धाराओं में उलझी नागरिकता

कुमार अमरेन्द्र:नेपाल में बिस २००९ में पहली बार नागरिकता सम्बन्धी कानून का प्रादुर्भाव हुआ । २००९ के नागरिकता कानून ऐन ने नेपाल के अधिवासी को नेपाली नागरिकता का प्रमाणपत्र देने का प्रावधान बनाया था । उस नागरिकता कानून ने अधिवासी को नेपाली नागरिक माना था । अधिवासी का मतलब स्थायी बसोवास करने वाला । नेपाल के संवैधानिक इतिहासक्रम को देखा जाए तो बिं.स २००४ और २०१५ साल के संविधान में नागरिकता सम्बन्धी प्रावधान नहीं था ।
बि.सं २०१९ साल के संविधान में ंनागरिकता का प्रावधान
तत्कालीन राजा महेन्द्र के द्वारा निरकुंश पंचायती व्यवस्था चलाये जाने के बाद वि. सं २०१९ साल में जो संविधान लाया गया था । उसी संविधान में पहली बार नागरिकता सम्बन्धी व्यवस्था रखी गयी थी । उस संविधान ने मुख्य रूप से चार प्रकार की नागरिकता की व्यवस्था की गई थी । पहला, जो व्यक्तिः नेपाल में जन्म लिया हैं उनको जन्मसिद्ध नागरिकता देने का प्रावधान रखा था । दूसरा, माता और पिता में से कोई एक व्यक्ति नेपाली नागरिक हैं तो उन के सन्तान को नेपाली नागरिकता देने की बात कही थी । तीसरा, नेपाली नागरिक से शादी करने वाले विदेशी महिला को नेपाली नागरिकता देने का प्रावधान था और चौथा, नेपाल के कानून बमोजिम नेपाली नागरिकता प्राप्त करनेवाले सभी व्यक्ति ।
अभी तक का नागरिकता सम्बन्धी संवैधानिक व्यवस्था देखा जाए तो सब से उदार कानूनी व्यवस्था २०१९ साल के संविधान में किया गया था ।
२०४७ साल के संविधान में कैसा था नागरिकता प्रावधान
नेपाल अधिराज्य के संविधान २०४७ ने अपने आप से कुछ नया नही किया । २०१९ साल के संविधान के धारा ७ को हु–ब–हू उतार दिया और नागरिकता ऐन २०२० के तहत नागरिकता प्राप्त करने की प्रावधान को भी कायम रखा गया था । २०४७ साल के संविधान ने अपने आप कुछ नया व्यवस्था नही किया था । उस ने अपने धारा ८ के उपधारा (क) और (ख) में ये उल्लेख कर दिया था कि नेपाल के संविधान २०१९ के धारा ७ या नेपाल नागरिकता ऐन २०२० के दफा ३ बमोजिम नेपाली नागरिकता प्राप्त करने का प्रावधान रखा था । इसके अलावा अंगीकृत नागरिकता प्राप्त करने के लिए उसी नागरिकता ऐन के दफा ६ को बरकरार रखा गया । २०४७ साल के संविधान ने २०१९ के संविधान में रखे गए नागरिकता सम्बन्धी प्रावधान को बरकरार रखा । इस में सब से आश्चर्य की बात यह है कि २०१९ साल का संविधान तो खारेज हो गया । मगर उसी संविधान के धारा ७ को उसने जीवित रखा । इस के अतिरिक्त , नागरिकता ऐन के दफा ३ और ६ को भी २०४७ साल का संविधान जीवित रखा । इसलिए २०४७ साल के संविधान को अजीब तरह का कहा जा सकता है क्याेंकि उस ने २०१९ साल के संविधान को विस्थापित करते हुए भी उस के कुछ प्रावधान को आत्मसात किया ।
