द्वन्द्ध का एक और षड्यन्त्र :कैलास दास

kailash das

कैलाश दास

महाविनाशकारी भूकम्प में पीडि़ताें को सहयोग कर मधेशी जनता ने अपना मानव धर्म ही नही, बंधुत्व का दायित्व निभाया है और राजनीतिक दल एक षडयन्त्र रच रही है जिससे फिर मधेशी—पहाड़ी के बीच द्वन्द्व उत्पन्न होने की सम्भावना साफ है ।
बैशाख १२ और २९ गते को हुए भूकम्प ने मधेशी—पहाड़ी के बीच वर्षों से विभेद के नाम पर जो दूरी बनी थी वह खत्म हो गयी थी । नेपाली जनता राजनीतिक चपेटे में पड़कर एक आपस में विभेद का शब्दवाण एक दूसरे पर लगाती रही और इसका फायदा सबसे ज्यादा दल के नेताओं को मिला । परन्तु इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई, हजारों घरविहीन हुए, अर्बो की सम्पत्ति ध्वस्त होने के बावजूद भी राजनीतिकर्मिंयोें की किसी प्रकार की कोई भूमिका नेपाली जनता ने महसूस नहीं किया । वहीं भूकम्प पीडि़त जनता ने महसूस किया कि उनके दर्द में मधेशी बन्धु उनके साथ हैं । मधेशी जनता ने भरपूर सहयोग किया उस समय उनके मन में कहीं भी पहाड़ी और मधेशी की भावना नहीं थी । पर जैसे ही माहौल थोड़ा बदला कि सत्ता के खिलाड़ी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाने लगे ।
मधेश कृषि प्रधान भूमि है और मधेश का हृदय ‘जंगल’ है । मधेश में उपजा अनाज पूरे नेपाल का भरण—पोषण करता था । परन्तु इस पर राजा महेन्द्र काल से ही कुछ शासको को कुदृष्टि पड़ी है । राजा महेन्द्र ने जंगल सफाया कर मानव बस्ती में परिणत कर दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि मधेश की भूमि की उर्बरता खोती चली गई । स्मरण होना चाहिए कि नेपाल से अनाज भारत सहित के देशो में निर्यात किया जाता था । वहीं अभी अन्य देश से अनाज नेपाल में मंगाया जा रहा है । तत्कालीन राजा महेन्द्र ने मधेश का जंगल काटकार बेच दिया और वहाँ पर मानव बस्ती बना दिया जिसका परिणाम मधेशी जनता अभी तक भोग रही है । समय पर वर्षा न होना, दिन प्रतिदिन बाढ़ की समस्या बढ़ते जाना इसी का प्रकोप है । दूसरी ओर सिंचाई के लिए सरकार द्वारा सिंचाई सामग्री उपलब्ध नहीं करना, बाली बीज एवं खाद्य की समस्या बनाए रखना जैसे बहुत सारे उदाहरण हंै मधेश की भूमि को बरबाद करने में ।
अब सवाल उठता है मधेशी—पहाड़ी बीच शासक वर्ग किस प्रकार से षडयन्त्र रच रहा है । पहाड़ का भूभाग अभी पूर्ण रूप से जोखिम में है । कब क्या होगा वह तो प्रकृति को ही मालुम होगा । लेकिन भूकम्प के समय अभिभावक विहीन जनता के बीच शासक वर्ग अभिभावक बनकर नहीं जा रहे बल्कि चुरे अर्थात जंगल काटकर मानव वस्ती बनाने के षड्यन्त्र में लगी है जिन्हे मधेशी जनता शायद कभी स्वीकार नही करेगी । ऐसा भी नही है कि वह पहाड़ी है पहाड़ में ही रहे मधेश में नही । मधेशी जनता का मानना है कि हम जहाँ है वही पर आप भी रहें कोई एतराज नहीं है । परन्तु जो हमारा ‘हृदय’ है उसे घायल वा मरने नहीं देंगे । अर्थात् जंगल (चुरे) विनाश करने के लिए यदि कोई कदम उठाया गया तो महाभूकम्प से भी बड़ा महाद्वन्द्व होगा ।
