देवभूमि की दुखद दास्तान

उत्तराखण्ड साक्षत् देवभूमि हैं। यही गंगा अवतरित हर्ुइ, स्वयं शिव ने केदार में पाण्डवों को दर्शन दिया। स्कन्दपुराण में कहा गया है कि काशी में मरने से मुक्ति मिलती है, किन्तु केदारेश्वर के पूजन मात्र से मुक्ति मिल जाती है। हिन्दू संस्कृति में हिमालय का विशिष्ट स्थान है। इसके प्रति हिन्दुओं का शिर कृतज्ञता से झुक जाता है। हिमालय देवताओं की पवित्र भूमि है। यह देवाधिदेव शिव का वासस्थान है। इसकी विशालता और शुभता किसको आकृष्ट नहीं करती। महाकवि कालिदास ने हिमालय को याद किया है –
अस्त्युतरस्यां निशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः ‘रघुवंश)
जगद्गुरु शंकाराचार्य को भी इनकी गम्भीरता, उच्चता ने अपनी ओर आकृष्ट किया। श्री शंकर हिमालय की गम्भीरता को पान किए बिना कैसे विश्वविजयी कहलाते ! तर्सथ अपने परमगुरु भगवत् गौडÞपादाचार्य के दर्शनार्थ बद्रिकाश्रम आए, फिर वहाँ से केदारनाथ आए। कहा जाता है कि शंकराचार्य यहीं से उत्तर हिमालय की ओर चले और शिव में विलीन हो गए।

