नए आईजीपी पर क्यों मचा घमासान -एमजे गस्त

नेपाल पुलिस मुख्यालय में एक ओर जहाँ रवीन्द्र प्रताप शाह के आईजीपी के रूप में अपने कार्यकाल का आखिरी दिन विदाई समारोह किया जा रहा था, वही दूसरी ओर सिंहदरबार में नए आईजीपी की नियुक्ति को लेकर माथापच्ची जारी थी। रवीन्द्र प्रताप शाह के बाद अगला आईजीपी कौन होगा, इसको लेकर अखबारों से लेकर टीवी न्यूज चैनलों और राजनीतिक दल से लेकर पुलिस संगठन में इस कदर चर्चा का विषय बना था कि उस दिन सबसे बडÞी खबर यही बनने वाली थी। हो भी क्यों नहीं, नेपाल पुलिस के मुखिया को लेकर प्रधानमन्त्री डा. बाबूराम भट्टर्राई और उपप्रधान तथा गृहमन्त्री विजय कुमार गच्छदार के बीच जिस तरीके से तीव्र मतभेद और इस मतभेद से गठबन्धन पर ही असर पडÞने लगे तो इसकी चर्चा होना स्वाभाविक ही था।
नए आईजीपी को लेकर वरिष्ठता के आधार पर कुवेर सिंह राना निर्विवाद और निर्विकल्प थे लेकिन आखिर विजय कुमार गच्छदार के द्वारा भीष्म प्रर्साई के लिए इतना अडÞना बिना वजह तो नहीं हो सकता है। इसके पीछे लोगों के अपने-अपने तर्क है। लेकिन वास्तविकता भरा तर्क कुछ और भी हो सकता है। मधेश विरोधी मीडिया ने इसे आर्थिक लेनदेन से जोडÞकर देखा। नेपाल में कुछ तथाकथित बडेÞ मीडिया घराना जो खुद ही पेड न्यूज के आधार पर चलती है, वह इस सरकार, इस गठबन्धन और खासकर मधेशी मोर्चा के खिलाफ ही है, इसलिए स्वाभाविक था कि गच्छदार द्वारा भीष्म प्रर्साई के नाम पर अडÞा रहना यहाँ कि कुछ तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया को रास नहीं आया और उन्होंने इसके पीछे आर्थिक लेनदेन की बात को जोडÞ दिया। लेकिन इन मीडिया को सर्वोच्च अदालत का आदेश और जनकपुर में ६ निर्दोष छात्रों की हत्या का मामला नहीं सूझा। दरअसल माओवादी जिस कुवेर सिंह राना का पक्ष ले रही थी, उनकी कार्यक्षमता और कुशलता तथा पुलिस संगठन के प्रति उनकी दूरदर्शिता कोई भी इंकार नहीं कर सकता है। राना नेपाल पुलिस के उन गिने चुने अफसरों में से एक है, जिन पर अभी तक किसी भी प्रकार की कोई भी आर्थिक अनियमितता का अराोप नहीं लगा है। उनकी व्यावसायिकता को कोई नकार नहीं सकता है। लेकिन माओवादी जनयुद्ध के समय कुवेर सिंह राना की भूमिका को भी नहीं भुलाया जा सकता है। अपने आला अधिकारियों और शाही सरकार को खुश रखने के लिए जिस तरीके से कुवेर सिंह राना ने जनकपुर के ६ निर्दोष छात्रों को माओवादी के नाम पर पहले गायब करवाया और बाद में उनका सिर्फनरकंकाल मिला। उस भयानक त्रासदी को अभी तक भुलाया नहीं जा सका है। राना की बर्दी पर लगे इस दाग ने उनके सभी अच्छे कामों पर कालिख पोत दी है। कुवेर सिंह राना पर अभी तक उन ६ निर्दोष छात्रों की हत्या का मामला चल ही रहा है।  इस सम्बन्ध में सर्वोच्च अदालत में दायर की गई एक याचिका पर अदालत ने सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया था कि मानवाधिकार के गम्भीर उल्लंघन मामले में वांछित किसी भी सरकारी अधिकारी को उच्च ओहदा पर सरकार नहीं बिठाए। बावजूद इसके माओवादी नेतृत्व सरकार ने कुवेर सिंह राना को नयाँ पुलिस प्रमुख बना ही डाला। जनकपुर हत्याकाण्ड को लेकर मधेश के मानवाधिकार संगठनों ने गृहमन्त्री पर दबाव बनाया था कि जिस पुलिस अधिकारी के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज हो, जिसकी जाँच के लिए सर्वोच्च अदालत ने स्वयं ही आदेश