जंगल को मानव बस्ती में परिणत करने से मधेश का नही देश का नुकसान है । इस प्रकार का निर्णय देश के लिए ही सबसे बड़ी भूल ही होगी । बैशाख २५ गते मन्त्रालय ने ३८ जिलों के जंगल से लकड़ी काटने का निर्णय लिया है जिन्हें वन मन्त्रालय ने अभी तक मानने से इन्कार कर दिया है । नेपाल का एक मुहावरा है ‘नेपाल का धन, वन जंगल’ वह तो अब मुहावरे में सीमित हो चुका है । इसे मुहावरे को किस प्रकार फिर से साबित किया जाए इस पर सभी का ध्यानाकर्षण होना चाहिए । जंगल विनाश के कारण मधेश के कई जिले वर्षा में दो तीन महीने से अधिक बाढ़ में डूबे रहते हैं तो, किसी–किसी वर्ष वर्षा ही नहीं होने पर अनाज ही नहीं उपज पाती है । फिलहाल कहाँ जाए ? तो, नेपाल का तराई और पहाड़ दोनो प्राकृतिक जोखिम में है और इसका एक ही कारण है राजनीतिक दोषारोपण । पहाड़ का दर्द मधेशी लीडर नही समझ रहे हैं और मधेश का पहाड़ी लीडर । और इसी कारण जहाँ विकास होनी चाहिए वह अभी तक अनपेक्षित है ।
पहाड़ का जिला भूकम्पीय जोखिम में है इतिहास के पृष्ठभूमि से मालूम होने के बावजूद भी सरकारी बड़े–बडेÞ कार्यालय, मन्त्रालय सभी काठमान्डौ में ही अवस्थित है । राजधानी होने के कारण नेपाल भर की जनता काठमान्डौ में ही रहने को बाध्य है । इसमें भी राजनीतिक चाल है । लोकतन्त्र में भी जनता को गुलाम बनाये रखने का षड्यन्त्र अभी तक खत्म नही हुआ है ।
नेपाल के पहाड़ी जिला काठमाण्डौ सहित कुछ जिलों में भूकम्प आना कोई नयी बात नहीं है । वैसे भी बुजुर्गों का मानना है कि काठमाण्डू का ‘काठमाण्डू’ नाम इसलिए पड़ा है कि वह पूर्ण रूप से भूकम्पीय क्षेत्र है इसलिए वहाँ पर पहले काठ का ही मन्दिर, घर और बड़े–बड़े संग्रालय बनाए जाते थे, ताकि भूकम्प आने पर मानवीय क्षति नहीं हो । उसके बावजूद भी राणा शासन, शाही शासन और अब लोकतन्त्र में भी परिवर्तन करने की आवश्यकता नही समझी गई है । इतिहास बताता  है कि आधी शताब्दी के बाद काठमाण्डू में प्राकृतिक प्रकोप के कारण भौतिक संरचना का निर्माण करना पड़ता है, जिसमें अर्बो—खर्बो का खर्च होता है । इससे अच्छा क्यों नहीं राजधानी का स्थान ही परिवर्तन कर दिया जाय और मन्त्रालयों तथा अन्य सरकारी कार्यालयों को नेपाल के विभिन्न जिलों में बनाया जाए ।
नेपाल हरेक प्रकार से सक्षम है, इसके बावजूद भी जल है तो विद्युत नही, जंगल है जड़ीबुटी नही, खेती योग्य भूमि है परन्तु सिंचाई सामग्री का अभाव । कहने का तत्पार्य यह है कि प्राकृतिक प्रकोप में पड़कर जितनी रकम हम अनाहक में खर्च कर रहे हैं, उसका सही सदुपयोग होना चाहिए । मान लीजिए ८० वर्ष पहले काठमाण्डू का धरहरा महाभूकम्प में ध्वस्त हो चुका था जिसे निर्माण करने में लाखों खर्च किया गया था । वह तो उदाहरण मात्र है । राजधानी के अधिकांश मन्त्रालय में भी अर्बो—खर्बो पुनः निर्माण में लगे थे । एक युग भी नही हुआ और भूले हुए दिन को फिर से बैशाख १२ गते और २९ गते के भूकम्प ने स्मरण करा दिया है ।