uttrakhanda_rain

देवभूमि की दुखद दास्तान

गौरीकुण्ड से ७ मील की दूरी पर मन्दाकिनी घाटी का मुकुटमणि केदार धाम है। केदारघाटी सुषमा मण्डित है। यहाँ से गगन-चुम्बी हिम श्रृंखलाएँ मन को आनन्दित करती हैं, तो प्रपात रुपी जलधाराओं को देखकर भक्तगण मुग्ध हो जाते हैं। केदारनाथ नामक पर्वत २२,७०० फुट की ऊँचाई पर अवस्थित है। कुछ ही दूरी पर एक वासुकी ताल है, जिसमें से स्वर्ण्र्ाागा और क्षीर गंगा की शुभ धराएँ निकलती हैं। यहीं से मन्दाकिनी नदी का उद्गम हुआ है। मन्दाकिनी और क्षीर गंगा का संगम केदारपुरी का द्वारा है। यहीं केदारनाथ की छोटी सी अस्थायी बस्ती है। यह वस्ती वैशाख से कार्तिक तक गलजार रहती है। बाँकी महीनों में गगनचुम्बी हिमशिखरों की गोद में केदार मन्दिर एकाकी विराजमान रहता है। यह मन्दिर अपने ढंग का अनोखा है। मन्दिर का गर्भगृह और गोपुर इतना छोटा है कि आज के दिनों में भक्तों को दर्शन करना श्रमसाध्य रहता है, ऐसा सुनने में आता है।
भारतवर्षभर में द्वादशज्योतिलिंगों नाम और स्थान निम्न श्लोकों में मिल जाते हैं ः
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनं
उज्जयिन्यां महाकाल मोंकार ममलेश्वरम्
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम्
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमी तटे
हिमालये तु केदारं घुष्मेशं तु शिवालये
केदारनाथ लिंग इन्ही ज्योतिर्लिंग में परिगणित है। केदारेश्वर लिंग प्राचीन और प्राकृतिक हैं। इन्हें देखने से लगता है कि केदारेश्वर लिंग मानव निर्मित नहीं है। मन्दिर में प्रतिष्ठित त्रिकोणाकार पर्वतखण्ड -लिंग) है। जिनकी पूजार्-दर्शन कर भक्त मुक्ति पाना चाहते हैं। इसी धराधाम में उपमन्यु और पाण्डवों ने भी तप किया और उन्हें शिव के दर्शन हुए। इसी इच्छा को साकार करने के लिए इस वर्षभी देश-विदेश से आनेवाले लाखों शिवभक्त केदारनाथ बद्रीनाथ पहुँचे थे। सभी पूजा, दर्शन आदि में व्यस्त थे। देवाधिदेव की क्या लीला होने वाली थी – कौन जानता है। क्षणादर्ुर्ध्व न जानामि विधाता किं करिष्यति’ यही उक्ति १६ जून के दिन अविरल वषर्ा के कारण चरितार्थ हर्ुइ।
चार दिनों तक अविरल वषर्ा होती रही, बादल फटी परिणामस्वरुप इस क्षेत्र में पडÞनेवाले उत्तराखण्ड -केदारघाटी) हिमाचल प्रदेश और नेपाल का सुदुर पश्चिम क्षेत्र -दार्जुला, दीपायल, डडेलधुरा) में जलप्रकोप की विनाशकारी लीला पलयंकारी रुप में ताण्डव करने लगी। केदारघाटी और आसपास में त्राहिमाम मच गई। मन्दाकिनी-भागीरथी की संगमस्थली में आई जलकी उफान -बाढÞ) चडÞ-चेतन, मठ-मन्दिर, घर-होटल, पक्की रास्ते, पुल-पुलियों, छोटी-बडÞी गाडियों को अपनी धारा में विलीन करती हर्ुइ नामोनिशान मिटा दी। नेपाल में महाकाली नदी अपनेे नाम अनुरुप जडÞ चेतन को संहार करती हर्ुइ चारों ओर ताण्डव मचा दी। जलप्रकोप को देखते हुए मानव मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इस महाविनाश का कारण कौन है – मानव, विज्ञान या भगवान !
इसी क्रम में नेपाल के मध्य और सुदुरपश्चिम क्षेत्र में आई प्रलयकारी विनाशलीला की ओर दृष्टिपात किया जा रहा है। उत्तराखण्ड जिस प्रकार तवाह हुआ, उसी प्रकार तवाही मचानेवाली जल आपदा का विनाशकारी रुप नेपाल के पश्चिम में बहनेवाली महाकाली नदी में आई। बाढÞ ने दार्चुला, डडेलधुरा, बैतडी, कञ्चनपुर को तवाह कर दिया। दार्चुला का खलंगा बजार पर्ूण्ातः नष्ट हो गया है। सीमा नदी में लोहे की बनी पुल नदी में आई भीषण बाढÞ के कारण जोखिमपर्ूण्ा अवस्था में लटकी पडÞी है। इस क्षेत्र में आवत-जावत करने का यही एक पूल मार्ग है, जिस पर यात्रा करने को बाध्य है। पूल जोखिमपर्ूण्ा होने से