नई पीढी के लिए गीता की नवीन पुस्तक

अध्यात्म ज्योति के र्सवस्वीकार्य और अत्यन्त लोकप्रिय ग्रन्थ के रुपमें श्रीमद्भागवत्गीता प्रख्यात है। हिन्दू ही नहीं अपितु बहुत सारे धर्मावलम्वियों ने भी गीताको श्रद्धापर्ूवक ग्रहण किया है। इसलिए कहा जाता है कि गीता एक ऐसा दर्शन है जो सभी स्थानां, समयकाल, सम्प्रदाय और परम्पराओं केे लिए समान रुप से सान्दर्भिक और उपयोगी है। इसी कारण गीता का संसार के प्रायः सभी प्रमुख भाषाओं मे भी अनुवाद हुआ है। गीता के सन्देशों को मानव अपने-अपने स्वभाव, धर्म के अनुसार पालन करते हुए अपने जीवनको र्सार्थक बना सकता है। इसलिए गीता मानव जीवन का ऐसा धरोहर है, जिसकी सान्दर्भिकता अनन्तकाल तक अक्षुण्ण रहने में कोइ शंका नहीं है।
लगभग पाँच हजार वर्षपहले महाभारत युद्ध के क्रममें स्वयम् भगवान श्रीकृष्ण के मुखसे प्रस्फुटित गीता एक पावन और अमूल्य ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ पर भागवान श्री कृष्ण के प्रति लगाव और भक्ति के विना कोई भी कलम चला सकता है कहना मुश्किल है। इस क्रम में हाल ही में श्री कृष्णप्रति समर्पित प्रोफेसर भू-चन्द्र वैद्यद्वारा अंग्रेजी भाषा में लिखित “एसेन्स अफ द गीताः टूवार्डÞस अ होलसम लिभिङ्ग” नामक पुस्तक मुझे पढÞने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इससे पहले उन्ही द्वारा नेपाली भाषा में प्रकाशित “भगवान भन्नुहुन्छ……..श्री भागवद्गीता” पढÞनेका सुअवसर भी प्राप्त हुआ था। गीता के गहन विषयको सरल भाषा में प्रस्तुत करनेकी प्रभावशाली शैली के कारण मुझे गीता पढÞने में जो रुचि और आनन्द प्राप्त हुआ इसके लिए मंै लेखक महोदय प्रति आभारी हूँ। इस पुस्तक के पढÞने के वाद ऐसा मेरा मानना है की विशेष करके नई पीढी, जो अपने पेशागत और सामाजिक जीवनको प्रारम्भ करने जा रहे है, उनके लिए ये पुस्तक अति प्रेरणादायी और उपयोगी होगी। क्योकिं कर्तव्य पथ से विचलित नही होने की गुढÞ रहस्य को इस पुस्तक ने पुन ः परिभाषित किया है।
गीता जीवन का ऐसा गीत है जिससे मानवको अपने जीवनके संर्घष्ा और जटिलताओं का हल ढÞुढÞने में सहयोग मिलता है। गीताका उपदेश मानव जीवनके आध्यात्मिक पक्ष के साथ भौतिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक और नैतिक पक्षों पर भी महत्व दर्शाया है। इस पुस्तक ने गीता के १८ -अठ्ठारह) अध्यायों का सार संक्षेप के अतिरिक्त विषयवस्तुका मौलिक रुपमें प्रस्तुत किया है। इसके अतिरिक्त गीता के सभी अध्यायों का सारांश अर्थात सन्देशांे को भी वहुत रोचक एवं प्रभावकारी ढÞंगसे प्रस्तुत किया गया है। इसमें गीताके ७०० श्लोकों को अंग्रेजी भाषाओंमे ऐसा अनुवाद किया है जैसा लगता हो ये अनुवाद न हो कर लेखककी मैलिक रचना है।
इस पुस्तकके अध्ययन के पश्चात पत्ता चलता है कि मानव जीवनका प्रत्येक कर्म केवल भौतिक आवश्यकता ही नही अपितु ये मानवका नैतिक दायित्व भी है और इससे ही प्रकृतिका सन्तुलन भी वना रहता है। इसलिए गीताको दर्शन और व्यवहारका संयोग माना गया है। गीता ने असल और विकृत प्रवृत्ति बीच के द्वन्दको बताते हुवे मनुष्यको असल प्रवृत्तिकी तरफ अग्रसर होनकी प्रेरणा प्रदान करता है। इस पुस्तकके अध्ययन से पत्ता चलता है की अज्ञानी मनुष्य किसी घटनाका मुख्य पात्र अपने को स्वंय मानता है जिस कारण उसमें अहंकार और आसक्ति जैसे भाव उत्पन्न होता है। यही भावना आगे चलकर उसे सही कर्म पथ पर चलने में बिध्न बाधाएँ उत्पन्न करते है। इसलिए ज्ञानी मनुष्य वह है जो अहंकार और आसक्तिको त्याग कर सही कर्म पर चलने को अग्रसर रहता है। गीता हमें मिथ्या अहंकार को त्यागने में मद्दत करती है। इससे ही मनुष्य में समदर्शन और समत्वका भाव विकसित होता है और अन्तमेर्ंर् इश्वरके समीप पहुँचने का मानव जीवन का लक्ष्य हाँसिल हो सकता है।