अगर नेपाल में भूकम्प का इतिहास ही देखा जाए तो १३१० साल में प्रथम बार आए भूकम्प में काठमाण्डू की एक तिहाई जनसंख्या खत्म हो गई थी । उसी भूकम्प में राजा अभय मल्ल का भी निधन हुआ था । १३१६ साल  ः जलयदेव मल्ल के समय भूकम्प के कारण उपत्यका में हजारों पुरातात्विक महत्व की संरचना और मठमन्दिर ध्वस्त हुए थे । १४६३ साल ः राजा श्याम सिंह मल्ल के समय में आए भूकम्प में रातो मच्छिन्द्रनाथ के मन्दिर सहित बहुत सारी संरचनाओं का विनाश हुआ था ।  १७३७ साल ः राजा श्रीनिवनस मल्ल के समय में आए भूकम्प ने काठमांडू सहित नेपाल के विभिन्न भाग में व्यापक प्रभाव पड़ा था । १८६६ साल ः राजा गिर्वाणयुद्ध विक्रम शाह के समय हुए भूकम्प में भी बहुत बड़ी संख्या में मानवीय, पशु तथा भौतिक संरचना के लिए विनाशकारी सावित हुआ था । १८८० साल ः इस भूकम्प में भी काठमाडौं उपत्यका को क्षति पहुँची थी । १८९० साल में ः धरहरा ध्वस्त हुआ था । राजा राजेन्द्र विक्रम शाह के समय में आए भूकम्प के कारण काठमाडौं सहित देश भर में १८ हजार से ज्यादा घर ध्वस्त हुए थे । १८९१ साल में ः  भूकम्प में उपत्यका के बहुत सारे ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक महत्व की संरचना और मठमन्दिर ध्वस्त हुए थे । १९९० साल में ः ८.५ रेक्टर स्केल का भूकम्प नेपाल मेंं आज तक नही आया है । अभी तक का सबसे बड़ा भूकम्प उसी को माना जा रहा है । इस भूकम्प में  ८ हजार ५ सौ १९ लोगों की मौत हुई थी और ८० हजार ८ सौ ९३ घर पूर्णरूप में ध्वस्त हुआ था । एक लाख २६ हजार ३ सौ घर में आंशिक क्षति भी हुई थी ।  २०३१ साल ः  भूकम्प से नुवाकोट का सभी घर पूर्णरूप से ध्वस्त हो चुका था । २०३७ साल ः ६.५ रेक्टर स्केल के भूकम्प से सुदूर पश्चिम का बैतडी, दार्चुला और बझाङ में एक सौ २५ लोगो की मौत, २ सौ ४८ घायल और हजारों घर ध्वस्त हुआ था । २०४५ ः उदयपुर को केन्द्रविन्दु बनाकर आए भूकम्प में ७२१ की मौत ६ हजार ५ सौ ५३ घायल, हजारों घर तथा पशुधन को क्षति हुई थी । २०५० साल ः मध्यपश्चिम क्षेत्र में आए  भूकम्प में मरने वालो की संख्या एक थी परन्तु घायलों की  संख्या ११, पूर्णरूप में ७२ घर और ४ सौ ५१ घर आंशिक रूप में विनाश हुए थे । २०५१ साल ः भूकम्प के कारण १२ घायल, ६ सौ २३ भूकम्प से प्रभावित, ८४ हजार २ सौ ८७ घर भूकम्प से प्रभाव हुआ था । २०५२ साल ः भूकम्प मेें दैलेख जिला में विशेष प्रभाव पड़ा था । १८ घायल ४ घर ध्वस्त हुआ था । २०५४ साल ः भूकम्प ने मध्य तथा सुदूर पश्चिम क्षेत्र में सबसे ज्यादा क्षति किया था । एक हजार ४ सौ ८९ लोग प्रभावित हुए थे तो एक सौ ९६ घर ध्वस्त हुए थे । २०५८ साल ः सुदूर पश्चिम मे सबसे ज्यादा क्षति हुई थी । उसमे भी २ की मौत और ३ घर ध्वस्त हुए थे । २०५९ साल ः भूकम्प ४१ घायल हुए थे । उस भूकम्प में तराई का महोत्तरी जिला सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ था ।  २०६० साल ः भूकम्प के कारण पश्चिम स्याङ्जा में एक की मौत दो  घायल हुए थे । २०७० साल ः असोज २ गते आए ६.८ स्केल के भूकम्प ने पूर्वी नेपाल में ज्यादा क्षति किया था ।
