धनिया

परशु प्रधान:धनिया उस सपने से विचलित हो उठी थी । उसे ही सोचते-सोचते एक बार फिर उसे नींद आ गई । बाहर तेज बारिश हो रही थी, धनिया की नींद फिर खुल गई । सपने को सोचते हुए उसे रोने का मन कर रहा था । सच तो यह था कि कई दिनों से रोते-रोते वह थक गई थी । आँसू के साथ-साथ उसकी आँखों के सामने उसके पति की छवि आ गई । वह विगत में चली गई । उस दिन वह छठ के लिए साडÞी खरीदने जोगबनी गई हर्ुइ थी । वहीं एक गन्दी सी भट्टी में उसकी मुलाकात रामखेलावन से हर्ुइ थी । गर्मी से परेशान वह जब पानी की तलाश में थी, तब उसने रामखेलावन की घूरती आँखों को अच्छी तरह से महसूस किया था । वह वहाँ से हटना चाह रही थी कि तभी ‘नाश्ता लीजिए’ की आवाज ने उसके कदम रोक लिए । यह आवाज रामखेलावन की थी और उसके साथ ही उसकी कामुक आँखें थी ।
फिर वही हुआ जो एक औरत और मर्द के बीच होता है । या आग और घी के बीच होता है । एक सम्मोहन ने धनिया को रामखेलाdhaवन के करीब ला दिया और आज वह इस मोडÞ पर खडÞी है ।
बारिश अब तक हो रही थी, लगता था सारा मधेश आज बह कर किसी नजदीक के समुद्र में विलीन हो जाएगा । उसकी छोटी सी झोपडÞी पानी से भर कर एक टापू में परिणत हो चुका था । बगल के ही झोपडÞी में उसकी देवरानी और देवर मस्ती से सोए हुए थे, सुअर-सुअरी की तरह । उसने उठकर ढिबरी को जलाया । बाँस के किबाडÞ को, जो अब गिरने ही वाला था, खोल कर बाहर आई । पानी ने उसके घुटने तक को छू लिया । वह चिल्लाई, “सोमा ! सोमा ! कितना सो रही हो, बाहर निकल कर पानी देखो, गाँव-घर बहने लगा है ।”
धनिया की आवाज पर देवर खांसते-खांसते बाहर निकला ।
“वषर्ा तो रुक नहीं रही, भाभी तुम जाकर सो जाओ, सुबह समाज बैठने वाला है ।” देवर ने समझाया । पर धनिया को अपने झोपडÞे में जाने का मन नहीं किया । अचानक उसे लगा कि काश इस पानी के साथ बह कर मैं मर पाती । किन्तु इसी के साथ उसे ख्याल आया कि अब तो वो अकेली नहीं है, उसके अन्दर एक और जीव साँस ले रहा है । क्या पता वो लडÞका हो, वह रामलखन का प्रतिनिधि भी हो सकता है ।
पानी एक जैसा बरस रहा था । अन्धकार भी चारांे ओर फैला हुआ था । उस अंधकार में उसका देवर उसके पास आकर उसे बाँहों में लेकर फुसफुसाया, ‘सुबह समाज बैठने वाला है । तुम कहना कि तुम्हें सेठ के साथ जाना है । उसकी कोई सन्तान नहीं है । वह मुझको दस हजार देगा, वह भी भारु । उस पैसा से तो मैं क्या-क्या कर सकता हूँ , कितना गरीब होकर रहूँ ।’
धनिया कुछ नहीं बोली । वहाँ से भागने की कोशिश की, लेकिन रामदेव ने उसे नहीं छोडÞा । ‘अब मैं तुम्हें कहाँ छोडÞने वाला हूँ, भैया तो चले गए । अब तो मेरा ही हक है तुम पर ।’ रामदेव ने और भी जोर से उसे भींच लिया । पहले कुछ अनुनय था, फिर अधिकार की बात थी और अब आज्ञा के रूप में उसने कहा, ‘सेठ ने तुम्हें पसन्द किया है, वह तुम्हें रानी बना कर रखेगा काफी धनी है वह । तुम्हारे बच्चे का भी मैंने मोल ले लिया है । कल तो तुम चली ही जाओगी….आज एक बार मैं भी…. ।’