नेपाल भारत के बीच खुली सीमा और मधेश एवम् उत्तरी भारत के बीच रोटी–बेटी के सम्बन्ध से थोड़ा चौकन्ने होकर २०४७ साल के संविधान में भी नागरिकता सम्बन्धी प्रावधान रखा गया कहा जा सकता हैं । नागरिकता से जुडेÞ संवैधानिक और कानूनी प्रावधान को दुरुपयोग करते हुए भारतीय नागरिक नेपाली नागरिकता का प्रमाणपत्र न ले ले इस के तरफ नेपाल के संविधान निर्माता सब संविधान और कानून बनाने आवश्यकता से भी ज्यादा सतर्क दिखते हैं । और व्यवहार में देखा जाए तो नागरिकता के सन्दर्भ में मधेशी मूल के व्यक्ति को सब से ज्यादा शंका की दृष्टि से देखा जाता हैं । मधेशी मूल के व्यक्ति जब नागरिकता के प्रमाणपत्र लेने सिडिओ कार्यालय जाते हैं तो उन को सब से पहले मैं नेपाली नागरिक हुँ ये प्रमाणित करना पड़ता हैं । क्योंकि सिडिओ साहेब सब से पहले उन को भारतीय के रूप में देखते हैं । इसलिए उन को सब से पहले मैं भारतीय नही, नेपाली नागरिक हूँ यथेष्ट प्रमाण जुटाना पड़ता हैं ।
२०६३ साल के संविधान में नागरिकता प्रावधान
इस संविधान ने संविधान प्रारम्भ के वक्त वंशज के आधार पर नागरिकता प्राप्त व्यक्ति को नेपाली नागरिक करार दिया । और, कोई व्यक्ति के जन्म के समय में उन के माता या पिता में कोई एक नेपाली नागरिक हैं तो उन को वंशज के आधार पर नेपाली नागरिकता देने की बात कही । इसीलिए कहा जा सकता हैं कि २०६३ साल के संविधान का नागरिकता समबन्धी प्रावधान उदार ही है । परन्तु इस संविधान ने किसी व्यक्ति के माता या पिता में कोई एक नेपाली नागरिक है, तो उस व्यक्ति को वंशज के आधार पर नागरिकता देने की बात तो कही है । मगर व्यवहार में इस प्रावधान के आधार में नागरिकता प्राप्ति में कठिनाई देखी गयी है ।
और दूसरी बात, २०१९ और २०४७ के संविधान में जन्मसिद्ध नागरिकता सम्बन्धी जो प्रावधान था । उस प्रावधान को २०६३ के संविधान ने सीमित कर दिया । २०६३ साल के संविधान के नए प्रावधान के अनुसार २०४६ साल के चैत्र मसान्त के भीतर नेपाल में जन्मे और नेपाल में ही निरन्तर बसोवास करने वाले व्यक्ति को जन्मसिद्ध नागरिकता देने की बात कही । इस का मतलब विगत के प्रावधान के विपरीत इस संविधान ने जन्मसिद्ध नागरिकता प्राप्त करने के लिए एक समय सीमा निर्धारित कर दिया गया । सैद्धान्तिक रूप में इस प्रावधान के तहत नागरिकता प्राप्त करने के लिए कोई कठिनाई नहीं दिखती है । लेकिन व्यवहारिक रूप में गृह मन्त्रालय के परिपत्र और सिडिओ साहेब के नीयत के कारण इस प्रावधान के तहत नागरिकता प्राप्त करने में मधेशी जनता को बहुत कठिनाई हुई है । लेकिन समग्र में नागरिकता से जुडेÞ हुए विभिन्न प्रावधानों को तुलनात्मक रूप में देखा जाए तो ३०६३ साल के संविधान को अच्छा ही माना जाएगा ।
नया संविधान के संशोधित मसौदा २०७२
संविधानसभा अन्तर्गत जारी संविधान निर्माण प्रक्रिया तहत अभी तक जो नया संविधान का संशोधित विधयेक आया है नागरिकता के सन्दर्भ में ये नेपाल के इतिहास में अभी तक का सब से रुढि़वादी व्यवस्था है । नागरिकता के सन्दर्भ में नये संविधान ने सब से संकीर्ण प्रावधान तर्जुमा करने जा रहा है । २०६३ साल के अन्तरिम संविधान के नागरिकता सम्बन्धी अनेकों प्रावधान में नये संविधान ने अंकुश लगाने का प्रयत्न किया है ।
२०६३ साल के संविधान ने २०४६ साल चैत्र मसान्त के भीतर नेपाल में जन्मे व्यक्ति को जन्मसिद्ध नागरिकता देने का निर्धारण कर दिया था तो नये बनने वाले संविधान ने जन्म के आधार में नागरिकता दिए जाने के प्रावधान को हटा दिया है । संविधान के मसौदा ने दो तरह की नागरिकता प्रदान करने की बात की है । एक वंशज के आधार पर और दूसरी अंगीकृत नागरिकता ।
माता और पिता दोनों अगर नेपाली नागरिक हैं तो आसान तरीका से उन के सन्तानों को वंशज के आधार नेपाली नागरिकता दी जाएगी । परन्तु माता और पिता में कोई एक ही नेपाली नागरिक है तो पिता के सन्तान को वंशज के आधार पर नागरिकता दिए जाने का प्रावधान रखा गया है । किन्तु माता के सन्तान के हक में वंशज का प्रावधान नही रखा गया है । माता नेपाली नागरिक और पिता विदेशी नागरिक हैं और उन के सन्तान नेपाल में जन्म लेकर नेपाल में ही बसोवास कर रहे हैं और उन के पिता ने भी नेपाली नागरिकता ले ली है तो उन के सन्तान को वंशज के आधार पर नागरिकता देने का प्रावधान रखा गया है । परन्तु पिता ने नेपाली नागरिकता नही ली हैं तो उन के सन्तान को अंगीकृत नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है । वैसे तो एक जगह प्रावधान रखा गया हैं कि किसी व्यक्ति के जन्म के समय यदि उन के माता और पिता में से एक नेपाली नागरिक हैं तो उनके सन्तान को वंशज के आधार पर नागरिकता दी जाएगी । किन्तु दूसरे प्रावधान में उल्लेख करते हुए नेपाली माँ के सन्तान को निःशर्त वंशज के आधार पर नागरिकता देने से इनकार किया है । विदेशी पिता और नेपाली माँ के उस सन्तान को अंगीकृत नागरिकता दी जाएगी जो नेपाल में जन्म लिया हो और नेपाल में ही स्थायी बसोवास किया हो तथा विदेश की नागरिकता नहीं लिया हो । अंगीकृत नागरिकता दिया जाना व्यक्ति का हक नही बल्कि राज्य के स्वविवेक पर पड़ता है । प्रावधान के भाषा को ही देखा जाए तो अंगीकृत नागरिकता प्राप्त किया जा सकता है । और यहाँ उल्लेख करने योग्य बात ये है कि अंगीकृत नागरिकता धारण करनेवाले नेपाली को वंशज नागरिक के तुलना में बहुत कम राजनीतिक अधिकार दिया जाएगा ।
संविधानसभा में विचाराधीन संविधान के विधयेक को परिमार्जन किए बिना यदि संविधान की घोषणा हुई तो नागरिकता प्राप्ति में लोगों को पहले से ज्यादा कठिनाई होगी । अनेकों कठिनाई में से एक कठिनाई ये है कि जन्मसिद्ध नागरिकता लेने वाले व्यक्ति का यदि अंगीकृत नागरिकता प्राप्त व्यक्ति से सन्तान पैदा हुआ है तो उन के सन्तान के लिए नागरिकता प्राप्ति के सम्बन्ध में अभी के मसौदा संविधान में उल्लेख नही है ।
संविधान का पहला मसौदा जो आया था उसमें वंशज नागरिकता प्राप्त करने के लिए माँ और पिता नेपाली नागरिक होना अनिवार्य था । परिमार्जित मसौदा में माँ और पिता के बदले माँ अथवा पिता तो किया गया है । लेकिन इस परिस्थिति में भी पिता नेपाली नागरिक है तो ही उन के सन्तान को वंशज के आधार पर नागरिकता दी जाएगी । यदि माँ नेपाली और पिता विदेशी है तो उन के सन्तान को सीधे तौर पर वंशज की नागरिकता नहीं दी जाएगी । इस के अलावा, नेपाली पुरुष से शादी करने वाले विदेशी महिला के लिए भी कठिनाई कम नहीं हुई है । संविधान का प्रारम्भिक मसौदा में रखा गया शादी के सात वर्ष के वाद अंगीकृत नागरिकता देने का प्रावधान तो हटा दिया गया है । लेकिन परिमार्जित मसौदा में कानून बनाकर नेपाली पुरुष से शादी करने वाले विदेशी महिला को उसी कानून के तहत अंगीकृत नागरिकता देने की बात कही गयी है ।

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