इस पुस्तक में योग के अवधारणा को सटिक रुपमें प्रस्तुत किया गया है। योग मनुष्य के सही सोचको उपयुक्त अभिव्यक्ति देने की व्यावहारिक कला या विधि है। कहा जाता है योग से ही आत्माका साक्षात्कार करके आत्मा और परमात्माका सुखद मिलन सम्भाव है। इसलिए योग के क्रम मे किया गया कोई भी प्रयत्न र्व्यर्थ या असफल नही होता। इस पुस्तक मे कर्म योग के सारको सटीक रुपमें प्रस्तुत किया गया है। असल कर्मयोगी वह है जो निस्वार्थ और निष्काम भाव से अपने कर्तव्य का निर्वाह करता हो अर्थात् आसक्ति से परे अपने कार्यको सम्पादन करता हो।
इस पुस्तक में लोक कल्याण की अवधारणा को भी प्रभावकारी रुप मंे प्रस्तुत किया गया है। लोक कल्याण के उद्देश्य से किया गया कर्म ही उत्तम कर्म है। मनुष्य की तृष्णा ही उसका सवसे वडÞा शत्रु है। तृष्णा रजोगुण की अभिव्यक्ति भी है। यह ऐसी शक्ति है जो मनुष्य को सही मार्ग से दूर रखती है। कहा गया है अहंकारको त्याग कर्रर् इश्वर के चिन्तन मनन से ही तृष्णा से पार पाया जा सकता है।
गीता में कहा गया है मनुष्यको अपने मोक्ष प्राप्त करने के लिए संसारको त्यागना ही जरुरी नही है वल्कि हम अपने निजी प्रवृत्ति और हैसियत के अनुसार आसक्ति और अहंकार रहित हो कर अपने कर्म सर्ेर् इश्वर का साक्षात्कार किया जा सकता है। अहंकार मनुष्य में भ्रम सृजना करता है। अहंकारको शक्ति माननेवाला मनुष्य मर्ूख है वल्कि अहंकार त्यागना ही वास्तविक वुद्धिमानी है। इष्र्या, द्वेष, द्वन्द और माया बीच असन्तुष्ट जीवन व्यतीत करने वाले मनुष्य के लिए गीताका अध्ययन अति उपयोगी है।
गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुनको अपने विश्वस्वरुप दर्शन देकर कृष्ण ही परम सत्य है, अन्य सत्यकी खोज में मनुष्यको भटकने की कोई जरुरत नही है जैसा सन्देश दिया है। गीता ज्ञान, कर्म औैर भक्तिका अद्भुत संगम है। गीता मेर्ंर् इश्वरको प्राप्त करने के तीन मार्गका वर्ण्र्ााहै। पहला, ज्ञान मार्ग, जिसका केन्द्रविन्दु चिन्तन और ध्यान है, दूसरा, कर्म मार्ग जिसका मेरुदण्ड आसक्तिको त्यागकर निष्काम कर्म करने की वात है। तीसरा, भक्ति मार्ग जिसमें मनुष्य अपनेकोर् इश्वर प्रति र्समर्पण पर जोड दिया गया है। ये मार्ग अलग-अलग दिखते है परन्तु इनका मिलनविन्दु एक ही है।
गीता में मनुष्य के र्सार्थक जीवनका वैयक्तिक और सामाजिक दोनो पहलुओं की व्याख्या की गई है। व्यक्तिगत दृष्टि में हमे अपने भीतर विराजमानर् इश्वरको उजागर करना चाहिए और सामाजिक हिसाव से हमारे अगल-बगल अवस्थित प्रत्येक जीव जन्तुमें परमेश्वरका प्रतिविम्व देखना चाहिए। इसलिए गीता से हमे सन्देश प्राप्त होता है कि व्यक्ति अपने मोक्षके लिए संसार मे प्रत्येक जीव के कल्याण के लिए कर्म करना चाहिए।
अन्त में इस पुस्तकमें कर्म के बारे में कहा गया है कि कर्म मनुष्यका अपना ही होता है इसमें भगवान भी हस्तक्षेप नही करते। इसलिए गीता के मार्गमे जीवन व्यतीत करनेका मतलव अपने को कर्मशील वना के भगवान् के ध्यान और भक्ति में लीन हो जाना चाहिए। संसारको उपयोग करते हुए श्री कृष्ण से प्रेम करे इससे ही श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त होना सुनिश्चित है। -हरे कृष्ण
-सह-प्राध्यापक, त्रिवि -कर्ीर्तिपुर)

डा. विनयकुमार कुशियैत

Enhanced by Zemanta
loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz