नजरअंदाज न करें पीठ दर्द÷कमर दर्द को

डा. अजयकुमार यादव
पीठ दर्द प्राय पीठ के निचले हिस्से में होता है या कमर में होता है । इसलिए इसको आम भाषा में कमर दर्द कहते हैं । यह केवल एक लक्षण है, जो साधारण रोग या कैंसर जैसे रोगों का संकेत हो सकता है । अतः इसके प्रति जागरुकता आवश्यक है, क्योंकि सही समय पर इसका कारण अगर पता चल जाए तो अन्दरुनी रोग का उपचार या निदान हो सकता है । कमर दर्द प्राय मांसपेशी, नसाें, मेरुदण्ड के रोगों से सम्बन्धित है । सम्भवतः व्यस्कों में पाई जानेवाली सबसे आम समस्या है, जिसको लेकर अस्पताल तक पहुँचना पड़ता है । किन्तु सारे कमर दर्द गम्भीर किस्म के नहीं होते । याद रखने की बात यह है कि जब कमरदर्द या पीठ का दर्द तकलीफदेह बन जाए तो लम्बे समय तक रहे (३ हप्तों से अधिक) और जीवनचर्या या काम प्रभावित होने लगे तो इसको साधारण रूप से नहीं लेना चाहिए । और मौजूद डाक्टर की सलाह जरुर लेनी चाहिए । कुछ अध्ययन यह बताता है कि ६० से ९० प्रतिशत व्यस्क लोगों में कभी न कभी उनके जीवनकाल में कमर दर्द रहता है, जिसकी वजह डाक्टरी सलाह लेना पड़ती है । अमेरिका जैसे देशों में वार्षिक ९० मिलियन डलर इसके कारण स्वास्थ्य खर्च होता है । हमारे देश और समाज में भी यह करीब करीब सभी रूप में मौजूद है, लेकिन इसके प्रति सजगता और स्वास्थ्य जागरुकता मौजुद नहीं और यही कारण है कि रोग बहुत बढ़ जाने के बाद डाक्टरी सहायता ली जाती है ।
कमर दर्द मानव इतिहास में कम से कम कास्य युग से मौजुद है । इसका पौराणिक प्रमाण १५०० इसापूर्व भ्धष्ल कmष्तज उबउगचगक के रचनाओं और उपचार विधियों से पता चलता है । ज्ष्उउयअचबतभक (४६०–३७० इसापूर्व) ने पहली बार सियाटिक पेन और कमर दर्द जैसे शब्दों का प्रयोग किया है । न्बभिल (१२९ ई.स.–२१६ ई.स) ने ज्ष्उउयअचबतभक के खोजों को और भी बारीकी से अध्ययन किया है जो कि आगे चलकर ब्लबतयmथ (शरीर रचना विज्ञान) का बुनियाद बना ।
मध्य युग में–गांवघर के ँबपि ःभमष्अष्लभ एचबअतष्यलभचकस कमर दर्द या ीयध द्यबअप एबष्ल को शैतानी आत्माओं के कारण होता है, समझते थे और उस प्रकार का इलाज करते थे । २०वीं सदी के प्रारम्भ में आकर चिकित्सक यह मानने लगे कि कमर दर्द नसों के क्षतिग्रस्त होने के कारण या सूजन होने के कारण होता है । इसका प्रमाण उस वक्त के मेडिकल लेख में दर्ज है । १९२० के दशक में एक अमेरिकन न्यूरोसर्जन ज्बचखथ ध्ष्ििष्बm ऋगकजष्लन ने पहली बार शल्यचिकित्सा को भी ीयध द्यबअप एबष्ल के इलाज के लिए स्वीकार किया । १९२०–१९३० तक यह माना जाता था कि ीयध द्यबअप एबष्ल मनोवैज्ञानिक समस्याएँ जैसी की औरतों में होनेवाली ज्थकतभचष्ब, ल्भचखभ ध्भबगलभक (कमजोर नसें) तथा ल्भचखयगक क्थकतझ के गडबड़ी के कारण से होता है ।
ीयध द्यबअप एबष्ल÷कमर दर्द क्यों होता है ?
