द्वन्द्वकालीन पीड़ित परिवार : न्याय न मिलने की पीड़ा

त्रिभुवन सिंह
द्वन्द्वकाल में अपनों को खोने की पीड़ा आज तक उनके परिवार के सदस्य झेल रहे हैं । द्वन्द्वकाल में नागरिकों को लापता करना और नियन्त्रण में लेकर यातना देने की बात और उसमें सुरक्षा अधिकारियों की संलग्नता का विषय मानवअधिकार के क्षेत्र में उठता रहा है । विगत जेष्ठ १० गते नेपाल प्रहरीबल और सशस्त्र प्रहरी बल तथा राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग के प्रमुखों ने संक्रमणकालीन न्यायिक संयन्त्र के द्वारा माओवादी द्वन्द्वकालीन मुद्दा आगे बढ़ाने पर संभावित संकट और कठिनाइयों के विषय में विचार विमर्श किया था । लापता व्यक्ति की छानबीन के लिए बना आयोग और सत्यनिरुपण आयोग का गठन पिछले वर्ष ही हुआ था किन्तु उनकी सक्रियता अब बढ़ी है । इसकी सक्रियता बढ़ने के साथ ही उनकी सक्रियता भी बढ़ गई जो इस प्रकरण में सर से पाँव तक लिप्त हैं । उनकी रातों की नींद खो गई है और वो अब आम माफी के प्रावधान को बनाने के लिए प्रयासरत हैं ।
माओवादियों ने द्वन्द्व की ज्यादती में संलग्न व्यक्तियों के लिए एक साथ आम माफी के लिए सरकारी संयन्त्र का प्रयोग कर रहे हैं । इस देश की यह विडम्बना है कि १७ हजार से अधिक लोगों को मौत देने वाला और उसे लापता करने वाला ही देश का मुखिया बना हुआ है । कानून की तलवार उसके सर पर भी टंगी है, किन्तु सरकार का एक महत्वपूर्ण मोहरा भी वो खुद ही है और इसका फायदा लेना भी वो अच्छी तरह जानते हैं । जब से यह मामला आगे बढ़ा है तब से सरकार गिराने की धमकी भी दी जा रही है और इस खेल में तत्परता से लगे हुए भी हैं । प्रमुख सत्ता साझेदार माओवादी ने कानूनी रूप में उन्मुक्ति निश्चित न होने की हालत में सरकार गिराने की धमकी दी है ।

सरकार बचाने के लिए जघन्य अपराध में संलग्न सभी को आम माफी देने के लिए तैयार प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली एमाओवादी के साथ २३ गते बैसाख में संक्रमणकालीन न्याय सम्बन्धी कार्य करने के लिए ठोस कार्यतालिका के साथ १५ दिन के अन्दर कानून संशोधन प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कही और इस पर सहमति किया जिसके अनुसार लापता व्यक्ति के छानबीन, सत्य निरुपण तथा मेलमिलमप आयोग के सम्बन्ध में व्यवस्था करने के लिए बने ऐन में संशोधन की प्रक्रिया आगे बढ़ी है । वैसे द्वन्द्वकालीन जघन्य अपराध के पीड़ितों के लिए न्याय सुनिश्चित नहीं कर सकने वाली उक्त ऐन के विवादास्पद प्रावधानों को सर्वोच्च अदालत ने खारिज कर दिया था ।

