देश की डूबती नैया कौन लगाये पार देखत देखत नयन थके कब आए तारणहार।

देश की डूबती नैया कौन लगाये पार
देखत देखत नयन थके कब आए तारणहार।gathbndhan+oli
डा.मुकेश झा
नेपाल के युवा पीढी को नेपाल में जन्म लेना अपने पूर्व जन्म के किसी पाप के फल जैसा अनुभव हो रहा है। अगर सच कहें तो एक तरह से यह अनुभव वास्तविक भी है। आखिर ऐसा है क्या नेपाल में जो युवा पीढी ऐसा न सोचे ? अगर हम एक एक विषय पर सूक्ष्मता से न सही मोटा मोटी रूप से विचार करें तो भी इसी निर्णय पर पहुँच सकते हैं और समस्या अभी भी कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। अब तो ऐसा लगने लगा है जैसे यह सुरसा के तरह बढ़ते हुए मुँह की तरह है जो कभी रुकने वाला है ही नहीं। इस कदर चरम सीमा पर पहुंची लापरवाही, भ्रष्टाचार, अनाचार, व्यभिचार कुछ व्यक्ति या किसी सगठन द्वारा नहीं है, बल्कि सरकार और सत्ताधारी इसी में लगे हैं। वर्तमान अवस्था में देश का एक भी विभाग ऐसा नहीं है जिसको देख कर कहा जाए यह विभाग सही है। हाँ किसी विभाग में कुछ व्यक्ति सही हो सकते हैं लेकिन अनाचारी के भीड़ में कुछ सीमित लोग कर भी क्या सकते हैं ?
नेपाल में लूट आज से नहीं बल्कि परंपरागत समय से चली आ रही है। हाँ कुछ समय तक संचार माध्यम में लगे हुए अंकुश के कारण और संचार माध्यम का पूरा का पूरा स्वामित्व सरकार के अंदर होने के कारण आम जनता तक इतनी बातें नहीं पहुँच पाती थी परन्तु जब से संचार क्षेत्र का विकास हुवा है जनता की दृष्टि सरकार के हर कदम पर है और सत्ताधारी की हरेक करतूत जनता को पता चल रही है।
देश के कार्य प्रणाली में सिर्फ कागज पर कार्य होने की प्रथा आज की नही हैं। अगर वास्तव में पिछले ५० साल की बजट कार्य और व्यवस्था की वास्तविक जांच की जाए तो यह निश्चय हो जायेगा कि नेपाल को सोची समझी साजिश के तहत नेपाल पर हुकुमत करने वालों ने इसे गरीब बना कर रखा है। नेपाल उस घाव बाले भिखमंगे की तरह है जो घाव दिखाकर लोगों से भीख मांगता है परन्तु उस घाव का इलाज नही करवाता बल्कि उसे कुरेदकर तरो ताजा बनाए रखता है ताकि लोग उसे भीख दे सके।
नेपाल की प्रशासनिक, न्यायिक और आर्थिक व्यवस्था को देखें तो यह एक चक्रव्यूह के समान है जिस पर एक खास समुदाय के ४००, ५०० परिवार के लोगों की और उनके सगे सम्बन्धियो की ही हुकूमत रही है। जब भी कोई इनके बीच घुसकर इस चक्रव्यूह को तोड़ने की कोशिश करता है, इनके करतूत को जनता के सामने लाने का प्रयास करता है, इनके अनाचार का विरोध करता है तो वह नाकाम ही नही होता वरन् इनके कोप भाजन बनने को विवश होता है , बर्बाद होता है।इस चक्रव्यूह ने नेपाल को आज से अपने शिकंजे में नहीं रखा है बल्कि नेपाल में शासन, सत्ता या तन्त्र जो भी हो नायक यही लोग होते हैं। यदि हम सूक्ष्म अध्ययन करें तो यह स्पष्ट हो जायेगा की राणाकाल, पंचायती व्यवस्था, प्रजातन्त्र, गणतन्त्र, लोकतन्त्र जो भी तन्त्र हो वास्तव में हर समय देश में यही ४००, ५०० परिवार और उनके रिश्ते नाते ने हुकूमत किया है।
यही लोग भ्रष्टाचार करते हैं, यही लोग छानबीन करते हैं और इन्ही के नाते रिश्ते वालों के हाथों फैसला होता है तो कैसी छानबीन करते होंगे, कैसा अनुसन्धान होता होगा और कैसा फैसला होता होगा ? वास्तव में कुछ होता ही नहीं है क्यों कि सब जुड़े हुए हैं। इनका सारा तंत्र अपने लिए नहीं बल्कि विरोधियों, खोज खबर करने वाले विरोधियों को फंसाकर समाप्त करने के लिए बनाकर रखा गया है।
देश का दुर्भाग्य का अभी के वर्तमान अवस्था पर ही समाप्त होने का कोई लक्षण नहीं दिखाई देता। भूतकाल से लेकर आज तक जितनी विकराल अवस्था है उससे हम अनुमान लगा सकते हैं की भविष्य की अवस्था क्या होगी, क्योंकि सत्तासीनों की लोलुपता मत्स्यावतार की तरह दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है।
नातावाद, कृपावाद के आधार पर टिका इस देश को स्वच्छ सुन्दर स्वरुप तभी प्राप्त हो सकेगा जब सम्पूर्ण शासन व्यवस्था में आमूल परिवर्तन हो। उदाहरण के लिए यह देख सकते हैं कि राजतन्त्र समाप्त हुए दशक बीत गया परन्तु राजा के समर्थक आज भी इस मद में हैं कि राजतन्त्र पुनर्स्थापन हो सकती है। इसका सीधा सीधा एक ही कारण है , तन्त्र परिवर्तन हुवा, शासन परिवर्तन हुआ परन्तु सेना की सांगठनिक व्यवस्था ज्यों की त्यों बनी हुई है, उसमे राइ रत्ती भी परिवर्तन नहीं हुई है। राजतन्त्र की समाप्ति के साथ ही अगर उस सैनिक संगठन को विघटित करके अंतरिम संविधान में मूल मर्म को समेटकर लोकतान्त्रिक सैनिक संगठन का निर्माण किया गया होता तो इतनी शान शौकत से राजा पुनर्स्थापन की बात नही उठ सकती थी। वह सेना भी इसीलिए विघटन नही हुई क्योंकि वह भी नातावाद के आधार पर हुकूमत करने वालों में से ही है तो कौन उसको छेड़े। यह एक संगठन का उदहारण मात्र है, हर संगठन का यही हाल है। किसी भी उच्च स्तर के निकाय में कार्यरत किसी को भी क़ानूनी दायरे में पूर्णतया नहीं लाए जाने का यही एक आधार है कि सब के सब सम्बन्धी है। जब तक नेपाली सत्ता और तन्त्र इन परिवार और सगे सम्बन्धियों, उनके निकटतम लोगों के हाथ के कठपुतली की तरह नाचता रहेगा, यह दिन पर दिन दुर्गति को प्राप्त होता ही रहेगा।

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