ीयध द्यबअप एबष्ल के कई सारे कारण हंै, उनमें से कुछ मुख्य कारणों की चर्चा हम यहाँ सरल भाषा में आम लोगों के लिए करेंगे । कुछ प्रमुख कारण हैं–
१. गलत आसन
गलत तरीके से बैठने, सोने या काम करने से हमारे रीढ पर जोर पड़ता है और कमर तथा पीठ के माँसपेशियों में तनाव पड़ता है, जिसकी वजह से कमर दर्द या ीयध द्यबअप एबष्ल होता है । इसको हम ःभअजबलष्अब िकारण के रूप में लेते हैं तथा इस समस्या से अधिकांश लोग पीड़ित रहते हंै । आसन ठीक रखने से और व्यायाम से यह जल्दी ठीक भी होता है ।
२. ट्रमा या चोट पटक
मोटर वाहन दुर्घटनाएं और उँचाई से गिरना दो प्रमुख कारण है ट्रमा का हमारे जैसे देशों में । दुर्घटनाओं से हमारे रीढ की हड्डी और इसके इर्दगिर्द के माँसपेशी में साधारण से साधारण चोट या गम्भीर चोट लग सकते है, जिससे विभिन्न प्रकार के लक्षण दिखाई देते हैंं– उनमें से एक कमर दर्द भी हो सकता है । इसलिए चोट लगने के बाद या गिरने के बाद अगर कमर दर्द या किसी प्रकार का ीयध द्यबअप एबष्ल हो तो एक बार डाक्टर को जरूर दिखाना चाहिए ।
३. मोटापा तथा स्थूलता
आधुनिक जीवन पद्धति और व्यायाम की कमी की वजह से तथा इखभच भ्बतष्लन से मोटापा बढ़ता है और मांसपेशियों में स्थूलता आती है । इसमें बढ़ते वजन से और स्थूल मांसपेशियों से रीढ पर जोर पड़ने के साथ–साथ ःगकअभि तयलभ में खराबी आती है, जिससे कमर दर्द हो सकता है ।
४. वृद्धावस्था
आमतौर पर जैसे–जैसे उम्र बढ़ती जाती है– हमारे शरीर के सभी प्रणालियों पर उसका असर पड़ता है । रीढ़ की हड्डी, जो विभिन्न छोटे–छोटे हड्डियो से बनता है, उसपर भी बढ़ती उम्र का प्रभाव पड़ता है । बढ़ती उम्र के वजह से ख्भचतभदचब िदयलभक में अतिरिक्त द्ययलभ त्भचmबजयल ९क्उगचतयचmबतष्यल० होने लगती है, उसी तरह की व्यष्लतक (जोड़ो) का बदलाव होता है और वहां ब्चतजचष्तष्अ ऋजबलनभक (रीढ की गठिया) हो सकते है या फिर अन्य प्रकार के व्यलितक ऋजबलनभक हो सकते है– और इन सभी बदलाव से मेरुदण्ड या इससे निकलने वाली नसों पर दबाव पड़ सकता है, जिससे पीठ दर्द, कमर दर्द हो सकता है । प्रायः इस तरह की बीमारियों को आधुनिक शल्यक्रिया के द्वारा उपचार किया जाता है ।
औरतों में प्रायः ४५–५० सालों के बाद महिनावारी रुक जाने से शरीर में विभिन्न प्रकार के बदलाव आते हैं– उनमें से एक है– रजोनिवृत्ति अस्टियोपोरोसिस, जिसमें हड्डियों में ऋबअिष्गm और अन्य पदार्थों की कमी हो जाती है– और हड्डिया कमजोर होकर, साधारण चोट से भी टूट सकती है, जो कमर दर्द का कारण बन सकता है ।
