धर्मनिर पे क्षता बनाम हिन्दू राष्ट

प्रियंका पाण्डे

गणतंत्र की आड मे  दे श पर  थो पी गई धर्मनिरपेक्षता पर  एक बार  फिर  विवाद बढÞने  वाला है । दे श के  चन्द शासको  की मनमानी द्वार  लाई गई धर्मनिर पे क्ष ता के  विरुद्ध आवाजे  उठाने  लगी है । लो गो  के  मन मे  इसके  खिलाफ गुस् सा है । धर्मनिर पे क्ष ता पर  दे श की बहुसंख्यक लो गो  की र य है  कि इसे  खारि ज कर ते  हुए ने पाल को  फिर  से  हिन्दू राष्ट्र घो षित किया जाना चाहिए । आम लोगों के  तरफसे  धर्मनिर पक्षे ता के  खिलाफ औ र  हिन्दू राष्ट्र के  पक्ष में ऐ से  समय आवाज बुलंद हो ने  लगी है  जब संविधान सभा में र हे  ने ता इस दे श को  जातीयता, क्षे त्रीयता, भाषा के  आधार  पर  संघीयता के  तहत र ाज्यो ं का बँटवारा कर ने  जा र हे  हैं । मजे  की बात यह है  कि जिस संघीयता पर  दे श के  प्रमुख दलों में एकमत नहीं हो  पा र हा है , उसी संघीयता के  बारे  में दे श की ७५ फिसदी आबादी कुछ समझती ही नहीं है  ले किन आर्श्चर्य किन्तु सत्य बात यह है  कि ने पाल को  फिर  से  हिन्दूष्ट्र बनाने  व धर्म निर पे क्ष ता खत्म कर ने  पर  ६५ फिसदी लो गों का विचार  एक ही है  ।
यह आंकडे  एक सवर्  के  जरि ए प्रकाशित किए गए हैं । हाल ही में ने पाल नामक राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका में दे श की संविधान निर्माण प्रक्रिया व इससे  जुडी कई तथ्यों पर  सवरे  कर  प्रकाशित किया गया । धर्मनिर पे क्षता पर  भी कुछ सवाल इस सवरे  में शामिल किए गए थे । ने पाल को  हिन्दू राष्ट्र घो षित किया जाना चाहिए या फिर  धर्मनिर पे क्षता ही र हने  दे ना चाहिए – इस सवाल के  जवाब में सवरे  में शामिल लो गें में से  ६७ प्रतिशत ने  हिन्दू राष्ट्र के  पक्ष में अपना जवाब दिया वहीं ३४ प्रतिशत ने  धर्मनिर पे क्षता के  पक्ष में अपना विचार  र खा । धर्मनिर पे क्षता के  पक्ष में र हने  वालों में पहाडÞ के  जनजाति - ४६ प्रतिशत) औ र  मुस्लम समुदाय -७२    प्रतिशत) हैं । जबकि तरर्ई के  जनजातियों मं से  २४ प्रतिशत ने  ही धर्मनिर पे क्षता के  पक्ष में अपना जबाव दिया । इसी तर ह पहाड के  विभिन्न जातजाति, पहाड के  दलित, ने वार , तरर् ाई-मधे श के  जातजाति, मधे शी जनजाति तथा मधे शी दलितों के  बहुत बडे तबके  ने  ने पाल को  फिर  से  हिन्दू राष्ट्र के  रुप में र खे  जाने  के  पक्ष में अपना मत दिया है  ।
इस सवरे क्षण में एक औ र  चौंकाने  वाला तथ्य यह भी आया है  कि लो ग हिन्दू राष्ट्र तो  चाहते  हैं ले किन वो  राजतंत्र के  बिना हो  । हिन्दू र ाष्ट्र चाहने  वालो ं मे ं ४८ प्रतिशत लो गो ं की र ाय है  कि हिन्दू राष्ट्र तो  र हे  ले किन वो  राजसंस् था के  बिना ही लो कतंत्र के  पक्ष में हैं । औ र  एक सच्चाई यह भी है  कि राजसंस् था सहित का लो कतंत्र के  र्समर्थन कर ने  वालो ं की तादाद भी बुहत है  । सवर्े क्षण में पूछे  गए एक प्रश्न जिसमें राजसंस् था या लो कतंत्र को  चुनने  को  कहा गया था तो  उसमें ४८ फीसदी लो ग राजसंस् था सहित के  लो कतंत्र औ र  ४३ प्रतिशत र ाजसंस् था बिना के  लो कतंत्र के  पक्ष में दिखे ।
इन सवरे क्षणों से  एक बात तो  तय है  कि धर्मनिर पक्षे ता के  खिलाफ व हिन्दू र ाष्ट्र के  पक्ष में दे शभर  मे ं माहौ ल बनता ही जा र हा है । इस समय कई ऐ से  संघ-संस् थाएँ है , जो  दे श को  फिर  से  हिन्दू राष्ट्र की माँग को  ले कर  विभिन्न कार्यक्रम, धर ना, पर्रदर्शन, जुलुस, नारा, सभा रै ली कर  र हे  हैं । इनमे  से  राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टर् पाल तो  खुलकर  र ाजसंस् था व हिन्दू र ाष्ट्र के  पक्ष मे ं आन्दो लनर त है  ले किन हिन्दू राष्ट्र को  राजसंस् था के  साथ जो डÞकर  दे खे  जाने  से  राप्रपा ने पाल को  लो गो  का पूरा र्समर्थन नहीं मिल पा र हा है  । कुछ ऐ सी संस् थाएँ भी है , जो  दे श को  र ाजसंस् था बिना का लो कतांत्रिक हिन्दू गणतन्त्र की मांग पर  अडे  हुए है ं । इन संस् थाओं मे ं हिन्दू स् वयंसे वक संघ व ने पाल जनता पार्टर्मिल है  । माओ वादी को  छो डÞकर  बाँकी सभी दलो ं मे ं ऐ से  सभासदो ं की संख्यां की भर मार  है , जो  दे श में हिन्दू राष्ट्र व्यवस् था कायम कर ना चाहते  हैं । संविधान बनाने  का समय जै से -जै से  नजदीक आते  जा र हा है , वै से -वै से  धर्मनिर पक्षे ता, व हिन्दू र ाष्ट्र पर  बहस ते ज हो  गया है  । आने  वाले  दिनों में इस पर  व्यापक बहस औ र  आन्दो लन हो ने  तक की संभावना है ।
वै से  कई विशे षज्ञ यह भी कहते  हैं कि जब गणतंत्र में जात ीयत, क्षे त्रीय औ र  भाषायी आधार  पर  राज्यों का नामाकर ण औ र  विभाजन हो  सकता है  तो  जनसंख्या के  आधार  पर  ने पाल को  हिन्दू र ाष्ट्र क्यो ं नहीं घो षित किया जाना चाहिए – जब ने वार  लो गो ं के  लिए ने वा, लिम्बु के  लिए लिम्बुवान, मधे शी के  लिए मधे श, थारु के  लिए थरुहट, अवधि के  लिए अवध, मै थिली के  लिए मिथिला तो  ८० प्रतिशत हिन्दू बहुल जनसंख्या वाले  इस दे श मे ं हिन्दू र ाष्ट्र घो षित क्यो ं नहीं किया जा सकता है  –

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