धर्मसंकट में पडकर पूर्व प्रधानमन्त्री भट्टराई ने किया था हस्ताक्षर

दिनेश मौर्या,दाङ — ८ अक्टूबर,
अपने पार्टीका परित्याग करके नएं शक्ति के निर्माण में मधेश के कई जगहों पर दौडधूप लगाने में बाबुराम भट्टराई ब्यस्त दिखाई दे रहे हैं । इससे पूर्व भट्टराई ने जनकपुर तथा धकधई में बिरोध सभा किया था । दो दिन पहले दाङ जिले के लमही में बाबुराम पत्नी हिसीला यमी के साथ सभा में उपस्थित हुए ।
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सभा को सम्बोधित करते हुए पूर्व प्रधानमन्त्री भट्टराई ने बताया कि, संबिधान सभा में उनकी हालत बिल्कुल महाभारत के भीष्म पितामह के तरह थी । जिस तरह महाभारत में भीष्म पितामह हस्तिनापुर के सिंहासन का रक्षा करने के बचन से विवश थे । इसलिए धर्मी पाण्डवों के खिलाफ दुष्ट दुर्योधन का साथ दे रहे थे । उसी तरह भट्टराई भी धर्मशंकट में पड गए थे । वें भी संबिधान सभा से संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र का संबिधान जारी करने के लिए मैं वचन बद्ध था वहीं दुसरी तरफ उसमें मधेशी, थारु, जनजाती तथा आदिवासीयों का मांग सम्बोधित न होने के वजह से परेशान था । साथ ही में उन्होने यह भी कहा कि,“१० सालों के संघर्षकाल में जिन थारुओं ने अपनी कुर्वानी दी थी । उनका मांग सम्बोधन न होने के बावजूद भी पार्टी के शीर्ष नेताओं ने इनके बलिदान को नही समझा । हालांकि कुछ लोग इनके बिपक्ष में भी थे । पर जो विपक्ष में जो होते उन्हे बिद्रोही लगायत तमाम आरोपों से थोप दिया जाता था । इसलिए मैने हस्ताक्षर करके अपना एक वचन निभाया है और अब मधेश, थारुवान, थरुहट लगायत के प्रदेशों का मांग पूरा करने के लिए मधेश में आया हूं ।”
अज कैलाली जाने का कार्यक्रम उद्धृत करते हुए उन्होने कहा कि कई लोग हमें मना कर रहे हैं, पर यह सम्भव नही है । साथ ही उन्होने बताया कि,“कुछ नेता गण कहते हैं कि, चन्द लोग भारतीय ईशारोंपर आन्दोलन कर रहे हैं, अगर ऐसा है तो ओ मधेश में आकर दिखांए । अगर मधेश की जनता आन्दोलन में नही है तो फिर ओ यहां आने से डरते क्यों हैं ? जिस तरह शुतुरमुर्ग अपना शर रेत में डालकर सोचता है कि मैं सुरक्षित हुं, उसी तरह चन्द नेतागण भी राजधानी में रहकर सोचते हैं कि मैं सुरक्षित हुं ।”
lamhi1मधेश में जारी आन्दोलन में अपना समर्थन जताते हुए उन्होने कहा कि यह आन्दोलन जायज हैं । साथ ही में उन्होने आखिरी तक साथ देने की प्रतिबद्धता जतायी है और अज कैलाली में सभा किए जाने की बात भी कल उन्हेने बतायी थी ।

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