५. डिस्क हर्नियशन÷डिस्क प्रौलाप्सः
प्रकृति ने हमारे रीढ की हड्डियों के बीच एक मुलायम और रबड़ जैसा ढांचा दिया है, जिस को हम ख्भचतभदचब िम्ष्कअ कहते हैं । यह डिस्क क्ष्लतभचखभचतभदचब िम्ष्कअक रीढ की हड्डियो को आपस में रगड़ने नहीं देता है और एक क्जयअग बदकयचदभच (आघात को निर्बल करनेवाला यन्त्र) के रूप में काम करता है । लेकिन कभी कभी विभिन्न कारणों से जब म्ष्कअ पर एचभककगचभ बढता है, या फिर वृद्धावस्था में इसके कमजोर होने के कारण, क्ष्लतभचखभचतभदचब िमष्कअक में उभर जाता है, जिस को हम म्ष्कअ एचयबिउकभ कहते हैं, या कभी कमी म्ष्कअ फूट जाता है और इसके अन्दर का पदार्थ बाहर निकल जाता है, जिसे म्ष्कअ ज्भचलष्बतष्यल कहते हैं ।
म्ष्कअ एचयबिउकभ या म्ष्कअ ज्भचलष्बतष्यल की वजह से मेरुदण्ड ९क्उष्लब िऋयचम० या इससे निकलनेवाली नसों पर दबाव पड़ता है, जिससे पीठ का दर्द, कमर का दर्द, गर्दन का दर्द ९ऋभचखष्अब िऋबकभक में) हो सकता है कि क्भखभचभ ऋयmउचभककष्यल या क्उष्लब िऋयचम या क्उष्लब िल्भचखभ कि वजह से एबचबथिकष्क (लकवा) भी हो जाता है । क्भखभचभ ऋगचभक वा लकवा के केस में तुरन्त क्गचनभचथ के द्वारा उपचार किया जाता है ।
कभी कभी जब इनकी वजह से नसों पर दबाव पड़ने से नितम्ब और उसके नीचे जांघों के पिछले हिस्से में भी दर्द महसूस होता, जो पैरों में भी महसूस किया जा सकता है– उसको हम आम भाषा में सियाटिका भी कहते हैं ।
अन्य कारण
– क्अयष्यिकष्क (रीढ की हड्डी का टेढ़ापन), प्थउयकष्क (कुबड़ापन) के कारण भी ीयध द्यबअप एबष्ल या कमर दर्द हो सकता है ।
– औरतों में प्रजनन. अंग सम्बन्धी समस्याओं को कारण जैसा कि भ्लमयmभतचष्यकष्क, इखबचष्बल ऋथकतक, इखचबष्ल ऋबलअभचक, ख्भतचष्लभ ँष्दचयष्मक, के कारण भी ीयध द्यबअप एबष्ल हो सकता है ।
– पित्त की थैली सम्बन्धी रोग ९न्बग द्यगिममभच म्ष्कभबकभ०, गुर्दा की पत्थरी, गुर्दा का संक्रमण तथा ब्यचतष्अ ब्लभगचथकm (महाधमनी विस्तार) में भी पीठ का दर्द या कमर दर्द हो सकता है ।
– विभिन्न प्रकार के कैंसर जब बितभ क्तबनभक मैं हड्डियों में फैल जाते है, उसमें भी कमर दर्द हो सकता है । प्रायः कैंसर रीढ की हड्डियों में फैल जाते है ।
– विभिन्न ग्रन्थियों के रोग जैसा मधुमेह में भी पीठ दर्द महसूस हो सकता है ।
– मनोवैज्ञानिक समस्याओं जैसा कि तनाव, अवसाद, फाइब्रोमाइलजीया के कारण भी कमर दर्द शारीरिक दर्द, हड्डियो का दर्द लेकर प्रायः रोगी डाक्टरों के पास आते हैं ।

रोकथाम और उपचार

ऊपर दिए गए कारणों के अलावा भी बहुत सारे और भी कारण हो सकते है कमर दर्द का, जिस को डाक्टर द्वारा सावधानीपूर्वक एक एक की जाँच पड़ताल करके रोगियों का उपचार किया जाता है । जो कारण पता चलता है, उसका उपचार किया जाता है । प्रायः रोगियों में मेरुदण्ड और नसों का रोग (जो प्रमुख ५ कारण में बताया गया है) के कारण होता है तथा इन रोगों को मोटामोटी २ तरीकों से उपचार किया जाता है–
१. औषधीय उपचार
ज्यादातर साधारण कमर दर्द, जो गलत आसन या साधारण चोट लगने से होता है, उसको मेडीसिन से पहले ठीक किया जाता है । विभिन्न प्रकार की दवाइयाँ उपलब्ध हंै, जिसका प्रमुख काम है दर्द को कम करना । दर्द निवारक दवाईयां गोलियों के रूप में, कैप्सुल के रूप में दिया जाता है तथा उससे अगर काम न बने या बीमार न खा पाए किसी कारण से तो इंजेक्सन के द्वारा भी दर्द निवारक या सूजन कम करने वाली दवाइयाँ दी जाती हैं । यह रोग की गम्भीरता पर भी निर्भर करता है । कभी कभी इन्जेक्सन को नसों और जोड़ो में भी दिया जाता है, दर्द को कम करने के लिए ।
इसके अलावा एजथअष्अबि त्जभचबउथ के विभिन्न तरीकों द्वारा भी इलाज किया जाता है, जिन में प्रमुख है– ज्भबत त्जभचबउथ, ीगmदबच द्यभति, विभिन्न प्रकार के व्यायम ९भ्हभचअकिभ त्जभचबउथ०, त्चबलकअगतबलभगकभ ल्भचखभ क्तष्mगअबतष्यल ९त्भ्ल्क्०, एभचष्उजभचब िल्भचखभ क्तष्mगबितष्यल ।
इसके अलावा योगा का प्रयोग किया जाता है । कमर दर्द उपचार में तथा इस पर काफी शोधकार्य भी चल रहे है, जिसमें बहुत सारे अध्ययन सकारात्मक नतीजा दिखा रहा है । ध्भकतभचल ऋयगलतचष्भक० में भी इसको स्वीकार किया जा चुका है ।
उपर दिए गए विभिन्न तरीकों से दर्द का उपचार किया जा सकता है । जिसको ऋयगििभअतष्खभथि ल्यल(यउभचबतष्खभ ःभतजबमक या त्चभबतभलत कहते हैं ।
कुछ मरीजों में दवा से ब्ििभचनथ होती है तथा कुछ मरीजों को लिभर त्बगिचभ, प्ष्मलभथ त्बगिचभ, पेट का अल्सर होता है– ऐसे मरीजों को दर्द निवारक दवाइयां नहीं देनी चाहिए, और अगर देने की आवश्यकता पड़े तो बिना डाक्टर के पुर्जे के नहीं देना चाहिए । ऐसे विशिष्ठ श्रेणी में मरीजों को हम एजथकष्अब ित्जभचबउथ के विभिन्न तरीकों से उपचार करते हैं ।
२) शल्यक्रिया
जो मरीज औषधि से ठीक नहीं होते या गम्भीर प्रकार के लक्षण हैं– जैसे कि लकवा, या जिन मरीजों में औषधि हानिकारक है या लाभदायक नहीं है तो ऐसे मरीजों को ऑपरेशन के द्वारा ठीक किया जाता है ।
म्ष्अ एचयबिउकभ, म्ष्कअ ज्भचलष्बतष्यल, द्यबलथ क्उगच ँयचmबतष्यल, मेरुदण्ड को जोड़ो की खराबी या चोट लगने से रीढ़ की हड्डी जब टूट जाती है और मरीज का हाथ पाँव चलने में मुश्किल होने लगता है, दर्द अत्यधिक बढ़ जाता है– तो इन अवस्थाओं में औपरेटिक उपचार किया जाता है ।