उसके बाद उसने कोई आवाज नहीं सुनी । जोर-जोर की गडÞगडÞाहट में उसने भाभी…भाभी की आवाज सिर्फसुनी । फिर शायद वह सपना ही था उसे लगा कि उसका पति उसके साथ है । उसने कहा था, मैं कहाँ मरा हूँ । आज के जमाने में भी कोई टी. बी. से मरता है भला । उसे लगा कि उसके पति का सारा अंग उसके देवर में प्रत्यारोपित हो गया है । वो हाथ फिर बलवान हो गए हैं । उस छाती में फिर से गर्मी आ गई है । बाहर कौए के बोलने तक वो बेखबर सोई रही । सुबह जब उसे किसी ने पुकारा तो वह आवाज उसे अपने पति की ही लग रही थी ।
पर समय में अन्तर था । पानी रुक चुका था । समाज बैठने वाला था । चौकी के मूँछो वाले हवलदार की जोरदार आवाज उसके कान को फोडÞ रही थी । हवलदार ने कहा, ‘रामदेव ! तुम भी तो गरीब हो । कहाँ आज के जमाने में अपनी भाभी को पाल सकोगे । आए हुए ग्राहक को मत जाने दो । बाद में पछताना पडÞेगा । मुझे बहुत देर बैठने की फर्ुसत नहीं है । ‘
एक क्षण के बाद बडÞे अध्यक्ष की आवाज उसके कानों में आई, ‘आज मैं बहुत व्यस्त हूँ रामदेव । तुमने क्यों समाज बैठाया है, कल भी रख सकते थे । तुम्हारी भाभी कहाँ है -‘
रामदेव ने अपने हाथ जोडÞे । उसे पता था कि ये दोनों उसके विपक्ष में कभी नहीं जाएँगे । लेकिन बच्चा और माँ को खरीदने वाला सेठ अब तक नहीं आया था । गाँव के दो-चार लोग और भी वहाँ जमा हो गए । विषय तो सब को पता ही था । सभी चाह रहे थे कि धनिया बच्चे के साथ जोगबनी, कटिहार कहीं चली जाए । रामदेव के सर से बोझ हटे और इसी बहाने गाँव में सुअर काट कर छोटा- मोटा भोज हो जाए ।
प्रतीक्षा समाप्त हर्ुइ । सेठ जी अपने दल-बल के साथ आ गए । बैठे हुए पंचों में उत्साह का संचार हुआ । लोकल शराब आ गई । पान से भी सत्कार किया गया । हवलदार की आँखों में भी सेठ को देखकर चमक आ गई । बात उसने ही शुरु की…. इस उमर में भी बच्चा नहीं हुआ सेठ जी । डाक्टर, वैद्य, झाडÞ-फूंक नहीं करवाया – साठ की उम्र में कैसे किसी और के बच्चे का बाप बनिएगा – हवलदार की हँसी दूर तक फैल गई ।
‘बच्चा होना न होना तो भगवान का खेल है । हमारे हाथ में कुछ नहीं है । जो होना है वह सब प्रभु की मरजी से होता है हम तो सिर्फउसके निमित्त हैं । अब सेठ जी की किस्मत में ये बच्चा था तो कैसे रामखेलावन नहीं मरता ।’ गाँव के किसी बुजर्ुग की आवाज आई ।
इन आवाजों के बीच धनिया कहाँ खो गई ये किसी को भी पता नहीं चला । उससे पूछने की आवश्यकता भी किसी ने महसूस नहीं की । बडÞे अध्यक्ष को भाषण देने का मौका मिला, ‘चुनाव आने वाला है । हमारा आप सबको सहयोग करना पडÞेगा । हमारी पार्टर्ीीmांतिकारी पार्टर्ीीै । हम क्रांति में विश्वास रखते हैं, परिवर्तन में आस्था रखते हैं और नारी स्वतंत्रता और समानता, उनका सशक्तिकरण हमारा नारा है ।’
