धराप में धारा १३८ : रणधीर चौधरी

Randhir Chaudhary

रणधीर चौधरी

यहाँ मैं उस धराप की बात नहीं करना चाहूँगा जो कि नेपाल में माओवादी द्वारा शुरु किए गए गोरिल्ला युद्ध के वक्त में देखा गया था । नेपाल मे आमुल परिवर्तन की आवश्यकता को महसूस कर आतंकवादी शैली में माओवादियों द्वारा युद्ध किया गया था । राज्य के विरुद्ध किए गए युद्ध में हजारों की तादाद में सर्वसाधारण की हत्या की गई ।  माओवादियों द्वारा नेपाली सेना, पुलिस जवान और शस्त्र प्रहरी को मार गिराने के लिये विद्युतीय तार बिछाया जाता था जिसमें फँस कर ना जाने कितनी निर्दोष जनता ने अपने प्राणों को गँवाया ।   गणतन्त्र, धर्मनिरपेक्षता, प्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्र«पति और संघीयता (माओवादियो का मूल एजेन्डा नहीं था) इन एजेन्डाओं में से क्या–क्या माओवादी को मिलने जा रहा है वो माओवादियों को समझना चाहिये ।
अधिकार की मांग से घबराहट
मधेशियों के साथ भेदभाव आज का नहीं है यह नेपाल एकीकरण पूर्व और शाह वंश के उदय के समय से ही है । मधेश के स्रोत साधन का अपने हिसाब से उपयोग करना और बदले में मधेसियों को किसी अन्य सुविधा देने की बात तो दूर की है नागरिकता जैसे आधारभूत आवश्यकता से भी वन्चित रखा गया । यही एक उदाहरण शासकों  की कु्ररता की परकाष्ठा को बयां करता है । आदिवासी जनजाति को मतवाला की संज्ञा दे कर उनके आधारों को बेवास्ता करना नेपाली शासकों के चरित्र में देखा गया है ।  काठमांडू जैसे विकट जगह को राजधानी बनाया जा सकता है । परंतु भौगोलिक विकटता दिखाकर कर्णाली जैसे कई स्थानों को विकास और अधिकार से वञ्चित रखा गया है ये बातें शासकाें के विभेदपूर्ण नीयत को बताता है ।
सभी सीमान्तकृत समुदाय के अन्दर दबे आक्रोश का विष्फोटक रूप था मधेस आन्दोलन जैसे कई और अधिकार और पहचानवादी आन्दोलन । बात है सन १९७५ की, फेडरिक गेज, एक विदेशी अनुसन्धानकर्ता, उन्होंने कहा था कि, मधेस में जनता द्वारा क्षेत्रीय पहिचान की खोज जारी है । वह दिन दूर नहीं की जब वहाँ की जनता “नेपालीकरण प्रक्रिया” के विरुद्ध में विद्रोह करेंगे । सन २००७ में, अन्तरिम संविधान मे संघीयता शब्द को स्थान न देने के कारण धारा १३८ ने राजनीतिक रूप से सभी सचेत मधेसियों को आन्दोलित कर दिया था । गेज की भविष्यवाणी को मधेसी जनता ने सच कर दिखाया । नेपालीकरण के अन्त की मांग इस तरह से उठाया गया कि, अब आत्मनिर्णय का अधिकार मांगा जा रहा है । हलाँकि यह कोई नई बात नहीं है । आत्मनिर्णय का अधिकार दुनिया के कई राष्ट्रों ने दे दिया है । खैर, धारा १३८ वही धारा है, जिसको संशोधन करने के लिये ५४ मधेसियों को अपना जीवन वलिदान करना पड़ा था और यूँ कहे तो उन ५४ मधेसियाें के खून से धारा १३८ को संशोधन कर उसमे संघीयता शब्द रखा गया ।
