नई डगर की तलाश में डा. भट्टर्राई

कुमार सच्चिदानन्द:जिस तरह पृथ्वी का र्सर्ूय की परिक्रमा का असर मनुष्य और उसकी संस्थाओं पर नहीं पडÞता, उसी तरह राजनीतिक चक्र भी घूमकर उलटे राजनीतिक क्षितिज के सामने आ जाया करता है । सोवियत शैली के समाजवाद से पूँजीवाद का संर्घष्ा लगभग ७५ वर्षों तक चलता रहा । अभी पूँजीवाद अपने पूरे उफान पर है । इस विजय को भाषा देने के लिए विभिन्न राजनीतिक नारे और आर्थिक शब्दाडंबर हमारे सामने परोसे जा रहा हैं, जैसे – भूमंडलीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण, उदारीकरण, नव उदारीकरण आदि । बहरहाल इतिहास से सबक सीखते रहना चाहिए । अतीतवादी या परम्परावादी तो, एक सबक सीख ही सकते हैं कि, राजनीतिक विचारधाराओं का शिखर तक उठान खतरनाक होता है । कठोर राजनैतिक विचारधारा अपन-आपको बदलना नहीं चाहती और इससे आमलोगों को बहुत तकलीफें  भी झेलनी पडÞती हैं । विचारधाराएँ अमर्ूत्त विचारों की कल्पना के अनुरूप समाज की पर्ुनर्रचना करना चाहती है । इसमें राजनैतिक सिद्धान्त और सामाजिक व्यवहार के बीच अर्न्तर्र्त्रिर्या की गुंजाइश नहीं होती । इन दोनों के बीच बढÞती खाई को पाटने के लिए किसी तानाशाह का आतंक उपस्थित हो जाता है और विचारधारा के रथ पर सवार तानाशाही अधिक खतरनाक होती है । इस खतरे से वामपंथ और दक्षिणपंथ कोई भी नहीं बच सकता ।
दूसरा सवाल यह है कि नेपाल दुनिया के निर्धनतम देशों में एक है । हमारे अधिकांश देशवासी शुद्धजल और सफाई के अभाव में जी रहे हैं । रोज सैकडÞों बच्चे ऐसे रोगों से मर जाते हैं जिनका इलाज सम्भव है । भोजन का अभाव है, सही पोषक तत्व के अभाव में असंख्य लोग कुपोषण का शिकार हैं । देश के आम लोगों को सामाजिक न्याय नहीं मिल पाया है । अशिक्षा, अन्धविश्वास और निर्धनता नियति सी बन गई है । वास्तव में यह देश एक बीमार जीव की तरह है जो अपनी सन्तति से बेहतर इलाज की अपेक्षा कर रहा है । यद्यपि इसकी बेहतरी की संभावनाएँ हैं, लेकिन अगर नारों को छोडÞ दिया जाए तो सचमुच कोई नहीं जानता कि भविष्य में यह संभावना कब वास्तविकता बन जाएगी – आमलोग इस देश में बेकारी, गरीबी, कुपोषण और निरक्षरता जैसी समस्याओं के आँकडÞे को नहीं जानते और उन्हें जानने की जरूरत भी नहीं क्योंकि वे रोज इसे गहर्राई से महसूस करते हैं । चिन्ता यह नहीं है कि वे इस दर्द को महसूस कर रहे हैं, चिन्ता का विषय यह है कि इससे मुक्ति दिलाने के लिए जिस औषधि की आवश्यकता है उसे छोडÞकर सिद्धान्तों की घूँट पिलायी जा रही है । लेकिन यह सच है कि जब तक आमलोगों, आर्थिक विशेषज्ञों तथा उदारीकरण के हमारे नए वास्तुविदों की अलग-अलग विचारधाराओं का स्पष्ट मेल नहीं होता तब तक ऊँची-ऊँची आर्थिक तकनीकी जटिलताओं का भ्रमजाल खडÞा कर जनमत को मन माफिक मोडÞने की कोशिश के सिवा और कुछ नहीं किया जा सकता । समस्या के तकनीकी पहलू का जानना जरूरी है लेकिन लोगों के दैनिक जीवन में उसका महत्व प्रतिपादित करके ही ।
