देश रो रहा, ख़ून के आँसू

गंगेश मिश्र

nepal rastrabad
माँ कब भूखी सो गई, पता कहाँ चलता है भला ? यही तो है, माँ का समर्पण अपने बच्चों के लिए; दर्द को छुपाए; कभी कराहते नहीं देखा माँ को। इसी माँ के सम्मान के लिए, पुरुषार्थी वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी है; जिन्हें हम अमर शहीद कहते हैं; पर ख़ुद चुप रहते हैं।क्योंकि हम उनमें से नहीं हैं; हमें तो घर गृहस्थी चलानी है, एक अच्छा सा घर हो; एक क़ीमती गाड़ी हो; लोग जानें-मानें,पहचानें बस ! कितने मतलबी हो गए हम; देश रो रहा ख़ून के आँसू …. और हम …
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कहाँ गए वो ???
वीर सपूत।
आन-बान पर,
मिटने वाले;
माँ समझे जो,
धरती माँ को।
स्वार्थ त्याग,
परमार्थ करे जो;
लहू से;
धरती लाल करे।
डरे नहीं जो;
झुके नहीं जो;
निज धर्म में रत;
पुरुषार्थ करे जो;
कहाँ गए वो ??
वीर सपूत।
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मेरी बात ख़तम नहीं हुई अभी; बहुत दिनों से चुप रहा था, अब बरदाश्त नहीं होता।एक मधेशवादी नेताजी, जो कभी मन्त्री भी रहे; उनसे मेरी पहली मुलाक़ात हुई। मेरी बात उन्हें कुछ जमी नहीं और बोल गए; ” गंगेश जी ! मुझे मधेश और मधेशी नेताओं से कोई शिकायत नहीं, हमें जो पाना था; हमने पा लिया, थोड़ा और झुके होते तो ….”। उनकी ये बातें, सिर्फ़ उन पर ही नहीं;  इस देश के अधिकांश नेताओं पर लागू होती है; जो केवल सत्तासुख के लिए राजनीति करते हैं,  उन्हें किसीसे कुछ लेनादेना नहीं है; देश से तो बिलकुल नहीं।
आए दिन, प्रधानमन्त्री की कुर्सी पर बैठने वाले बदल जाते हैं; निरहू जाते हैं,  घूरहू आते हैं।
इतनी बेशर्मी ! की शर्म भी शरमा जाय, ये  देश है या नौटंकी और मज़े की बात है, कि सब कुछ बड़े आराम से; बर्दाश्त कर लिया जाता है। पारी बाँध रखी है नेताओं ने; और बड़े आराम से राष्ट्रवाद का नारा भी लगा लेते हैं।
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शर्म करो !
सब देख रहे हैं;
तुम पर लानत;
फेक रहे हैं।
कैसे हैं ?
बेशर्म लोग जो;
माँ के आँसू;
बेच रहे हैं।
इसको, उसको, किसको कहें ?
सब घात लगाए;
देख रहे हैं।
सेंक रहे हैं;
स्वार्थ की रोटी;
बोटी-बोटी;
नोंच रहे हैं।
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धत् ! तेरा राष्ट्रवाद। वाद पहले; देश बाद !!!!

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