धर्ममय रथ

रवीन्द्र झा ‘शंकर’:वैदिक शास्त्रअनुसार युग चार बताए गए हैं– कृतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग । कृतयुग में धर्म की प्रधानता थी । उस समय राजा हरिशचन्द्र ने अपने वचनरक्षार्थ अपना सर्वस्त्र बिना युद्ध किए ही दान कर दिया था । त्रेता में धर्म की स्थापना के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम इस अवनीतल पर अवतरित हुए उन्होंने बाल्यकाल में ही महर्षि विश्वामित्र से अस्त्र–शस्त्र सञ्चालन की विद्या प्राप्त की और उस में परम प्रवीण हो गए थे । वनवास काल में जब माता जानकी का राक्षसराज रावणद्वारा अपहरण किया गया, तब उनकी मुक्ति के लिए भगवान राम ने वानरो की सेना लेकर लंका पर चढ़ाई कर दी । कई दिवस तक युद्ध होता रहा । अनेको राक्षस योद्धा मारे गए । यहाँ तक मेघनाद और कुम्भकणर््ा भी मारे गए, तब अन्त में लड़ाई के मैदान में रावण स्वयं युद्धस्त्र लेकर भगवान राम के समक्ष उपस्थित हुआ । उस समय भगवान राम पैदल थे और उनके पैर में चरणपादुकाएँ भी नहीं थी । यह देखकर विभीषण चिन्तित होकर कहने लगे– नाथ न नहीं तन पद त्राना । केही विधि जितव वीर बलवाना (रा.च.मा.६।८०।३)
यह सुनकर श्री राम ने विभीषण से कहा–
सुनहु सखा कह कृपानिधाना । जेहि जाय कोई सो स्यंदन आना रा.प.मा. ६।८०।४
रामजी ने कहा– ‘हे मित्र ! सुनो, जिससे जीत होती है, वह दूसरा ही रथ है । उस धर्ममय रथ का वर्णन इस प्रकार किया– जिसमें शुरता और धीरता रुपी पहिऐ लगे हैं । सत्यता मजबूती ध्वजा और शीलता पताका है । बल, विवेक, दम (इन्द्रियों का वश में होना) और परोपकार–ये चार उसके घोड़े हंै, जो क्षमा, कृपा और समता की रस्सी से बंधे है । ईश्वर का भजन ही अति चतुर सारथी है, वैराग्य ढ़ाल और सन्तोष तलवार है । दान फरसा, ज्ञान तेज बरदी और श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है । निर्मल और स्थिर मन तरकश है, जिस में शम, यम, नियम आदि अनेक प्रकार के तीर हैं । बाह्मण और गुरु की पूजा अमोघ कवच है ।
धर्ममय रथ का विवेचना करने के अन्तर भगवान राम ने विभिषण को बतलाया कि हे सखे ! ऐसा रथ जिसके पास हो, वह संसाररुपी समर में सदा अजेय रहता हैं । अर्थात् शामदाम एवं इन्द्रियनिग्रहद्वारा सब को जीता जा सकता है । इस सम्बन्ध में कुछ दृष्टान्त प्रस्तुत हैं–
धनुर्धर वीर अर्जुन के शौर्य और वीरता की चर्चा इन्द्रलोक में सदा हुआ करती थी, क्योंकि अर्जुन इन्द्र का पुत्र था, एक बार अर्जुन इन्द्रलोक गए इन्द्रपुरी में मनोरञ्जनार्थ अप्सराओं का नृत्य हुआ करता था । उर्वशी नृत्य कर रही थी । वह अर्जुन को देखकर मन ही मन बहुत आकर्षित हो गई । नृत्य समाप्त हुआ । सभी अपने–अपने शयन कक्ष में चले गए । अर्जुन भी अपने शयन कक्ष में चले गए । कुछ देर में दरवाजा खट–खटाने की आवाज आयी । अर्जुन ने पूछा– कौन ? ‘मैं उर्बशी हूँ’ सुनकर अर्जुन ने दरवाजा खोला और पूछा– ‘माता ! इतनी देर रात्रि में यहाँ आने का क्या प्रयोजन है ?’ उर्वशी ने अपने मनोभाव व्यक्त किए ।
अर्जुन ने हाथ जोड़कर कहा– आप हमारे वंश की जननी है । जैसे कुन्ती, माद्री और शची मेरी माता है, वैसे ही आप भी मेरी माता है । उर्वशी अपनी मनोकामना पूर्ण नहीं होने से अतिक्रोधित हो गई और बोली– ‘तुम पुरुष होकर नपुंसक की तरह बाते करते हो, जाओ एक वर्षपर्यन्त नपुंसक ही रहोगे । पाण्डवों के अजातजावत काल में अर्जुन राजा बिराट के अन्तःपुर में राजकुमारी को नृत्य सिखाते थे । वह एक वर्षपर्यन्त नपुंसकता का शाप उनके लिए वरदान बनकर आया और उस वर्ष में उन्हें कोई पहचान न सका । सन्त सदगुरु महिर्ष परमहंसजी महराज कहते है– ‘सतव्रत में दृढ़ आप हो, कोई श्रम क्या करे ।’ अर्जुन सत्य में प्रतिष्ठित थे । इसलिए इसलिए उर्वशी का श्राप वरदान बन गया ।
यह शील का प्रभाव है धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मी– ये सब शील के ही आधार पर रहते । शील ही इन मूल शील के बल पर त्रिलोक में विजय प्राप्त होती है । प्रश्न उठता है कि हमारी इन्द्रियाँ, जो विषयों की आनन्द वाटिका में अहनिंश अतिशय चपल गति से चालायमान है, वे कैंसे रुकेगी ?
श्री मद्भागवत गीता में श्रकृष्ण से अर्जुन ने पूछा– हे महावाहो ! मन अतिशय चंचल है । इसको वश में करना असम्भव–सा लगता है । इसपर श्रीकृष्ण भगवान बताते है कि यह मन वास्तव में बड़ा चंचल है, लेकिन अभास और वैराग्य के द्वारा इसे वश में किया जा सकता है ।
आत्मानं रथिनं विद्धिरं रथमेव तु ।
बुद्धिंतु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
(१।३।६)
शरीर रथ है, आत्मा रथी है, दश इन्द्रियाँ घोड़े हंै और मन लगाम है अर्थात् जबतक बाहर की दसों इन्द्रियाँ बंहिर्मुखी रहती है, जीवात्मा की वृत्ति दशमुख रावण की सी तमोगुणी बनी रहती है । दसों इन्द्रियाँ की चेतन धाराओं का समेटकर आज्ञाचक्र में केन्द्रित करने वाला अर्थात् स्थिर होनेवाला साधक दशरथ बन पाता है, फिर तो उसके उस मन्दिर (ग्रह) में राम का अवतार स्वभाविक हो जाता है । सन्तो ने इस अध्यात्मिक युद्ध के लिए जन साधारण को प्रेरित किया हे । भगवान राम ने भी विभीषण को यही प्रेरणा देते हुए अन्त में कहाँ है कि विभीषण इस प्रकार के रथ से मनुष्य महान् अजय शुत्र को भी जीत सकता है । शरीर से आत्मा निकल जाने के बाद शरीर मृत हो जाता है, वैसा ही मनुष्य अपना धर्म छोड़ देने के बाद शरीर जिन्दा होते हुए भी मृतक समान हो जाता है ।

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