२०७२ साल ः बैशाख १२ गते ७.९ रेक्टर स्केल का यह भूकम्प, महाविनाशकारी भूकम्प रहा । इस भूकम्प के बाद प्रतिकम्पन आज भी जारी है । सरकारी तथ्यांक के अनुसार इसमें ८ हजार ६ सौ ५० की मौत, २२ हजार ४ सय ३४घायल हुए तो २ लाख ८८ हजार ७ सय ९८ घर पूर्णरूप में क्षतिग्रस्त हैं ।  २ लाख ५५ हजार घर, दो हजार से ज्यादा विद्यालय, विभिन्न मन्त्रालय, अदालत का भवन, धरहरा सहित पुरातात्विक तथा सांस्कृतिक महत्व का भवन और मठमन्दिर को ध्वस्त हो चुका है । इससे लोग आज भी भयमुक्त नही हुए हैं । काठमाण्डू का कुछ ही ऐसा घर होगा जिन्हें फिर निर्माण नही करना पड़ेगा । जहाँ तक मन्त्रालय की बात है तो उसके  मरम्मत सम्भार एवं निर्माण में अर्बो रूपया खर्च होने की सम्भावना है ।
काठमाण्डू, सिन्धुपाल्चोक, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा, काभ्रेपालचौक, भक्तपुर, ललितपुर, दोलखा, मकवानपुर सहित स्थानों पर छोटे–छोटे भूकम्प के झटके हमेशा आते ही रहते है. जो शायद प्रकृति के द्वारा चेतावनी दी जाती थी किन्तु इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया और आज महाविनाश का हम यह रूप देख रहे हैं । इसके वावजूद भी राजनीतिकर्मी स्वार्थ से उपर उठकर नही आना चाहते हैं जो सबसे बड़ी दुःखद बात है । संविधान निर्माण की बात आती है तो शिक्षा रोजगारी, राज्य का बँटवारा, विकास, भारत, अमेरिका, चीन, जापान का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं । चाहे जनता को यह शब्द प्रलोभन के लिए क्यो न देते हों ? परन्तु वही राजधानी और मन्त्रालय काठमाण्डू से बाहर रखा जाए किसी ने सवाल नही उठाया, क्यो ? नेपाल में रहने वाले सभी नेपाली है तो राजधानी पहाड़ में हो चाहे मधेश की भूमि में । जहाँ प्राकृतिक प्रकोप नहीं हो, सभी नेपाली को आने जाने की सुविधा, समय का बचत, कलकारखाना, उद्योग, शिक्षा के लिए अच्छा वातावरण हो उसी समतल स्थल पर राजधानी होनी चाहिए और इसके लिए सभी राजनीतिकर्मिंयो को आवाज उठाने की आवश्यकता है ।
अगर हम भारत का उदाहरण मात्र लेते हंै तो परापूर्व काल से ही दिल्ली राजधानी नही है । जहाँ तक मन्त्रालय की बात है वह भी राजधानी में ही होनी चाहिए यह भी बहस गलत है । भारत में सभी मन्त्रालय राजधानी में नहीं है । देश के विभिन्न भागो में है ।  काठमाण्डू को सबसे बड़ा पर्यटकीय स्थल बना दिया जाए और राजधानी चितवन में । काठमाण्डू में पर्याप्त धार्मिक पर्यटकीय आधार है जिसमें निवेश कर विश्व को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है । कहने का मतलव यह भी नही है कि राजधानी चितवन में हो तो सभी मन्त्रालय भी चितवन में ही रहे, कुछ मन्त्रालय काठमाण्डू सहित अन्य स्थानाें पर भी बना दिया जाए । नेपाली काँग्रेस के नेता राजु साह का मानना है कि राजधानी के लिए चितवन सबसे उत्तम स्थल है । वहाँ पर पर्यटकीय आधार सहित की अपार सम्पदा है । अगर वहाँ राजधानी कर दिया जाए तो सभी नेपाली के लिए उत्तम रहेगा ।

समान प्रश्न, अलग जवाब
धनुषा जिला के लिए गिनेचुने राजनीतिज्ञ में से है– शत्रुधन महतो, जुली महतो, प्रमिला देवी दास, दिनेश साह। इन चार नेताओं के लिए हिमालिनी प्रतिनिधि कैलाश दास ने चार समान प्रश्न किया है। (जवाव बक्स में) । प्रश्न इस प्रकार है –

नेपाल का पहाड़ी जिला भूकम्पीय जोखिम में है । भूकम्प में विगत में भी और इस बार भी काठमाण्डू में जनधन और अरबों की भौतिक संरचना ध्वस्त हुई है । ऐसी स्थिति में कुछ मन्त्रालय काठमाण्डू में और राजधानी बाहर रखने का अगर प्रस्ताव हो तो आप क्या कहेंगें ?

पहाड़ का जिला अभी जोखिम में है । ऐसी स्थिति में मधेश की भूमि में रहे जंगल काटकर भूकम्प पीडि़त को बसाया जाए ऐसी सरकार की तैयारी हो रही है क्या यह उचित होगा ?

विपत्ति के समय मेंं जिस प्रकार मधेशी जनता ने मानवीय धर्म का पालन किया है, इससे ऐसा लगता है कि विभेद मधेशी पहाड़ी जनता में नहीं बल्कि नेताओं में है ऐसी चर्चा है, आप क्या कहेंगे ?

संविधान निर्माण के बारे में भी कुछ कहना चाहेंगे ?

शत्रुधन महतो
सभासद् , नेकपा एमाले
एवं पूर्व स्थानीय विकास राज्य मन्त्री
काठमाण्डू भूकम्प जोखिम क्षेत्र है और जनता का दवाब दिनप्रति दिन बढ़ता जा रहा है । आने वाले कल में इससे भी बड़ा भूकम्प आ सकता है । राज्य पुनर्संरचना के बाद प्रदेश की राजधानी काठमाण्डू रहे  और देश की राजधानी वहाँ रहे जहाँ  प्राकृतिक का प्रकोप की कम सम्भावना हो । राजनीतिक दल सामूहिक रूप में बैठक कर इसका निर्णय ले यही हमारी धारणा है ।

मधेश के जंगल को काटकर पहाड़ी ही नहीं अगर मधेशी को भी बसाया गया तो यह बिलकुल ठीक नही होगा । जंगल विनाश के कारण मधेश की भूमि कभी सूखा तो कभी बाढ़ के प्रकोप से तबाह रहती है । वैसे मुझे विश्वास नहीं है कि सरकार ऐसा निर्णय लेगी, अगर लिया भी तो मधेश नहीं नेपाल के लिए ही अच्छा नहीं होगा । मधेशी जहाँ है वहाँ पहाडी को भी रहने का अधिकार है । लेकिन प्राकृतिक विनाश का कारण कल  मधेशी को भी झेलना पड़े ऐसा नही होना चाहिए ।

इस बात पर हमें विश्वास नही है । जनता रहेगी तो नेता रहेगा, राजनीति जनता और देश दोनों के लिए किया जाता है । हाँ, कहीं–कहीं राजनीतिक स्वार्थ के कारण विभेद होता होगा परन्तु जो जनता के बीच विभेद पैदा करे वह नेता हो ही नहीं सकता है । आपत काल में सबने सभी को सहयोग किया है इसकी प्रशंसा सर्वत्र हो रही है, यह अच्छी बात है ।

संविधान निर्माण देश की सबसे प्रथम आवश्यकता है । हाँ, अभी राष्ट्रीय सरकार की बात चल रही है वह भी आवश्यक है परन्तु इसका मतलव यह नही की राष्ट्रीय सरकार के कारण संविधान निर्माण पीछे हो जाए । संविधान निर्माण के लिए राष्ट्रीय सरकार की आवश्यकता है तो करें नही तो संविधान निर्माण में सभी को जुटने की आवश्यकता है ।

जुली महतो
नेत्री, नेकपा एमाले
देखिए इसमें मानव की कोई गलती नहीं है । आज पहाड़ में हुआ है कल तराई में भी प्राकृतिक प्रकोप बढ़ सकता है । इसका मतलव यह नही की राजधानी ही एक जगह से दूसरी जगह करते रहें । होनी को कौन रोक सकता है । प्राकृतिक प्रकोप कैसे न्यूनीकरण किया जाए इस ओर सरकार का ध्यान होना चाहिए ।

सबसे पहली बात तो यह है कि मधेश में काठमाण्डूवासी अर्थात पहाड़ी रहना नही चाहेंगे । दूसरी बात सरकार ऐसा निर्णय लेगी मुझे विश्वास नहीं है । अगर लिया भी तो मधेश के जंगल विनाश का सबसे पहले मधेशी जनता ही विरोध करेंगे, और ऐसा निर्णय उचित भी नही होगा ।

ऐसी बात नही है । अगर लीडर के बीच इस प्रकार का विभेद होता तो मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव क्याें राहत वितरण करते । हाँ, लोकतन्त्र में अधिकार की लड़ाई चलती रहती है, इसे विभेद कहना उचित नहीं होगा ।

हाँ, जिस प्रकार महाविनाशकारी भूकम्प में सभी ने एक दूसरे का सहयोग किया है उसी प्रकार संविधान निर्माण में भी सर्वदलीय सरकार गठन कर संविधान बनाएँ यह मेरी धारणा है ।