अन्तरिम संविधान २०६३ की धारा १३८ की उपधारा (१क) के अनुसार— नेपाल की सार्वभौमिकता, एकता और अखण्डता को मद्देनजर रखते हुए सीमा, संख्या, नाम और संरचना के अतिरिक्त केन्द्र और प्रदेश के सूचियाें का पूर्ण विवरण, साधन—स्रोत और अधिकाराें का वितरण संविधानसभा से निर्धारण किया जाएगा  और उपधारा (३) के अनुसार राज्य की पुनर्संरचना एवं संघीय शासन प्रणाली का स्वरूप सम्बन्धी अन्तिम निर्णय भी संविधानसभा से किया जायगा । परंतु इसको ना मानते हुए १६ बुंदे असंवैधानिक समझौता किया गया है । जिस के बुंदा नंबर ३ में धारा १३८ को दफना दिया गया है ।  प्रदेश के  सीमांकन की सिफारिश करने के लिये नेपाल सरकार द्वारा एक संघीय आयोग बनाया जाएगा । जिसकी कार्यावधि ६ महीने की होगी । संघीय आयोग का प्रतिवेदन आ जाने के बाद व्यवस्था संसद के दो तिहाई बहुमत से उसको अन्तिम रूप दिया जायगा । वहीं पर अन्तरिम संविधान के धारा ८२ के अनुसार संविधानसभा द्वारा एक बार संविधान बन जाने के बाद संविधानसभा स्वतः विघटित हो कर व्यवस्थापिका संसद मे परिणत हो जाएगा, ऐसा कहा गया है ।  १६ बुंदे को संवैधानिक कहने वाले को इतना तो जरूर पता होना चाहिये था कि रूपान्तरित व्यस्थापिका की संवैधानिकता संविधानसभा जैसी नहीं रह जाती । नेपाल मे समुदाय विशेष के आधार पर संविधान की व्याख्या की जाती है जिस को बया करता है सर्वोच्च के फैसले पर नेपाली संविधानविदों की उत्तेजक टिप्पणी । नेपाल में जहाँ अंतरिम संबिधान २०६३ को आधार मान कर सर्वोच्च द्वारा किये गये फैसले को असंवैधानिक कहने का दुस्साहस किया जाता है उसके सर पर ही  संविधानविद् का ताज लगाया जाता है । सर्वोच्चद्वारा दिये गये इस ऐतिहासिक निर्णय को जो न मानने की धृष्टता दिखाई जा रही है उस से सीधा प्रमाणित होता है कि नेपाल में कुछ खास वर्ग लगे हंै जो धारा १३८ को धराप में धकेलने की जोरदार कोशिश में लगे हैं । नेपाल की पहली संविधानसभा जो की संसार की सबसे समावेशी सभा माना जाती थी । उस वक्त सर्वोच्च का फैसला आया था जिसमें कहा गया था कि संविधान सभा का समय अब नही बढ़ाया जा सकता है और उस फैसले को काठमाण्डौ द्वारा सर आँखो पर रख स्वागत किया गया । और वास्तविकता यह है कि उसी वक्त से ही धारा १३८ को धराप में फँसाने की चाल चली गयी थी ।
भविष्य पर काला बादल
अन्तरिम संविधान की १६७ धारा में से धारा १३८ एक ऐसी धारा है जो कि नेपाल को समृद्धि की ओर ले जा सकता है । उसमें उल्लेखित संघीयता को जितनी जल्दी मूत्र्तरूप दिया जायगा देश मे शान्ति और समानुपातिक विकास की रफ्तार उतनी ही बढेगी । विडंबना ! नेपाली अल्प दृष्टि वाले शासकों को यह एहसास नहीं हो पा रहा है । प्रोफेसर कृष्ण खनाल, जिनको मैं अकसर सुनता और पढ़ता हूँ उनके अनुसार अगर प्रदेश निर्माण के लिये बनाई जाने वाली आयोग में संघीयता के बिषय पर बात नहीं मिल पाई तो दीर्घकालीन रूप में ही यह मुद्दा संविधानसभा के मुद्दों से अलग हो सकती है । प्रोफेसर खनाल के तर्क पर अगर गौर किया जाय तो संघीयता शब्द को खत्म करने की रणनीति तय की गई है । क्यूँकि पहली संविधानसभा में भी राज्यपुनर्सरंचना आयोग गठन किया गया था । क्या हुआ उस आयोग के प्रतिवेदन को ? निष्कर्ष शून्य था तो क्या इसबार के आयोग में स्वयं भगवान आ कर काम करेंगे ?
