प्रियदर्शन

मन्ना डे हिंदी फिल्मी संगीत के उस सबसे सुनहरे दौर की पुरुष गायकी का आखिरी स्तंभ थे, जिसने हमें बहुत सारी नायाब आवाजें बख्शीं. यह सोचकर कुछ हैरानी-सी होती है कि किस तरह चालीस के दशक के हिंदी सिनेमा ने हमें एक साथ मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, मुकेश, मन्ना डे, तलत महमूद, हेमंत कुमार, महेंद्र कपूर जैसी निहायत एक-दूसरे से भिन्न, लेकिन बिलकुल एक-दूसरे को टक्कर दे सकने लायक आवाजों का इंद्रधनुष दे डाला. निस्संदेह इन सबके बीच रफी, किशोर और मुकेश ने सफलता की अपनी कुछ अलग-सी दास्तान लिखी और महेंद्र कपूर बहुत देर तक मोहम्मद रफी की छायाप्रति लगते रहे, लेकिन फिल्मी गीतों की दूसरी त्रयी मन्ना डे, तलत महमूद और हेमंत कुमार के रूप में हमारे बीच न होती तो फिल्मी गीतों का संसार इतना विविध, गहरा और भावपूर्ण न होता.

सच तो यह है कि इस पूरी सूची में हर कोई अपनी एक लीक बनाता है और हर दूसरा उस लीक में अपने आप चला आता है. हर किसी को अलग से याद किया जा सकता है और हरेक के पास ऐसे गीत खोजे जा सकते हैं जो तमाम दूसरे गायकों के यहां मिलते हैं.

मोहम्मद रफी की खुली-खिली आवाज में मोहब्बत के भावुक देवता बोलते रहे, जिनकी उदासी-शोखी दोनों बहते पानी जैसी तरल और पारदर्शी लगती रही. किशोर कुमार की आवाज में कई तरह की रंगत थीं. सचिन देव बर्मन ने कुछ बहुत गहरे रोमानी गीतों में उनकी आवाज का बेहतरीन इस्तेमाल किया. इस आवाज में जैसे सुबह के सुकुमार रंग झरते थे. मुकेश की आवाज में दर्द और टीस की मारी आत्माएं आवाज देती हैं, उदासी की छायाएं गाती हैं, जिसमें खुशी भी एक अनकहे से दर्द में लिपटी हुई आती है. तलत की रेशमी आवाज इतनी महीन-मुलायम है कि वह हमेशा अनछुई-सी लगती है. हेमंत कुमार की गायकी में एक खोया हुआ उजास है, वे गाते हैं तो लगता है कि अपने को खोज रहे हैं. उनकी आवाज जैसे पूरे माहौल में एक गूंजता हुआ जादू कर देती है.

इतनी सारी आवाजों के बीच मन्ना डे कहां आते हैं? उनकी एक बड़ी खूबी यह बताई जाती रही कि फिल्मी दुनिया के वे सबसे शास्त्रीय गायक रहे. उन्होंने सबसे आसानी से सबसे मुश्किल गीत गाए. यह बात बहुत दूर तक सच है, लेकिन जो चीज मन्ना डे को सबसे विशिष्ट और अलग बनाती है, वह उनकी आवाज का एक अनोखा चरित्र है. जिस दुनिया में आकार-प्रकार, देह और मुद्रा सबसे ज्यादा अहमियत रखते हैं, वहां मन्ना डे जैसे एक निराकार आवाज लेकर आते हैं. दैहिक कामनाओं से भरी इस दुनिया में उनकी आवाज देह का स्पर्श करती ही नहीं. वह देह के पार चली जाती है. जिसे हम अध्यात्म कहते हैं, उसका सही अर्थ मन्ना डे की आवाज में खुलता है.

यह अनायास नहीं है कि हिंदी फिल्मों में दार्शनिक या सूफी आशयों वाले कुछ सबसे अच्छे गीत मन्ना डे की आवाज में ही हैं. उनकी आवाज की यह प्रकृति जिस गीत में सबसे नायाब ढंग से दिखाई पड़ती है, वह फिल्म ‘दिल ही तो है’ का ‘लागा चुनरी में दाग’ है. निस्संदेह, इस गीत में मन्ना डे की गायकी की शास्त्रीयता भी अपने शिखर पर है, लेकिन इसमें जो तन्मयता, जो आवाज की अनुगूंजों में शामिल आध्यात्मिकता है, वह इसे एक अविस्मरणीय अनुभव में बदल डालती है. यहां ‘ये कहानी है दिए की और तूफान की’ को भी याद करना जरूरी है जहां लौ की सिहरन और तूफान की प्रचंडता के बीच दिए का दिपदिपाता साहस जैसे मन्ना डे की आवाज में आलोकित हो उठता है और जब वे गाते हैं, ‘निर्बल से लड़ाई बलवान की’ तो जैसे वह मनुष्यता की गरिमा का गान बन जाता है.

यहीं ख्याल आता है कि मुकेश और राजकपूर की जानी-पहचानी जुगलबंदी के बीच और बावजूद कई यादगार गीत ऐसे हैं जो मन्ना डे ने राजकपूर के लिए गाए. ‘लागा चुनरी में दाग’ के अलावा ‘श्री 420’ के ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ और ‘दिल का हाल सुने दिलवाला’ हों या ‘मेरा नाम जोकर’ का ‘ऐ भाई जरा देख के चलो’ या फिर ‘चोरी-चोरी’ का ‘ये रात भीगी-भीगी’ इन तमाम गीतों में राजकपूर को मन्ना डे ने अपनी आवाज दी. अस्सी के दशक में न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम के दौरान राजकपूर ने माना भी कि मुकेश उनकी आत्मा थे, लेकिन उनके सबसे आत्मिक गीत मन्ना डे ने गाए हैं.

हालांकि यह लिखते हुए तत्काल यह ध्यान आ सकता है कि मन्ना डे ने कई रूमानी गाने भी गाए, यारी-दोस्ती की मस्ती से भरे और बिलकुल ठेठ चुलबुले गीत भी. जब वे ‘चुनरी संभाल गोरी’ और ‘ऐ मेरी जोहरा जबीं’ जैसे गीत गाते हैं तो जैसे मोहम्मद रफी को टक्कर दे रहे होते हैं, ‘शोले’ में ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ और ‘जंजीर’ में प्राण के लिए ‘यारी है ईमान मेरा…’ गाते हुए किशोर कुमार के बराबर खड़े दिखते हैं. इन सबसे अलग ‘पड़ोसन’ में ‘एक चतुर नार’ गाकर बता देते हैं कि चुलबुलेपन में भी उनका कोई सानी नहीं है.

दरअसल मन्ना डे जिस दौर में थे, जितने बड़े कलाकारों के बीच थे, उसे देखते हुए यह संभव नहीं था कि वे एक जैसे गीत गाकर रह जाते. हालांकि इसमें आपसी प्रतिस्पर्धा से ज्यादा उनकी प्रतिभा का हाथ था, लेकिन यह सच है कि मन्ना डे की, और उनके समकालीन बाकी गायकों की भी प्रतिभा इस आपसी प्रतिस्पर्धा से कुछ और निखरी होगी – आखिर वृक्षों के बीच ऊंचा उठने की प्रतिस्पर्धा तो जंगल में ही हो सकती है, एक अकेला वृक्ष बहुत ऊंचाई हासिल नहीं करता. मन्ना डे के बाद हिंदी फिल्मों का वह विराट अरण्य बिल्कुल खाली हो गया जहां अलग-अलग आवाजों की चिड़ियां सुबह से शाम तक आकर बैठतीं और गाती थीं.