प्रमिला देवी दास
सभासद्, नेपाली काँग्रेस
राजधानी सदा एक ही जगह हो ऐसा भी नही है । जनता की भावना एवं मांग अनुसार दूसरी जगह भी रखा जा सकता है । लेकिन काठमाण्डू में कुछ मन्त्रालय रखना ही होगा ? जहाँ पर हरेक दृष्टि से सुरक्षा महसूस हो राजधानी वहीं होनी चाहिए ।

जी नहीं,  मधेश का हृदय है जंगल । मधेश और पहाड़ अलग नहीं है । जहाँ मधेशी है वहाँ पहाडी को भी बसने का अधिकार है । परन्तु जिस पर नेपाल निर्भर हो उसका विनाश नहीं होना चाहिए । कहने का मतलव जनकपुर, विराटनगर, महोत्तरी, सिरहा, सिन्धुली सहित के जिला में आने के लिए स्वागत है परन्तु जंगल काटकर बसाया जाए यह सम्भव नही है ।

देखिए राजनीति बहुत ही पेंचीली होती है । कुछ करने से पहले नेतागण अपना स्वार्थ ढूँढते हैं । परन्तु उन्हें वो करना चाहिए जिसमें जनता का हित हो । आपका जो प्रश्न है कुछ हद तक हो सकता है लेकिन पूर्ण सत्य नही ।

अगर प्राकृतिक आपदा नही आयी होती तो जेठ १५ तक संविधान निर्माण हो गया होता । मुझे आशा है बहुत जल्द ही संविधान निर्माण होगा ।

दिनेश साह, सभासद्
राष्ट्रीय मधेश समाजवादी पार्टी

दिनेश साह, सभासद् राष्ट्रीय मधेश समाजवादी पार्टी

दिनेश साह, सभासद्
राष्ट्रीय मधेश समाजवादी पार्टी

यह बात आम जनता से भी आ रही है । राजधानी अगर काठमाण्डौ से कहीं बाहर रखा जाए ठीक ही होगा । आनेवाले दिन में प्रान्त की राजधानी काठमाण्डू तो है ही । इसे राजनीतिक दल बैठक कर शीघ्र निर्णय करना चाहिए । ऐसे बहुत सारे देश हैं जिसकी राजधानी देश के विभिन्न स्थानों पर बनाई गई है । आम जनता को सुरक्षा देना ही सरकार और राजनीतिक दल की चाहत होनी चाहिए ।

देखिए विपत्ति के समय में मधेशी पहाड़ी जनता का सवाल नहीं उठता है । कौन आदमी कैसे सुरक्षित रहे इस पर ध्यान देना चाहिए । रखना ही है तो जहाँ पर मधेशी है वहाँ रखा जा सकता है परन्तु जंगल विनाशकर बसाना उचित नहीं है । जिस प्रकार की प्राकृतिक विपदा पहाड़ में आई है जंगल विनाश होने पर मधेश में भी आ सकती है । हम यह कहना चाहेंगे की मधेश के साथ विगत में जो सम्झौता हुआ है वह वर्तमान सरकार स्थापित करें सारा विवाद ही अन्त हो जाऐगा ।

जी, बिलकुल सच है । राजनीतिक स्वार्थ के कारण लीडरों के बीच ऐसा होता है । परन्तु मधेशी लीडर में ऐसी धारणा नहीं है । अगर ऐसी बात रहती तो मधेश के लीडर ही मधेशी लगायत भारत से लाखों राहत सामग्री संकलन कर भूकम्प पीडि़त को नहीं देते । हम सप्तरी का उदाहरण देना चाहेंगे वहाँ भी  सबसे बडी प्राकृतिक घटना आग लगी हुई थी । परन्तु एक भी पहाड़ी समुदाय वा पहाड़ी लीडरों ने सहयोग नहीं किया था, परन्तु मधेशी जनता और लीडर दोनों ने किया है ।

विगत में हुए मधेश के साथ हुए सम्झौता को सरकार स्थापित कर जितनी जलद हो सके संविधान निर्माण करे । अगर इस बार संविधान निर्माण नहीं हो सका तो नेपाल फिर से ५० वर्ष पीछे हो जाएगा । अभी राष्ट्रीय सरकार की बात चल रही है मैं कहना चाहूँगा कि अभी संविधान निर्माण वर्तमान सरकार ही करे । राष्ट्रीय सरकार के झमेला में प्रधानमन्त्री बनने की लड़ाई चालू हो जाएगी । जितनी जल्द हो संविधान निर्माण किया जाए ।

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