दार्चुला वासियों के दिन की चैन रात की नीदं खो गई है। महाकाली नदी में अचानक आई बाढÞ से इस क्षेत्र में बबण्डर मच गया है। जनता त्राही त्राही कर रही है। इस क्षेत्र में आई बाढÞ से धन-जन की क्षति का स्पष्ट तथ्यांक देना दुष्कर कार्य है, पर जिला दैवी प्रकोप उद्धार समिति के तथ्यांकानुसार १०१ पक्के मकान, २७ कर्कट पाते वाले घर, १३ सरकारी कार्यालय भवन, एक विद्युत आयोजना केन्द्र एक लोहे से बना झुला पूल, ४ मठ-मन्दिर बाढÞ की तेज धारा में बहने के साथ साथ २५०० लोग विस्थापित हुए हैं।
बैतडी ढÞंगा गाविस में आषढ ३ गते हुए भूस्खलन से ३०० लोग विस्थापित और कञ्चनपुर में २३२ लोग बाढÞ से विस्थापित हुए हैं। कैलाली में सबसे अधिक ३०६३ लोग बाढÞ से दुष्प्रभावित हुए है, इनमें से आधे लोग विस्थापति हो गए है। टीकापुर, नारायण नगरपालिका, एथैया, भजनी, रानीजमरा सिंचाई क्षेत्र में अधिक क्षति हर्ुइ है। इस क्षेत्र में बाढÞ और भूस्खलन से करोडों धनमाल की क्षति होने के साथ-साथ तीस से भी अधिक लोग मारे गए हैं। नेपाल के पर्ूर्वी भाग में स्थित ताप्लेजुंग के थुकिम्बा गाँव में २२ जेष्ठ के दिन भयावह भूस्खलन हुआ, जिसमें १० लोग एक साथ दब कर मर गए।
मध्यपश्चिम पहाडी तथा तर्राई के जिले में भी दैवी प्रकोप से धनजन की बेशुमार तवाही मची है। जुम्ला में तूफान में दो जाने गई तो जाजरकोट में ६५० पशुओं की जाने गई। हाकू एवं कुडारी गाँवों में ३५० भेडÞबकडिÞयों, ४ घोडÞो की जानें चली गई। बाँके राप्ती तटबन्ध का ५०० मीटर बहा ले गई है। २६ करोड की लागत में बनी ४०० मीं बनी लंबी पुल खतरे में पडÞ गया है।
नेपाल के तर्राई, पहाड क्षेत्रों के लोगों को भूस्खलन, बाढÞ से होनेवाले दर्द की पीडÞा को सहना उनकी नियति बन गई है।
शेष २६ पेज में
सप्तकोशी, नारायणी, गण्डकी, कर्ण्ााली, कमला आदि नदियाँ हर वर्षधनजन की क्षति करती है। दैवी प्रकोप गम्भीर चिन्ता का विषय है, जिस ओर हमारे देश में समय रहते ध्यान नहीं जाता है।
इतिहास, जीवन और प्रकृति में कुछ भी अचानक घटित नहीं होता। जब हम पर्ूव की प्रक्रिया से अनभिज्ञ रहते हैं, तब हमें ऐसा लगता है कि घटना अकस्मात घटित हर्ुइ है, अन्यथा प्रत्येक घटना घटने से पर्ूव अपना निश्चित समय अवश्य लेती है। प्रत्येक घटना के पीछे कोई कारण या उद्देश्य जरूर होता है। जिन घटनाओं का तत्काल कोई कारण नहीं दिखाई देता, उनके बीज बहुत दूर भूतकाल में छिपे रहते हैं। कर्म और फल प्राप्त का यही अन्तराल हमें भ्रमित कर देता है।
प्रकृति न केवल आने वाली परिस्थितियों का संकेत देती है, बल्कि उसका सामना करने के लिए तैयार होने का अवसर भी प्रदान करती है। इन संकेतों को समझने के लिए मन का शान्त एवं मर्ूछा रहित होना जरूरी है। मर्ूछा केवल नशीले पदार्थों से ही नहीं आती। लालचर्,र् इष्र्या, भय, मोह, घृणा और अहंकार भी मर्ूछा के ही समान हैं। प्रत्येक विचार एक मुक्त ऊर्जा है, जो हमसे निकल एक मार्ग पर चलती है। ये विचार हमारे भाग्य को अपनी ही करनी का शिशु बना देते हैं। हमारी योजना और दूर-दृष्टि सीमित हैं और उस परम अगोचर की दृष्टि असीमित है।
विपदा आने पर हमारी सरकार प्राविधिक उपकरण एवं दक्ष जनशक्ति के अभाव में उद्धार तथा राहत कार्य करने की कोशिश करती है। अधिकारी स्तर पर दौडधूप की जाती है, संघ-संस्था भी आंशिक रुप में एक दो दिन सक्रिय दीखती है। सरकार संघ-संस्था अर्ध सरकारी संस्था तथा सम्बन्धित विभागों के बीच पर्ूव तैयारी एवं समन्वय करके काम किया जए तो आपदाओं को न्यूनीकरण किया जा सकता है और विस्थापितों की पीडÞाओं को कम किया जा सकता है।

Tagged with
loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz