द्वन्द्व की आग में तपता देश

पंकज दास:संविधान सभा विघटन के साथ ही चुनाव की घोषणा होने के बावजूद सरकार द्वारा घोषित चुनाव कराने की तीन तिथियां गुजर गईं लेकिन चुनाव होना तो दूर चुनाव को लेकर

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द्वन्द्व की आग में तपता देश

अभी तक दलों के बीच सहमति भी नहीं हो पाई है। हालांकि बाहर जनता को भ्रम में डÞालने के लिए सभी दल चुनाव को ही अपनी प्राथमिकता बता रहे हैं लेकिन सच पूछा जाए और दलों के क्रियाकलाप को देखा जाए तो कोई भी दल इमानदारी से चुनाव के लिए आगे बढÞता नहीं दिख रहा है। पहले मार्ग फिर कार्त्तिक उसके बाद वैशाख और अब जेठ में चुनाव का राग अलापा जा रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे संविधान सभा का चुनाव ना होकर दलों के लिए मजाक बन गया है। अपने भाषण में सभी दल के नेता संविधान सभा चुनाव के लिए कसमें खाते तो दिखते हैं लेकिन अभी तक दलों का एक ही अभीष्ट है सत्ता। जो दल सत्ता का नेतृत्व कर रहे हैं, वो सत्ता को नहीं छोडने के पक्ष में हैं। जो सत्ता में साझेदार हैं, वो अपनी कर्ुर्सर्ीीचाए रखना चाह रहे हैं। और विपक्ष में हैं वह सत्ता का नेतृत्व ढूंढ रहे हैं और जो खुद के तटस्थ होने का दावा कर रहे हैं वो इस उम्मीद में हैं कि सरकार में फेरबदल होते ही उनकी सीट सुरक्षित रहे। जिन दलों का राष्ट्रीय राजनीति में कोई अस्तित्व नहीं रह गया है वो या तो सत्ता पक्ष का दामन थामे हुए हैं और जिनका सत्ता पक्ष से मोह भंग हो गया है वो विपक्षी दलों के साथ सरकार के खिलाफ आन्दोलन में दिखाई दे रहे हैं। इन सबके बीच जो नेता बिना किसी वजूद और बिना किसी जनाधार के कृपापात्र बनकर समानुपातिक कोटे का फायदा उठाकर सभासद बने थे वो दिन रात भगवान से मना रहे हैं कि विघटित संविधान सभा की पुनर्स्थापना हो जाए।
सहमति के बजाए शक्ति पर््रदर्शन पर जोड
यानि राजनीति में जितने किरदार है, उन सबकी अपनी डफली अपना राग चालू है। इन सभी के बीच आम जनता का राजनीतिक दलों से भरोसा उठता दिख रहा है। उन्हें संविधान सभा चुनाव से बहुत ज्यादा लगाव नहीं दिखता है और ना ही सरकार में कौन बैठता है और कौन सत्ता से बाहर होता है इस बात से भी आम नेपाली जनता को कोई खास र्फक होता दिख रहा है। इसका ताजा उदाहरण है सत्ता पक्ष और विपक्ष के द्वारा किए जा रहे शक्ति पर््रदर्शन। सरकार के खिलाफ आन्दोलन के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकने वाले कांग्रेस-एमाले सहित अन्य आधा दर्जन छोटे दलों के आहृवान पर आम जनता आन्दोलन में दिखाई नहीं देती है। हां उनके कार्यकर्ता भी पूरे जोश खरोस से इन आन्दोलनों में सहभागी होते दिखाई नहीं देते। इस बात को भांप कर ही कांग्रेस-एमाले ने अपने केन्द्रीय नेताओं तक को इस आन्दोलन में जनसहभागिता बढÞाने के लिए सक्रिय कर दिया है। लेकिन परिणाम सुखद और अपेक्षाकृत बेहतर होता दिखाई नहीं देता। ऐसे ही सत्ता पक्ष के द्वारा काठमाण्डू में जो शक्ति पर््रदर्शन किया गया, वह भी फीका ही रहा। एकीकृत माओवादी ने इस शक्ति पर््रदर्शन के दिन एक लाख लोगों को खुला मंच में उतारने का दावा किया था लेकिन शायद माओवादी के अकेले के भी सभा में इतनी कम संख्या कभी नहीं होगी, जितनी कि २१ दलों ने मिलकर जो सभा किया था उसमें दिखाई दिया। १ लाख का दावा करने वाले सत्ता पक्ष को दस हजार की संख्या भी जुटाना मुश्किल पडÞ रहा है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष इन सभी के द्वारा अपनी अपनी शक्ति के नुमाईश में जनता की उदासीनता इस बात को साबित करती है कि इन नेताओं और दलों से जनता का भरोसा उठता जा रहा है। इतना ही नहीं जनता को भी अब संविधान सभा चुनाव हो या नहीं हो अभी हो या बाद में हो उस बात से कोई र्फक पडÞता दिखाई नहीं दे रहा है। इसलिए भी जो नेता आन्दोलन और शक्ति पर््रदर्शन की बात कर रहे हैं वे भी इस सच्चाई से वाकिफ हैं कि जनता का र्समर्थन इस समय मिलना मुश्किल है इसलिए भी वो बीच-बीच में राजनीतिक सहमति करने का राग भी अलापते रहते हैं ताकि दलों के बीच सहमति हो जाए और जनता के दरबार में उन्हें मुंहकी ना खानी पडÞे।