द्वन्द्व पीड़ित द्वारा सर्वोच्च के आदेश के अनुसार ऐन संशोधन माँग करने की अवस्था में सरकार ने जो संशोधन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है वो आरोपियों के लिए माफी सुनिश्चित करने पर केन्द्रित है । न्याय तथा कानून मंत्रालय स्रोत के अनुसार, बलात्कार और लापता करने के कार्य में संलग्न के अलावा अन्य सभी अपराध में दोषी को माफी देने और अदालत में गए मुद्दा को सत्य निरुपण तथा मेल मिलाप आयाग और लापता व्यक्ति के छानबीन आयोग में भेजने के सम्बन्द्ध में मसौदा बना है । संशोधन के मसौदे में लापता हुए व्यक्ति के छानबीन आयाग और सत्यनिरुपण तथा मेल मिलाप आयोग के सीमित पदाधिकारी, महान्यायधिवक्ता का कार्यालय, नेकपा एमाले और एमाओवादी के नेता तथाउसके निकट रहे कानून व्यवसायी के बीच विभिन्न विषयों में विचार विमर्श हो चुका है । इसे मंत्रीपरिषद में राजनीतिक समिति के पास करने के बाद यह संशोधन विधेयक के रूप में पंजीकृत हो जाएगा ।
इन सभी प्रक्रिया के पीछ बस एक ही चाहत है कि दोषियों को आम माफी मिल जाय । इस स्थिति में यह सोचने वाली बात है कि अगर अपनी सुविधानुसार ही कानून और ऐन बनाना है तो किसी भी आयोग या संस्था की आवश्यकता ही क्या है ? जनता का पैसा फालतु है जिसे आयोग बनाने, सदस्य बनाने और भत्ता एवं सुविधा देने में बरबाद करना है । और तो और खुद आयोग भी डर के साए में काम करने को बाधित है । शान्ति तथा पुनःनिर्माण मंत्रालय के तथ्यांक के अनुसार द्वन्द्वकाल में देश भर से एक हजार ४९५ व्यक्ति लापता हैं । आयोग ने २ बैसाख से ३२ जेष्ठ तक जानकारी मांगी थी । अनुमानतः डेढ हजार से भी अधिक उजूरी पड़ चुकी है ।

इन सब पर कारवाही होनी है । किन्तु अभी से सम्बन्धित निकाय और पदाधिकारियों को धमकाया जा रहा है जिसकी वजह से वो असुरक्षित महसूस कर रहे हैं । सर्वोच्च ने गम्भीर अपराध में संलग्न को आम माफी न देने की बात स्पष्ट कर दी है । इसी के साथ एमाओवादी और सुरक्षा निकाय के नेतृत्व में खलबली मची हुई है । ज्यादती में संलग्न को माफी सुनिश्चित करवाने के लिए ऐन संशोधन प्रक्रिया में एमाओवादी और सुरक्षा अधिकारियों की खुली रुचि दिख रही है । रक्षा सचिव, महान्यायधिवक्ता, पूर्व जनरल और अन्य सुरक्षा निकाय के प्रमुख के साथ बातचीत भी की जा रही है और जितने आवेदन पड़े हैं उनमें भी दिलचस्पी दिखा रहे हैं । जाहिर सी बात है कि अगर ईमानदारी से यह प्रक्रिया आगे बढ़ेगी और सर्वोच्च के फैसले को माना जाएगा तो कई चेहरे काले होंगे और उनकी गर्दन फँसेगी ।
परन्तु यह नेपाल है जहाँ सत्ताधारियों ने ही कानून और सर्वोच्च के फैसले की अवमानना की है और अपनी सुविधानुसार देश को हाँका है यहाँ हाँका शब्द इसलिए प्रयोग किया जा रहा है क्योंकि कहीं ना कहीं यह लगता है कि इस देश में मुर्दे रह रहे हैं जिन्हें अपने शोषण होने का भी अहसास नहीं है । ऐसे में न्याय की उम्मीद पत्थर पर दूब उगाने की तरह है ।

नेपाल शायद विश्व का एक इकलौता देश है जहाँ बिना किसी सुनिश्चित कानून या संविधान के सरकार देश चला रही है । सारा का सारा खेल सत्ता को बचाने के लिए किया जा रहा है । आम जनता सिर्फ एक मोहरा बनी हुई है । जिसकी भावनाओं को भड़का कर उन्हें भूखा मार कर सरकार देश चला रही है । जनयुद्ध का नाम देकर जो लड़ाई लड़ी गई उसमें भी आम जनता ने ही अपनी जानें गँवाई । किन्तु देश को क्या हासिल हुआ यह आज सबके सामने है । आज भी ओली सरकार अपनी कुर्सी बचाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है । कामरेड प्रचण्ड कुसीृ की ताक में हैं, उन्हें आश्वासन दिया गया था कि बजट के बाद उन्हें सत्ता सौंप दी जाएगी । किन्तु अभी तो ओली जी को याद दिलाया जा रहा है किन्तु उन्हें ऐसा कोई वादा याद नहीं आ रहा । वैसे भी राजनीतिक वादे तो तोड़ने के लिए ही किए जाते हैं ।

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