नेपाल के पर्ूव प्रधानमंत्री श्री बाबूराम भट्टर्राई ने ‘नेपाल साप्ताहिक’ में ‘खाँचो नयाँ शक्तिको’ शर्ीष्ाक से नेपाल के सर्न्दर्भ में नयी राजनैतिक शक्ति के विकास की संभावना क्या जतलायी, यहाँ के बौद्धिक-वृत्त में एक उफान का आलम देखा जा रहा है । उन्होंने यह स्थाापना दी है कि पहली संविधानसभा राजनैतिक दलों के वैचारिक द्वन्द्व के कारण असफल हर्ुइ और अभी भी स्थिति में कोई खास परिवर्त्तन नहीं आया है । आलेख में उन्होंने यह भी अभिव्यक्ति दी कि नवउदारवादी दृष्टिकोण सम्पर्ूण्ा विश्व और हमारे समाज को पर्ूण्ा रूप में नहीं समझ सकता इसलिए हमारी समस्या का हल भी नहीं कर सकता । एक अन्य दृष्टिकोण है मार्क्सवादी दृष्टिकोण जो सामाजिकता को प्रधानता देता है लेकिन इसने भी व्यक्ति के निजत्व को समेट नहीं सका । दूसरी ओर निजत्व को ही पर्ूण्ा मानने और समग्र समाज के हित की अपेक्षा व्यक्ति के स्वार्थ को प्रधानता देने वाले राजनैतिक दृष्टिकोण से भी विश्व का भला नहीं हुआ और इसने समाज में द्वन्द्व उत्पन्न किया । इसलिए उन्होंने इन दो दृष्टिकोणों की खामियों को समझने तथा इसके सकारात्मक पक्ष को समेटने की वकालत की है ।
नेपाल के सर्ंदर्भ में उन्होंने यह विचार दिया है कि साठ वर्षसे पर्ूव के आन्दोलन को नई ऊँचाई में पहुँचाकर पूँजीवादी क्रान्ति को पर्ूण्ाता देते हुए पूँजीवाद के विकास और समाजवाद के नए युग में हम प्रवेश कर चुके हैं । अब मुख्य रूप से आर्थिक विकास और समृद्धि के एजेण्डे को केन्द्र में रखकर तीव्र उत्पादन और उत्पादकत्व वृद्धि के साथ नेपाली समाज को आधुनिक युग में लेकर जाने की आवश्यकता है । यद्यपि इसका फैसला जनता करेगी कि इसका नेतृत्व सामूहिक रूप में कौन करेगा – उनका मानना है कि आवश्यकता और आकस्मिकता के परिणामस्वरूप नया नेतृत्व जन्म ले सकता है । इसमें तीन प्रकार की संभावनाएँ हैं । प्रथम कि वर्त्तमान दल और उसके नेता ही समय की आवश्यकता को महसूस कर अपने आप को रूपान्तरित कर ले । दूसरी, सभी पार्टर्ीीे इस विचार को आत्मसात करनेवालों का नया ध्रुवीकरण भी हो सकता है । तीसरी, नया नेतृत्व का जन्म भी हो सकता है । कुल मिलाकर बाबूरामजी नई शक्ति के पनपने की संभावना के प्रति आशान्वित हैं और तीनों में सबसे अधिक तीसरी संभावना के प्रति वे अधिक आश्वस्त हैं ।
उन्होंने तर्क दिया है कि पूँजीवाद के ऊपरी चरण में पहुँचकर पिछडÞे चीन, कोरिया, वियतनाम एवं एशिया तथा लैटिन अमेरिकी देशंांे में समाजवाद के प्रयोग हुए । लेकिन बिना पूँजीवाद के आधार और बगैर विज्ञान-प्रविधि के विकास के उन्नत समाजवाद की स्थापना की कोशिश का नतीजा बेहद यांत्रिक एवं भद्दा निकला । फलस्वरूप विकृत तथा बेहद केंदीकृत नौकरशाह, निरकंुश एवं बंद दरवाजे वाले समाज के निर्माण की कोशिश हर्ुइ । यह प्रयोग सफल नहीं हुआ । उन्होंने यह भी कहा कि नेपाली समाज नए चरण में प्रवेश कर चुका है । अब उसका नेतृत्व करने के लिए अपने संगठन, नेतृत्व एवं कार्यशैली को परिवर्त्तन करके आगे जाना होगा । यदि ऐसा नहीं किया जा सकेगा तो नई शक्ति का उदय होगा । उसे कोई नहीं रोक सकेगा । एक बात तो निश्चित है कि कल तक र्सवहारा के अधिनायकवाद की बात करने वाले तथा संशोधनवादियों के लिए विष उगलने वाले डाँ. बाबुराम भट्टर्राई ने र्सवथा नई भूमिका एवं संशोधित पथ का उद्घोष किया है । उनका नया मार्ग अब तक के घोषित प्रचंड पथ के समानन्तर होगा या विपरीत या देश एवं जनता के लिए लखनऊ की भूलभुलैया साबित होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा । लेकिन उनके विचारों को र्सवथा एकांगिक और अवसरजन्य कहकर उसकी गंभीरता को कम नहीं आँका जा सकता ।
बाबूराम भट्टर्राई के इन विचारों से सहमत होते हुए ही वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र मिश्र ने यह विचार दिया है कि इस देश में दूसरे, तीसरे तथा चौथे बनने वाले राजनीतिक समूह नहीं, निर्ण्ाायक रूप में पहली बननेवाली पार्टर्ीीाहिए जो देश में नया राजनीतिक संस्कार की शुरूआत कर सके, जो सिद्धान्त नहीं तीव्र विकास का वाहक बन सके । सैद्धान्तिक रूप में अपनी पृथकता का परिचय देनेवाले चाहे कोई भी प्रमुख दल क्यों न हो, अब वे लोकतंत्र, गणतंत्र और उदार अर्थतंत्र को चुनौती देने की अवस्था में नहीं हैं । र्सवसाधारण लोकतंत्र के भीतर सिद्धान्त नहीं, विकास खोज रहे हैं । लोकतंत्र के भीतर विकास देने की शर्त्त पर किसी भी राजनीतिज्ञ को सिद्धान्त का दस्तावेज लिखने की आवश्यकता नहीं है । कालान्तर में सम्बन्धित विद्वान इस विकास के माँडल को सिद्धान्त में प्रतिपादित कर देंगे । समग्र रूप में वैचारिक स्तर पर वे राजनीति में एक अलग मूल्य की स्थापना की बात कर रहे हैं । इस राजनैतिक लक्ष्य का वाहक कौन होगा, यह अलग विषय है लेकिन उन्होंने इस बात की ओर भी संकेत किया है कि जनमानस में राजनीति की प्रचलित मूल्य-मान्यताओं एवं संस्कारों के प्रति वितृष्णा की स्थिति हैं और यही स्थिति नवीन राजनैतिक शक्ति के उदय का प्रेरक बन सकती है ।pm baburam bhatrai