संविधान की १६७ धारा में से धारा १३८ एक ऐसी धारा है जो कि देश को शान्ति एवं समानुपातिक विकास की ओर ले जा सकता है । क्योंकि यह धारा संघीयता से सम्बन्धित है । बिडम्बना ! इस देश के शासकों को यह रास्ता जँच नहीं रहा है । राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर कृष्ण खनाल के अनुसार यह सोलह बुँदे समझौते को ईमानदारी के साथ लागु नहीं किया गया तो संघीयता सदा के लिए पीछे पड़ सकती है । अगर ६÷८ महीने मे संघीयता का सारा बिषय वस्तु पर कुछ निचोड़ आया तो ठीक वरना संघीयता का मुद्दा अन्तरकाल के लिए छोड़ा जाएगा । न जाने इस देश को कौन सी पथ पर ले जाया जा रहा है ।  विश्व इतिहास में उस हरेक देश में राजनीतिक अनिष्ट हुआ है जहाँ जहाँ जनता की आवाज को नहीं सुना गया । बात है १९६३ की जिस वक्त बंगलादेश पूर्वी पाकिस्तान था । डेली स्टार नामक एक पत्रिका थी । उस पत्रिका मे फार इस्टर्न इकोनोमिक रिव्यूलेख मे लिखा गया था( यदि सैनिक शासन रहा तो पूर्वीपाकिस्तान पाकिस्तान का अंग नही रह जाएगा । और सन १९७१ मे बंगलादेश स्वतन्त्र हो गया और उसी पत्रिका के मार्फत यह भी कहा गया था कि, अगर यहाँ पर एकात्मक शासन कायम रहा तो पूर्वीपाकिस्तान पाकिस्तान का अंग नही रहेगा । यहाँ इस लेखक के मानसपटल मे दो बातें दिखाई देती है । पहला कि या तो नेपाल देश चलाने बाले ठेकेदारो को इस देश की सुन्दर अखंडता पसंद नही । दूसरी, नेपाली शासक शोषण की पराकाष्ठा को पार कर देना चाहती है, संघीयता के मुद्दा को दबा कर । आज मधेस मे जो स्वतन्त्र मधेस की चिंगारी भड़क रही है उसका जिम्मेदार राज्य स्वंय है । अगर राज्यद्वारा मधेसी लगायत सभी सीमान्तकृतों की मांग को संबोधन कर दिया जाता है तो स्वतन्त्र मधेस की चिंगारी खुद ब खुद बुझ जायेगी । परंतु राज्य को शायद यह सुलभ रास्ता चलना पसंद नही । किसी खास व्यक्ति को खुश करने के लिये, उसके जीवन की अन्तिम घड़ी में जागी सत्ता प्रमुख बनने प्यास बुझाने के लिए गैर संबैधानिक १६ बुँदे सहमति होती है  और अदालतद्वारा उसको सुधारने का जब परमादेश जारी होता है तो सम्माननीय अदालत को साम्प्रदायिकता के रंग मे रंगने की कोशिस की जाती है । मधेसी निवेदक, मधेसी वकील और मधेसी न्यायाधीसद्वारा दिए गए फैसला को न मानने की निर्लज्जतापूर्ण अभिव्यक्ति दी जाती है । क्या इससे देश में अराजकता नहीं फैलेगी ? माननीय डाक्टर अमरेशकुमार सिंह की मानी जाय तो अगर मधेसी जनता पहाड़ी न्यायाधीसद्वारा किए गए एक भी फैसला को मानने से इनकार कर दिया तो ? कोई पहाड़ी पुलिस यदि मधेसी अपराधियों को गिरफ्तार करे और मधेसी अपराधी कहे कि मै अपनी गिरफतारी पहाड़ी पुलिस को नहीं दूंगा, तो क्या होगा? क्या कानुन रह जाएगा इस देश में ?
विचलित मत होना
सीमांतकृत वर्गो को विचलित होने की आवश्यकता नहीं है । जिस मुद्दा को स्थापित करने के लिये लोग अपनी जान न्योछावर कर सकते हैं उस मुद्दे को संविधान मे स्थान न देना पाखंडीपन से ज्यादा कुछ नही । सीमांतकृत समुदाय के लिये रहीम का एक दोहा मुझे याद आ रहा है— रहीम कहते हैं—समय पाय फल होत है, समय पाय झरी जात । सदा रहे नही एक सी, का रहिम पछतात ।  अर्थात समय—चक्र गतिमान है । ऋतुएं क्रम से आ—जा रही है  ।  गणीतिय हिसाब से भले ही विपन्न वर्गो को अधिकार से वंचित करने की रणनीति बनाई जा रही हो, समय दूर नहीं अधिकार आन्दोलन का आगाज होगा और सब के सब अपने अपने अधिकार ले कर ही चैन बैठेंगे । अन्त मे माओवादियाें के लिये कुमार विश्वास की एक पंक्ति लिखना चाहुँगा— अहो रूपम अहो ध्वनि, तोता जाने तीतर की, मै जानु तेरे भीतर की ।
(२चबलबमजष्चप्त्ः

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