नया खून आजादी मांग रहाहै,बदहाली से जूझता देश बरबादी की कगार पर : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमाण्डू, 6 जनवरी 2016 ।
सरकार की असक्षमता और बेरुखी की वजह से शांतिपूर्ण मधेश आन्दोलन का रुख बदलता जा रहा है । आन्दोलन को कमजोर और बदनाम करने की कोशिश तो सत्ता पक्ष करती आई है किन्तु समाधान की ओर अबतक गम्भीर नहीं हो पाई है । यही वजह है कि मधेशी युवाओं का आक्रोश बढ़ता जा रहा है । अधिकार की माँग की लड़ाई का स्वरूप बदलता जा रहा है ।
FB_IMG_1452009553256करीब पाँच महीनों से चल रहे आन्दोलन में मधेश की जनता ने अपनी अद्भुत धैर्यशक्ति का परिचय दिया है । आज भी उनके सब्र का पैमाना छलका नहीं है, जबकि सत्ता उनके टूटने का इंतजार कर रही है । लेकिन सत्ता न जाने क्यों यह नहीं समझ रही कि आन्दालन का स्वरूप अगर बदला तो यह भयावह बन सकता है । पिछले दिनों आन्दोलन के दौरान सभाओं में  घुसपैठियों का घुसना और तोड़फोड़ करना कुछ अच्छे आसार नहीं दे रहे हैं । वार्ता के नाम पर आजतक सरकार गम्भीर नहीं हो पाई । जब–जब लगा कि कुछ सकारात्मक होने वाला है तब–तब पुलिस के उग्र रूप ने दमन चक्र चलाकर संयमित मधेश को उकसाने का काम ही किया है । जिसका सबसे ताजा उदाहरण है, सद्भावना अध्यक्ष राजेन्द्र महतो के ऊपर लाठी चार्ज । शांत मधेश एक बार पुनः सड़कों पर लाखों की संख्या में उतर कर अपना विरोध जता रही है, किन्तु सरकार की ओर से अब तक कोई  वक्तव्य जारी नहीं हुआ है । सत्ता पक्ष की ओर से कोई एक ऐसा कदम नहीं परिचालित हो रहा जिससे यह लगे कि वह समाधान करना चाह रही है । बस उनकी टालमटोल की ही नीति सामने आ रही है । फिलहाल कार्यदल बनाने का प्रस्ताव सत्ता पक्ष की ओर से आया है । किन्तु सबसे अधिक संवेदनशील मुद्दा सीमांकन के विषय में ही सत्तापक्ष की नीति स्पष्ट नहीं है । जबकि यही एक महत्वपूर्ण विषय है जिसमें मधेश सम्बोधन चाह रहा है और अगर मधेशी मोर्चा इस विषय को छोड़कर कोई समझौता करती है तो वह मधेश की जनता को स्वीकार्य नहीं होगा यह धारणा मधेश स्पष्ट कर चुका है । जब भी वार्ता बुलाई गई तो तीनदल की बात नाका अवरोध हटाने पर ही टिकी रही है । जबकि मधेशी मोर्चा किसी भी हाल में सीमांकन के मसले को तत्काल हल करने पर अड़ी हुई है और उनका कहना है कि जब तक सीमांकन सम्बन्धी सुधार संविधान में नहीं होगा नाका अवरोध नहीं हटेगा ।
जैस– जैसे आन्दोलन के दिनों की गिनती बढ़ती जा रही है, वैसे–वैसे युवाओं में स्वतंत्र होने की चाह बढ़ती जा रही है ।
_7d7ad852-b2de-11e5-87b3-9157ef61c9c7नया खून आजादी मांग रहा है और डा.राउत का संगठन मजबूत होता जा रहा है जो निःसन्देह देश के लिए सही नहीं होगा । आज स्थिति ऐसी हो गई है कि डा.सी.के.राउत द्वारा संचालित स्वतंत्र मधेश गठबन्धन जगह जगह जनमत संग्रह करा रही है । उनके कुछ कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी किया गया है । उनपर राष्ट्रविरोधी गतिविधि का आरोप लगाकर मुद्दा चलाए जाने की बात है । पहले भी सरकार डा.सी.के.राउत के साथ यह सब आजमा चुकी है । आन्दोलन का फायदा लेकर भूमिगत समूह एक बार फिर सक्रिय हो रहा है । दस वर्ष के लम्बे जनयुद्ध के बाद देश ने सुख की साँस ली  थी और राहत महसूस किया था । परन्तु एक बार फिर देश उसी दिशा की ओर बढ़ रहा है । बदहाली से जूझता देश बरबादी की कगार पर खड़ा दिख रहा है । अगर शांतिपूर्ण आन्दोलन सशस्त्र का स्वरूप धारण करता है तो देश की क्या हालत होगी इसका अन्दाजा सहज ही लगाया जा सकता है । बहुत ही आसान है इस देश की इस हालत को समझना फिर हमारी सरकार इसे क्यों नहीं समझ रही है ?
मधेश आन्दोलन किसी एक नेता या पार्टी के द्वारा संचालित नहीं है, यह तो सभी जानते हैं । वर्षों से शोषित मधेश आज आर पार की लड़ाई की जुबान बोल रहा है । नेता के हाथों से यह आन्दोलन पहले ही निकल चुका है । ऐसे में शांतिपूर्ण आन्दोलन अगर हिंसात्मक होता है तो इसका खामियाजा सिर्फ मधेश नहीं सम्पूर्ण देश को भुगतना होगा । इस वस्तुस्थिति को मधेशी मोर्चा को भी समझना होगा और एक मजबूत पहल के साथ सामने आना होगा । देश के पास खोने के लिए फिलहाल कुछ नहीं बचा है सिवा बदहाली और लाचारी के । और मंत्री हैं कि वो सिर्फ अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे हुए हैं । अगर अब भी सरकार सचेत नहीं हुई तो यही कहा जा सकता है—‘का वर्षा जब कृषि सुखानी’ ।
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