इस सर्न्दर्भ में नेकपा एमाले के विद्वान नेता प्रदीप ज्ञवाली पर्ूव प्रधानमंत्री डाँ. भट्टर्राई से इत्तफाक नहीं रखते । उनका मानना है कि पार्टर्ीीौर नेतृत्व के प्रति शिकायत नयी शक्ति के निर्माण का आधार नहीं बन सकता । पुराने की अयोग्यता नए की योग्यता का स्वयंसिद्ध प्रमाण नहीं । यही पार्टियाँ हैं जिन्होंने राणाशाही से नेपाली समाज को मुक्त कराया । तीस वर्षलम्बे निरंकुश निर्दलीय शासन से नेपाली अवाम को मुक्ति दिलाई, राजतंत्र को समाप्त किया । अपनी स्थापना के ६४ वर्षों का लगभग आधा समय इन्हें निरंकुश राजतन्त्र से संर्घष्ा में गुजारना पडÞा । उनका मानना है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधिमूलक संस्था तो मात्र बीस वर्षरह पाई है । अपनी समस्त सीमाओं के बावजूद नेपाली समाज ने विकास और जागरण की अनुभूति इसी निर्वाचित लोकतंत्र में पायी है । विद्वान राजनैतिक विचारक श्री ज्ञवाली के इस कथन से किसी को विमति नहीं हो सकती लेकिन बदलते विश्व के साथ कदम से कदम मिलाने के लिए विकास की जिस तीव्रता की अपेक्षा जनमानस को है, उस कसौटी पर उतरने की दृष्टि से ये सरकारें विफल रहीं हैं और इसका मूल कारण है राजनैतिक अस्थिरता । फिर इसके कारण अनेकमुखी हैं जिस पर अन्यत्र चर्चा हो सकती है लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि लगभग २४ वर्षों से नेपाल में प्रजातांत्रिक सरकारें हैं और लगभग इतने ही दिन हुए हैं जब पडÞोसी राष्ट्र भारत ने उदार अर्थव्यवस्था अपनायी और आज विश्व के तीव्र विकास दर वाले देशों की सूची में उसका नाम शुमार है । प्रजातंत्र की स्थापना के बाद निरंकुश राजतंत्र के साथ जब हम राजनैतिक संर्घष्ा की बात करते हैं तो उसे भी अपनी ही असफलता मानी जानी चाहिए क्योंकि जनता के असंतोष का फायदा किसी अन्य ने उठाने का प्रयास किया । अगर जनता संतुष्ट होती तो कोई भी शासन की बागडोर बिना उससे पूछे अपने हाथ में लेने का दुस्साहस नहीं करता ।
श्री प्रदीप ज्ञवाली रवीन्द्र मिश्र के ‘परोपकारी राज्य और उदारवादी-परोपकारी अर्थनीति’ की अवधारणा को अनूठा तो नहीं मानते लेकिन डाँ. भट्टर्राई के इस मत से उनकी विमति है कि माओवादी आन्दोलन के ‘आर्किटेक्ट’ माने जाने वाले बाबूरामजी का नवउदारवाद और साम्यवाद दो विपरीत विषय नहीं हैं और दोनों के सकारात्मक पक्ष को मिलाकर नई राह की तलाश की जा सकती है । उनके इस दृष्टिकोण से वे सहमत नहीं हैं और होना भी नहीं चाहिए क्योंकि यह तो एक वैचारिक आवरण है जो धुर वामपंथ के मार्ग से वैचारिक और कदाचित व्यावहारिक रूप में निकलकर कर देश को परम्परागत राजनीति की कुरूपताओं से निकलने का मार्ग तैयार कर दे । क्योंकि जनता के मोहभंग की स्थिति सिर्फमाओवादी से नहीं बल्कि समस्त राजनैतिक दलों से है । आज जो भी दल सरकार में हैं वे मात्र गणितीय समीकरण के कारण । सच यह है कि सामान्य बहुमत से भी वे बहुत दूर हैं और नवगठित सरकार की अब तक की जो गतिविधि और क्रियाकलाप रहे हैं, वे भी बहुत उत्साहजनक नहीं हैं । यह तो हमारा राजनैतिक यथार्थ है ।