रामदेव के आँगन में समाज अच्छे से ही बैठा । अपने विचार सबने रखे । मंहगाई की बात आई, दूषित तेल न खाने की बात उठी । झण्डा और डन्डा की बातें हर्ुइं । दस गजा विवाद की भी चर्चा हर्ुइ । मंत्री के बेटों की बातें हर्ुइ । पजेरो की भी चर्चा हर्ुइ । बहुत कुछ हुआ । सेठ को कई बार उबासी भी आई । लगा कि मूल बात ही खो गई है । अंत में सेठ ने कहा कि पहले लेन-देन की बात कर लें ये सब तो होता ही रहेगा ।
समाज में मौन व्याप्त हो गया । धनिया को बुलाकर पूछो, कहीं से आवाज आई । वह आवाज कहीं खो सी गई, औरत से पूछने की आवश्यकता नहीं है । यह तो रामदेव की बात है वह धनिया को स्वयं रखेगा कि दूसरे को देगा । किसी को सर दर्द मोल लेने की क्या आवश्यकता ।
अब सेठ की मोलाई शुरु हर्ुइ, ‘रामदेव भारु दस हजार की बात मत करो मैंने तो नेपाली दस हजार की बात की थी । बोहनी मत खराब करो ।’
रामदेव के हाथ जो सुबह से जुडÞे थे और भी कस कर जुडÞ गए । उसने विनम्र आवाज में कहा, ‘अपनी भाभी दूसरे के यहाँ भेजने का मन उसका नहीं था, पर भैया का जाना बज्रपात की तरह है, कर्जा से दबा हुआ हूँ । मेरा दिन दशा…।’
रामदेव की आँखें भर आईं, र्’गर्भवती माँ का मूल्य सिर्फनेपाली दस हजार रूपए । इसकी उम्र ही कितनी है । पचीस की भी नहीं है । मैंने तो कहा मैं उसे भेजना ही नहीं चाहता । अपने भाई की निशानी कम से कम अपने पास तो रखता । पर गरीब होने के कारण…।’
सेठ को खाँसी होने लगी । खूब लम्बी और भयानक खाँसी । वातावरण में कुछ समय खाँसी की आवाज छायी रही । खाँसी के साथ लाल रंग का भी आभास हुआ । सेठ ने सौ-सौ के भारु रूपए की गड्डी निकाली । सब महात्मा गाँधी के चित्र वाले ।
नोट की गड्डी देखकर सब की आँख एक बार चमक गई । उस दस हजार रूपए ने कइयों को लुभाया । हवलदार ने सोचा दस महात्मा गाँधी तो उसके पाकेट में आ ही जाएँगे उसी तरह बडÞे अध्यक्ष ने बीस महात्मा गाँधी का सपना देखा तो कई एक दो महात्मा गाँधी का । कुछ ने सुअर कटने का तो किसी ने दारु का सपना देखा ।
एक र्सर्ूय बीस र्सर्ूय में परिणत हो गया । सेठ ने सबके सामने नोट गिन कर रामदेव को दिया । पंच समाज का अन्त हुआ । अब सिर्फधनिया को सेठ के हवाले करना बाकी रहा । एक क्षणके लिए खामोशी छा गई । एक छोटी हवा चली । दुल्हन को लाने की बारी आई तभी एक छोटी बच्ची दौडÞती आई, ‘पेडÞ में औरत फली है, साडÞी चोली पहनी हर्ुइ ।’
समाज के सभी लोग एकबारगी डर गए । धनिया कहाँ गई – सब उसे खोजने लगे । आवाज शून्य में खो गई । धनिया वहाँ कहीं नहीं थी । रामदेव खोजने लगा । थोडÞी दूर पर एक झोपडÞी में एक बोर्ड टँगा था, नारी चेतना केन्द्र । वह शायद डालर आने वाला कोई एन. जी. ओ केन्द्र था । कुछ दूर पर एक और बोर्ड था मानव अधिकार संघ । उससे ही कुछ आगे एक बगीचा था, उसी बगीचे के आम के पेड में आम नहीं धनिया फली थी । एक टहनी में गर्भवती धनिया की लाश झूल रही थी । वही बच्ची फिर चिल्ल्ााई, आम के पेडÞ में औरत फली है, हमारी बडÞी माँ फली है ।
अनुवाद ः श्वेता दीप्ति

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