दिया हो, अमेरिका, युरोप जैसे देश जिस पुलिस अधिकारी को इस वजह से वीजा भी न देता हो, ऐसे अधिकारी को पुलिस प्रमुख नहीं बनाया जाए। और यही वजह है कि गच्छदार कुवेर सिंह राना के बजाय किसी और को पुलिस प्रमुख बनाने के पक्ष में थे। लेकिन माओवादी के कुछ नेताओं के द्वारा किए गए जवरदस्त लाँविंग और माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड के द्वारा प्रधानमन्त्री पर दबाव दिए जाने के बाद भट्टर्राई भी मजबूर हो गए और राना के पक्ष में फैसला गया। सवाल यह तो उठा कि गच्छदार ने भीष्म प्रर्साई के पक्ष में निर्ण्र्ााकराने के लिए आर्थिक लेनदेन की है लेकिन किसी ने यह सवाल क्यों नहीं उठाया कि कुवेर सिंह राना के पक्ष में जी-जान से लगे वर्षान पुन, नन्दकिशोर पुन और माओवादी अध्यक्ष के बीच क्या डिल हर्ुइ – किसी ने यह सवाल क्यों नहीं उठाया कि माओवादी के नाम पर हत्या करने का दोषी पुलिस अधिकारी को इतना बढÞावा क्यों – लेकिन अफसोस की बात यह है कि मामला चूँकि मधेश के जिलों का है और मरने वाले लोग मधेशी थे इसलिए न तो सरकार और न ही अन्य मानवाअधिकार संगठन को ही कोई मतलब है।
पुलिस प्रमुख बनाने को लेकर माओवादी और मधेशी मोर्चा में कडवाहट इस कदर बढÞ गई कि एक महीने तक यह मामला अटका रहा। अन्तिम दिन भी जब सिंहदरबार में मन्त्रिपरिषद की बैठक शुरु होने से पहले सहमति नहीं बनी तो माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड को भी बुलाया गया। उसके बाद भी सहमति नहीं बनी। बात इतनी बिगडÞी कि एक बार तो गच्छदार ने सरकार छोडÞने की धमकी तक दे डÞाली। गच्छदार का तर्क था कि उनके मन्त्रालय में माओवादी नेताओं का इतना हस्तक्षेप गठबन्धन के लिए ठीक नहीं है। लेकिन माओवादी नेताओं ने उनकी एक भी नहीं सुनी। उधर मधेशी मोर्चा में भी मतभेद पैदा हो गया। तमलोपा उपाध्यक्ष हृदयेश त्रिपाठी तो शुरु से ही गच्छदार का विरोध करते रहे। अन्तिम दिन फोरम गणतान्त्रिक के अध्यक्ष राजकिशोर यादव भी प्रधानमन्त्री के पक्ष में चले गए। मोर्चा में फूट का फायदा उठाते हुए माओवादी और कडÞे रूप में प्रस्तुत हुए और प्रधानमन्त्री ने गृहमन्त्री को स्पष्ट निर्देश दिया कि या तो वो कुवेर सिंह राना के नाम का प्रस्ताव लेकर आएं या फिर अपना इस्तीफा लेकर आएं। यह सुनकर गच्छदार काफी चिंतित हो गए। उधर प्रधानमन्त्री ने मुख्य सचिव को भी निर्देश दिया कि वो गृहसचिव से फाइल माँगवाएं या फिर खुद लेकर आएं। प्रधानमन्त्री के इस कडेÞ स्वरूप और मधेशी मोर्चा के ही नेताओं द्वारा साथ नहीं दिए जाने के बाद गच्छदार को भी मानने पर मजबूर होना पडÞा। और कुवेर सिंह राना को नयाँ पुलिस प्रमुख आयुक्त बना दिया गया।
माओवादी के बल पर पुलिस प्रमुख बने कुवेर सिंह राना के लिए १३ महीने का कार्यकाल आसान नहीं रहने वाला है। पहली चुनौती तो गृहमन्त्री के साथ अपने रिश्तों को सुधारने की है। इसी तरह पुलिस प्रमुख की रेस में रहे अपने समकक्षी नवराज ढकाल और भीष्म प्रर्साई के साथ मिलकर विश्वास का वातावरण बनाना भी होगा। इसके अलावा पुलिस संगठन में व्यापक सुधार लाना, पुलिस में व्यावसायिकता को बढाना, आर्थिक अनियमिता को कम करना जैसी चुनौतियां हंै हीं। माओवादी के जोडÞ पर पुलिस प्रमुख बने आईजीपी राना के लिए उन्हें खुश रखना और उनके दबाव को भी झेलना ही होगा।

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