चूँकि डाँ. भट्टर्राई ने नव उदारवाद और साम्यवाद को एक धरातल पर खडÞा कर दिया है इसलिए खगेन्द्र संग्रौला जैसे विद्वान लेखक अगर उन पर व्यंग्य-वाणों की बौछार करते हैं तो यह अस्वाभाविक नहीं है । दूसरा, श्री भट्टर्राई आम आदमी नहीं बल्कि एक निश्चित विचारधारा पर लम्बे जनयुद्ध के संचालन का श्रेय भी उन पर जाता है और सत्ता के शिखर पुरुष भी वे रह चुके हैं, इसलिए उनका यह विचार अगर उन्हें असंगत दिखलाई देता है यह तो अस्व्ाभाविक भी नहीं । कहीं न कहीं उक्त आलेख में डाँ. भट्टर्राई नए विचार, नए व्यक्तित्व और नए नेतृत्व की वकालत करते नजर आते हैं । इसलिए श्री संग्रौला उनके इन विचारों में नये राजनैतिक ध्रुवीकरण की प्यास देखते हैं तो यह भी अस्वाभाविक नहीं । लेकिन राजनीति को जनाकांक्षा की कसौटी पर खरा उतारने के लिए और देश को तीव्र विकास की दिशा देने के लिए अगर श्री भट्टर्राई सिद्धान्त के सेतु को पार कर नवीन का आग्रह कर रहे हैं तो हमें सकारात्मक मनोविज्ञान से प्रतीक्षा करनी ही चाहिए । हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि आदमी बदलता भी हेै और बदला हुआ आदमी संसार को भी बदल देता है । इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण हमें मिल सकते हैं ।
श्री भट्टर्राई के इस लेख के प्रकाशन के बाद राजनैतिक वृत्त में एक बहस सा चल पडÞा है । इसके पक्ष और विपक्ष में लगातार विचार आ रहे हैं । कुछ लेखक-विचारक नई शक्ति के बहस को असान्दर्भिक भी मान रहे हैं । ऐसे लोगों का मानना है कि भट्टर्राई से लेकर रविन्द्र मिश्र तक ने विकास की शर्त्त पर सिद्धान्त की उपेक्षा की है और राजनीति सिद्धान्तविहीनता के आधार पर नहीं हो सकती । इसलिए इस तरह का आग्रह अराजनैतिक है । लेखकों की एक जमात इस तरह की सोच को आदर्श तो मान रहे हैं लेकिन व्यावहारिक नहीं । इनका तर्क है कि इससे पर्ूव भी ऐसे प्रयास हुए हैं, जैसे देवेन्द्रराज पाण्डे का प्रजातांत्रिक लोकदल, गणेशमान श्रेष्ठ का विकास दल, केशर बहादुर विष्ट का प्रजातांत्रिक नेपाल पार्टर्ीीादि । ये सभी दल आज इतिहास के पन्ने में सुरक्षित हैं । ये तीनों स्वच्छ छवि कर्ेर् इमानदार नागरिक हैं । उन्होंने भी राजनीति को सिद्धान्त से अधिक विकास से जोडÞना चाहा । लेकिन सिद्धान्त के अभाव में उनकी आदर्श सोच के कारण पार्टर्ीीहीं चल सकी ।
यह सच है कि विचार कोई भी शाश्वत नहीं होता और उसकी आलोचनाएँ तो हो ही सकती है । इसलिए पर्ूवप्रधानमंत्री के इस विचार और इसके र्समर्थन में आए विचारों की आलोचना अगर होती है तो अस्वाभाविक नहीं है । यूँ भी यह हमारा परम्परागत मनोविज्ञान रहा है कि नवीन विचारों को हम ग्रहण तो करते हैं लेकिन काफी विचार-विमर्श के बाद और इस विमर्श में बहुत सारे अवसर से हम चूक जाते हैं । आज नेपाल में नए शक्ति के उदय का जो बहस चल रहा है उसे जमीन दिया है दिल्ली में नवस्थापित आम आदमी पार्टर्ीीे । यह निश्चित है कि कोई