नए प्रधानमंत्री ! यह ताज काँटों से भरा ताज है : श्वेता दीप्ति

kp-oli-591x330श्वेता दीप्ति , काठमांडू , १४ अक्टूबर | नया नेपाल, नया संविधान और अब नए पद पर पुराने चेहरे । इन चेहरों की सोच कितनी नई होगी अब यह देखना है । सत्ता की बागडोर सम्भालना बड़ी बात नहीं होती, किन्तु जिम्मेदारियों को निभाना और वह भी निष्पक्ष और ईमानदारी से निभाना बड़ी बात होती है । तीन चेहरे जो सामने हैं, उन चेहरों से कई पक्ष असंतुष्ट हैं । नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री के.पी.ओली देश के एक पक्ष के लिए हमेशा विरोधी और विवादित वक्तव्य के जरिए नापसन्द किए जाते रहे हैं, वहीं उप प्रधानमंत्री विजय गच्छदार अपने ही क्षेत्र की जनता में मौकापरस्त नेता के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होंने कभी मधेश हित की बात नहीं सोची और उप प्रधानमंत्री तथा परराष्ट्रमंत्री कमल थापा तो जनआन्दोलन दबाने में माहिर रहे हैं । तात्पर्य यह कि इन तीनों चेहरों में अगर देश के एक असंतुष्ट पक्ष अर्थात मधेश के लिए देखा जाय तो कोई भी चेहरा हितैषी नजर नहीं आ रहा है । दो महीने से चल रहे मधेश आन्दोलन में अब इनकी क्या भूमिका होगी नजरें इस पर टिकी हुई हैं । ओली प्रधानमंत्री बनना चाहते थे और पिछले तीन चार महीनों से उनकी कोशिश सिर्फ इसी जोड़ तोड़ में लगी हुई थी । उनका सारा ध्यान सिर्फ इस एक मुद्दे पर टिका हुआ था । अंततः उन्हें वो मिल गया जो चाहिए था । किन्तु यह ताज काँटों से भरा ताज है । सामने अनगिनत चुनौतियाँ हैं । देखना यह है कि क्या अब भी ये जुमलों की राजनीति करेंगे या फिर जिम्मेदार अभिभावक का निर्वाह ? क्योंकि ओली की जीत को एक समुदाय विशेष की ओर से सम्पूर्ण राष्ट्रवादी नेपाली की भावना की जीत मान रहे हैं और ये वही समुदाय हैं जो मधेश को हमेशा से राष्ट्रविरोधी मानते आ रहे हैं । यहाँ की राष्ट्रवादिता की परिभाषा अगर कुछ है तो वह है भारत का विरोध । तो क्या हमारे नए प्रधानमंत्री जनता विशेष की इस राष्ट्रवादी सोच को निरन्तरता देते हुए देश को आगे ले जाएँगे या फिर एक नई और खुली मानसिकता के साथ देश को नया नेपाल बनाएँगे ?

आज के परिप्रेक्ष्य में अगर सबसे बड़ी जरुरत कुछ है, तो वह है मधेश की जनkpoli_pm_nepalता को संतुष्ट करना और उन्हें उनके अधिकारों को देना । संवाद और सहमति अगर यह ईमानदारी से की जाय तो किसी भी मसले का समाधान निकल सकता है । पर इसकी सम्भावना न्यून नजर आ रही है । मधेशी, जनजाति, महिला और दलित के अधिकारों की कटौती ओली के द्वारा होती रही है, ऐसे में आज के समय में अचानक वो अपनी छवि को कितना बदल सकते हैं यह देखना है । प्रचण्ड ने किंगमेकर का काम किया और ओली प्रधान मंत्री बन गए, किन्तु जिस राष्ट्रवाद का परचम लहरा कर सत्ता तक ओली पहुँचे हैं, क्या उसी परचम के तले देश को आगे ले जाने का दमखम उनमें है ? क्योंकि देश पूरी तरह से लड़खड़ाया हुआ है । इस परिस्थिति में उनकी नीति किस रूप में सामने आएगी यह भी देखना है । भारत नहीं, तो चीन, बंगलादेश और पाकिस्तान का राग भी अलापा जा चुका है । जिस जोर शोर से नारे लगाए गए और चीन से सहायता की अपेक्षा की गई वो सभी धाराशायी हो चुके हैं । आम जनता परेशानियों से जूझ रही है ऐसे में नई सत्ता कौन सी त्वरित निर्णय लेती है और कब लेती है यह देखना है या फिर मंत्री पद के बँटवारे में उलझ कर जनता को असमंजस में ही रखती है । मधेश की जनता दो महीनों से सड़क पर है और काठमान्डू दो सप्ताह से विचलित है । इसका समाधान नई सरकार को जल्द से जल्द ढूँढना होगा । अब बहुत हुआ । उन्हें जो लेना था वो ले चुके अब तो आम जनता की ओर ध्यान दें । शासक, सत्ता और पैसा इसका खेल हो चुका है, अब तो जनता, जरुरत और जिम्मेदारी पर ध्यान देने की आवश्यकता है ।

आत्मनिर्भरता किसी भी देश के लिए आवश्यक होती है, वही हमारे अन्दर स्वाभिमान भी पैदा करता है और आत्मविश्वास भी, किन्तु भूख, बीमारी और जरुरतें इससे जीतकर ही ये भावनाएँ भी काम करती हैं । आज देश ने जो देखा है उससे नेता और जनता दोनों को सीख लेने की आवश्यकता है कि माँग कर नहीं बनाकर जियो । साधन और संसाधन की कमी नहीं है, उसका प्रयोग करना सीखो । किसी को गाली देना आसान होता है किन्तु सक्षम बनना मुश्किल । हमें खुद में आत्मनिर्भर बनना चाहिए और यह आज की युवा पीढी और हमारे नेताओं की सही सोच ही कर सकती है । उग्रता किसी भी समस्या का समाधान नहीं होती, यह हमारे रिश्ते को, हमारी सोच को ही दिग्भ्रमित करता है । इसलिए अपनी सोच को एक नई दिशा दें और नए प्रधानमंत्री की दृष्टि सम्पूर्ण देश और उनके कल्याण की ओर हो यही अपेक्षा है ।

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