लेकिन राजनीतिक सहमति में कुछ नेताओं का अहम आडे आ रहा है। सभी दल में बहुत ऐसे नेता हैं, जो चाहते हैं कि सहमति हो जाए और देश में जल्द से जल्द चुनाव हो जाए ताकि सभी राजनीतिक दलों को अपनी हैसियत का अंदाजा भी हो जाए। लेकिन माओवादी है कि बिना कुछ शर्ताें को मनवाए सत्ता छोडÞना नहीं चाहती है और कांग्रेस-एमाले बिना शर्त माओवादी को सत्ता छोडने को कह रही है। सहमति के लिए माओवादी रोज नए नए शर्त सामने ला रही है। और कांग्रेस-एमाले सुशील कोइराला को प्रधानमंत्री बनाने से कम पर विचार ही नहीं करना चाहती। राष्ट्रपति मूक दर्शक बने हुए हैं और उनके पास कोई रास्ता भी नहीं बच गया है। उन्होंने अपने हथियार डाल दिए है और दलों को बुलाकर सहमति के लिए कहने के अलावा वो और कुछ कर भी नहीं सकते।
सत्ता ही प्राथमिकता
माओवादी ने साफ कर दिया है कि वो कांग्रेस-एमाले को किसी भी हालत में सत्ता नहीं सौंपना चाहती और कांग्रेस-एमाले माओवादी की सरकार बदले बिना चुनाव में जाने को तैयार नहीं है। वैसे देखा जाए तो कांग्रेस-एमाले का यह तर्क कि उनकी सरकार आने के बाद ही चुनाव निष्पक्ष कराया जा सकता है यह बात गले नहीं उतरती। अल्पमत में रही कांग्रेस-एमाले और विपक्षी दलों के गठबन्धन किस आधार पर सत्ता का नेतृत्व मांग रही है यह बात समझ से परे हैं। ना तो उनके पास विघटित संविधान सभा के बहुमत दलों का र्समर्थन ही हासिल है और ना ही उनके पास इतनी शक्ति और जनाधार ही बच गया है कि वो माओवादी को सत्ता से उतार फेंके। कांग्रेस जो कि इस समय बडÞी-बडÞी बात कर रही है कि राणा शासन से लेकर पंचायत तक को और वीरेन्द्र से लेकर ज्ञानेन्द्र तक को सत्ता छोडने पर मजबूर कर दिया था तो उस समय में और आज के समय में काफी अन्तर है। इस समय कांग्रेस में कोई मजबूत जनाधार वाला नेता नहीं है और जो इस समय पार्टर्ीीा नेतृत्व कर रहे हैं वो जनता में उतने लोकप्रिय भी नहीं है। इस समय कांग्रेस-एमाले सरीखे दल को चाहिए कि वो जनता के बीच जाएं और अगले चुनाव में अपने लिए बहुमत की गुहार लगाएं क्योंकि पिछले चार वषर्ाें में कांग्रेस-एमाले की छवि और अधिक बिगडी है। ऊपर से इन दोनों ही दलों पर संघीयता विरोधी, मधेश विरोधी, परिवर्तन विरोधी होने और सिर्फसत्ता के लिए लालायित रहने वाले दलों के रूप में बन गई है। कांग्रेस-एमाले को सरकार में जाने के बजाए जनता के बीच जाकर चुनाव का सामना करना चाहिए। लेकिन जिस तरीके से कांग्रेस-एमाले सत्ता के लिए लडÞ रही है उससे साफ होता है कि उनकी प्राथमिकता संविधान या संविधान सभा का चुनाव नहीं बल्कि सत्ता ही है। कांग्रेस-एमाले इस समय बार बार एक बात की रट लगा रही है कि माओवादी सत्ता कब्जा की ओर बढÞ रहे हैं। इसलिए वो सत्ता में जाना चाहते हैं। इसका फैसला सत्ता में जाने के बाद करने के बजाए कांग्रेस-एमाले को जनता के बीच जाना चाहिए और माओवादी के इस षड्यंत्र का भण्डाफोड करना चाहिए ताकि चुनाव में जनता माओवादी को सबक सिखा सके। लेकिन पता नहीं क्यों कांग्रेस-एमाले के शर्ीष्ा नेताओं को यह बात समझ में नहीं आ रही है। यदि चुनाव हुआ तो ताजा जनादेश के बाद जिस दल के पास बहुमत आएगा, वो ही सत्ता पर राज करेगा। चाहे जनता माओवादी को चुने या कांग्रेस-एमाले को। लेकिन माओवादी को सत्ता पर कब्जा करने में कांग्रेस-एमाले की भूमिका संदिग्ध दिखाई देती है। क्योंकि चुनाव के लिए जितनी देरी होगी, माओवादी सत्ता पर अपनी पकडÞ को उतना ही मजबूत बनाते जाएंगे। इसलिए माओवादी को सत्ता कब्जा से रोकने के लिए भी चुनाव होना जल्द से जल्द जरूरी है।
