ग अपनाना चाहिए, हमें अपने पुखोर्ं की तरह उदार बन कर समस्याओं का समाधान करना चाहिए। यह अध्ययन केन्द्र भविष्य में नेपाली भाषा, साहित्य से सम्बन्धित अनुसंधानात्मक कार्यो की ओर काम गरेगा ।

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