भी महत्वपर्ूण्ा कार्य अगर होता है तो अपने पर्ूववर्ती समस्त ज्ञान के आलोक में । इसलिए यहाँ के इस बहस को भी इससे अलग कर नहीं देखा जा सकता । गौरतलब है कि अरबिन्द केजरीवाल के नेतृत्व में जिस आम आदमी पार्टर्ीीे अत्यल्प समय में दिल्ली की राजनीति में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की उसके मूल में विकास का आग्रह नहीं बल्कि भ्रष्टाचार से मुक्ति की जनाकांक्षा थी । भ्रष्टाचार के विरुद्ध सामाजिक कार्यकर्त्तर्ाान्ना हजारे ने जो आन्दोलन छेडÞा उसके मुख्य प्रवक्ता थे अरबिन्द केजरीवाल । अन्ना के आन्दोलन से उठे भ्रष्टाचार विरोधी मुद्दे के प्रति दिल्ली की सरकार की उपेक्षा अरबिन्द केजरीवाल की सफलता का आधार बनी । नेपाल की धरती नई राजनैतिक शक्ति के विकास के लिए आदर्श हो सकती है क्योंकि यहाँ विकास के साथ-साथ राजनैतिक भ्रष्टाचार और अवसरवाद भी एक महत्वपर्ूण्ा मुद्दा है । यह भी सच है कि दिल्ली के चुनाव में केजरीवाल और उसकी पार्टर्ीीो जो अनापेक्षित सफलता मिली उसकी धमक आगामी संसदीय चुनाव में सुनने की संभावना नहीं है । क्योंकि एक राजनैतिक भूल तो वो कर बैठै हंै कि केन्द्र को सशक्त किए बिना उनहोंने साम्राज्य की ओर कदम बढÞा दिया । इसे रणनीतिक भूल मानी जा सकती है । इसके मूल में उनकी राजनीतिक अनुभवहीनता को भी रखा जा सकता है । इसलिए राजनीति से जुडÞे स्वच्छ छवि के लोग अगर नयी शक्ति के विकास की दिशा में गोलबंद होते हैं तो फिलहाल उनका स्वागत होना चाहिए ।
निराशा को जब जनता हथियार बना लेती है तो यह स्थिति किसी भी देश और समाज के लिए घातक होती है । एक बात तो हमारे राजनैतिक दलों को स्वीकार करना ही चाहिए कि उनके प्रति आम लोगों में निराशा का आलम है । क्योंकि प्रजातांत्रिक यात्रा में लगभग एक दशक के माओवादी जनयुद्ध से त्रसित नेपाल की जनता ने ही ‘राजावादी आओ, देश बचाओ’ का नारा दिया था । ज्ञानेन्द्र का प्रत्यक्ष शासन भी देश की जनता ने देख ही लिया और इससे निकलने के लिए ‘माओवादी आओ, देश बचाओ’ की आवाज भी उसने बुलंद की । उसका भी हश्र उसने देखा ही लिया । आज जो दल स्वयं को सम्पर्ूण्ा मानकर सत्ता के गलियारे में चहलकदमी कर रहे हैं, वे बैसाखी पर टिके हैं । यद्यपि वे जनाकाँक्षा की कसौटी पर कहाँ तक खरा उतरते हैं यह भविष्य के गर्भ में है लेकिन प्रारम्भिक संकेत तो अच्छे नहीं ही हैं । ऐसे में अगर तार्किक धरातल पर स्वच्छ छवि से भरी राजनैतिक शक्ति का उदय होता है तो जनता उसका स्वागत कर सकती है अन्यथा इतिहास के चक्र  की पुनरावृत्ति की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता । सिद्धान्त की शहनाई से विकास का संगीत निकलना मुश्किल सा है, कर्त्तव्य के ढोल-मजीरे भी चाहिए ।

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