आन्तरिक द्वंद्व में फंसी माओवादी पार्टर्ीीजस तरीके से नेपाल पर अन्तर्रर्ाा्रीय समुदाय का विश्वास उठता जा रहा है और जिस तरीके से पडोसी देश नेपाल में जल्द से जल्द चुनाव कराकर संविधान निर्माण पर जोडÞ दे रहे हैं, इस बात पर वर्तमान सत्तारूढ दलों को गौर करना ही होगा। अन्तर्रर्ाा्रीय समुदाय को बहुत दिनों तक नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। इसलिए यदि बाबूराम भट्टर्राई के पद त्याग देने और किसी छोटे दल को या स्वतंत्र व्यक्ति के नेतृत्व में चुनावी सरकार गठन के लिए खुद ही पहल करना चाहिए। मधेशी मोर्चा को भी चाहिए कि वह सत्ता में चिपके रहने और अपना मंत्री पद बचाने के लिए माओवादी के हां में हां मिलाने के बजाए कोई ठोस निर्ण्र्ााकरे। मधेशी मोर्चा को एकजूट होकर माओवादी पर इस बात के लिए दबाब डÞाले कि वह चुनाव में जाए। यदि हो सके तो मधेशी मोर्चा को भी चुनावी सरकार का नेतृत्व अपने हाथ में लेने के लिए कांग्रेस-एमाले और माओवादी को भरोसा में ले और ऐतिहासिक काम को पूरा कर देश और दुनियां को दिखा दे कि अवसर मिलने पर वह हर काम करने का माद्दा रखती है।
यह सब कहने में और लिखने में तो अच्छा लगता है लेकिन माओवादी के भीतर जो अन्तरविरोध है, उसकी वजह से भी चुनाव की संभावना कम ही दिखाई देती है। माओवादी में इस समय सरकार नेतृत्व को लेकर दो गुट साफ दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ बाबूराम भट्टर्राई हंै, जो किसी भी कीमत पर सत्ता छोडने को तैयार नहीं हैं। वे प्रचण्ड की तरह भावना और आवेश में आकर सत्ता से बाहर नहीं होना चाहते और सत्ता में रहकर अपने कामों के जरिये जनता का भरोसा जीतने की पूरी कोशिश करने में जुटे हुए हैं। लेकिन उनकी राह में सबसे बडे बाधक उनकी ही पार्टर्ीीे अध्यक्ष प्रचण्ड हैं। बाबूराम सरकार के हर कदम का विरोध करवाना और सरकार की कमी कमजोरी के बारे में बढा चढाकर पेश करने से सरकार की छवि धूमिल हो रही है। वैसे तो बाहर कहने के लिए प्रचण्ड सरकार का र्समर्थन करते दिखाई देते हैं लेकिन अन्दर से वो भट्टर्राई की बढÞती लोकप्रियता और पार्टर्ीीे भीतर उनकी बढÞती पकडÞ को कमजोर करने पर तुले हुए हैं। पिछले दो महीनों से देश की कुछ राष्ट्रीय मीडिया ने वर्तमान सरकार खासकर प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टर्राई के खिलाफ एक अभियान छेडÞा हुआ है। उनके द्वारा किए गए सभी कामों के खिलाफ बढचढकर लिखना और भट्टर्राई को बदनाम करने की साजिश में लगी हर्ुइ है। इसके पीछे किसी और का नहीं बल्कि प्रचण्ड का ही हाथ है। कान्तिपुर और नागरिक जैसे राष्ट्रीय अखबार में प्रचण्ड के निवेश और पकडÞ की बात किसी से अब छिपी नहीं है। और यह सब उनके ही इशारे पर हो रहा है यह बात माओवादी के ही नेता भी करने लगे हैं। वैसे तो माओवादी के महाधिवेशन के बाद प्रचण्ड का दुबारा अध्यक्ष बनना लगभग तय ही माना जा रहा है फिर भी बाबूराम भट्टर्राई को हटाकर वो अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हुए हैं। सिर्फमीडीया के जरिये ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र से सरकार को घेरने की कोशिश की जा रही है। सरकार के हर फैसले को अदालत में चुनौती देने, सरकार के हर अध्यादेश को राष्ट्रपति के द्वारा होल्ड पर रखने, सहमति के नजदीक पहुंच कर भी दलों के बीच सहमति नहीं होने- इन सभी में किसी ना किसी रूप में प्रचण्ड का हाथ स्पष्ट दिख रहा है। ऐसे में माओवादी की तरफ से सत्ता छोडने और फिलहाल चुनाव कराने की गुंजायश काफी कम है। माओवादी के नेता भट्टर्राई को बदल कर अपने ही किसी नेता को सत्ता सौंपने के फिराक में है। यदि सरकार में शामिल मधेशी मोर्चा सरकार छोडÞने की धमकी देती है तो उसके बदले कई दलों को उसने सरकार में शामिल होने का आश्वासन बांट रखा है।

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