औपरेटिभ उपचार विशेषज्ञ के द्वारा ही केवल करना चाहिए । मेरुदण्ड के विशेषज्ञ को हम प्रायः क्उष्लभ कगचनभयलक या क्उष्लभ क्उभअष्बष्कितक कहते हैं । यह खुद में एक क्गद(क्उभअष्बतिथ है और नेपाल में यह प्रारम्भिक चरण में है । विदेशों में खासकर विकसित देशों में यह सेवा आसान से उपलब्ध है । इसका अध्ययन विशेषज्ञता लेने के बाद ३–५ सालों तक किया जाता है ।
क्उष्लभ क्उभअष्बकष्कत से ही केवल उपचार करने का कारण यह है कि वह उसका भ्हउभचतष्कभ ब्चभब या ध्यचप होता है और विभिन्न अध्ययन ने दिखाया है कि जो इउभचबतष्यलक क्उभअष्बष्कितक के द्वारा किए जाते हैं । वह अधिक सफल होता है ९ल्यल(क्उभअष्बष्कितक के मुकाबले । चुंकि यह खुद में एक जोखिमपूर्ण इउभचबतष्यल होने के कारण विशेषज्ञ के द्वारा मात्र ही उपचार करना चाहिए, जिससे एयकत(इउभचबतष्खभ ऋयmउष्अिबतष्यलक (शल्यक्रिया के पश्चात की जटिलताएँ) बहुत कम होती है और अगर हो तो उसका व्यवस्थापन विशेषज्ञ अच्छी तरह कर सकता है । केवल विशेषज्ञ से उपचार कराने का कारण यह भी है कि वह क्उभअष्ब िऋभललभक जहाँ से रेफर करना न पड़े, वहाँ पर कार्यरत होता है । ऐसी जगहों को हम ऋभलतचभक ायच क्उभअष्ब िक्गचनभचथ भी कहते हैं ।
ऑपरेशन के दौरान मरीज को न्भलभचब िब्लभकतजभकष्ब दिया जाता है, जो खुद में एक विशेषज्ञता है । चेतनाशून्य करने के बाद मेरुदण्ड शल्यचिकित्सक रीढ की हड्डी खोलते है और जो प्रभावित हिस्सा है और जो रोग का कारण हैं, उसको ठीक करते हैं । प्रायः मरीज को पेट के बल लिटाकर पीछे से रीढ को खोलते हैं । (कुछ ऋबकभक में अलग तरीके भी हो सकते हैं) । आप‘रेशन से पहले विभिन्न प्रकार के जाँच किए जाते हैंं– जैसे कि रक्त परीक्षण, सिटी स्क्यान, कमर या पीठ का साधारण एक्स–रे, एम.आर.आई., माएलोग्राफी इत्यादि । जो भी जाँच कराना हो, डाक्टर को उसके बारे में मरीजों को विस्तार से बताना चाहिए, ऑपरेशन से पहले हर बात मरीज और उसके परिवार वालों से करनी चाहिए, औपरेशन के पश्चात होने वाली जटिलताओं के बारे में जानकारी देनी चाहिए, आर्थिक सहयोग तथा अन्य सेवा अगर अस्पताल में या जिला में मौजुद है तो उसके बारे में सम्बन्धित निकाय के पास भेजना चाहिए । रोग और उपचार के बारे में जानना मरीज का अधिकार है और सम्बन्धित डाक्टर को मरीज को उसके बारे और उपचार से सम्बन्धित हर बात बताना, डाक्टर का कर्तव्य है ।

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