नया नेतृत्व नई उम्मीदें:-

प्रो. डा. नवीन मिश्रा

पिछले अनेकों प्राधानमंत्री की असफलता के पश्चात माओवादी दल के उपाध्यक्ष डाँ. बाबुराम भट्टर्राई के प्रधामंत्री बनने से जनता में उम्मीदों की एक नई लहर जागृत हर्इ है कि शायद अब संविधान निर्माण तथा शान्ति स्थापना के कार्यो को गति प्राप्त हो क्योंकि बाबुराम भट्टर्राई एक असल अर्थ मंत्री की छवि छोडÞ चुके हैं। भट्टर्राई ने अपनी सूझ बूझ से बहुतेरे दलों का र्समर्थन हासिल किया है और नेपाली कांग्रेस का भी र्समर्थन प्राप्त करने के लिए जी तोडÞ प्रयास कर रहे हैं। इतना ही नहीं पिछले कुछ दिनों में कुछ माओवादी नेताओं के कटु बयान से भारत को जो चोट पहुँची है, उम्मीद है कि भट्टर्राई अपनी कुश कूटनीतिक व्यवहार से भारत का भी विश्वास प्राप्त करने में सफल होंगे।
हालांकि यह तय है कि भट्टर्राई की गद्दी को झुलों की सेज नहीं कांटों का ताज ही कहा जा सकता है लेकिन कठिन परिस्थितियों में ही असल व्यक्तित्व की पहचान उभर कर सामने आती है। देश और वर्तमान प्रधानमंत्री के सामने सबबे बडÞी चुनौती संविधान निर्माण है। संविधान निर्माण से सम्बन्धित बहुत सारे प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं, जैसे समुदाय का नेतृत्व कौन करेगा – इनका गठन किस प्रकार होगा तथा उन्हें कितनी शक्तियाँ प्राप्त होंगी – व्यक्ति या समूह के हारा समझौते की शतों का अनुपालन नहीं करने की स्थिति में क्या होगा – लोगों के बीच के विवाद या आम लोगों और सरकार के बीच उत्पन्न विवाद का निपटारा कौन करेगा – साथ ही समाज के कमजोर लोगों देख रेख कैसे किया जाएगा या किन सामुदायिक हितों के सम्पादन के लिए संसाधन की व्यवस्था किस प्रकार की जाएगी – नवनिर्वाचित प्रधानमन्त्री भट्टर्राई को इन सभी बातों पर ध्यान देना होगा। विश्व के विभिन्न संवैधानिक प्रणालियों का विकास भिन्न-भिन्न प्रकार से हुआ है। वास्तवम में प्रारम्भ में सामान्य राष्ट्र की मान्यता के आधार पर ही संविधान निर्माण की प्रक्रिया शुरु हर्ुइ थी। स्वाभाविक था कि ऐसे संविधानों में प्रजाति या धार्मिक अथवा भाषागत विविधिताओं पर ध्यान नहीं दिया जाता था। परिणाम स्वरुप बहुत समुदाय के लोगों का वर्चस्व ही संवैधानिक व्यवस्था में कायम रहती थी। इसी कारण ऐसे राष्ट्रो में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गई तथा इन राष्ट्रो में सामुदायिक भावना का भी समुचित विकास नहीं हो सका। लेकिन अतीत के इन अनुभवों की पृष्ठभूमि में जिन राज्यों में नवीन संविधान का निर्माण प्रारंभ हुआ, उनमें एक राष्ट्रीय राज्य के अस्तित्व के अर्न्तर्गत विभिन्न समुदायों, उनकी भाषाएँ, धर्म एवं इतिहास को भी ध्यान में रखा जा रहा है ताकि विविधता में एकता स्थापित हो सके। इससे समस्त समुदाय एक राष्ट्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को व्यक्त कर सकेगा। नेपाल में नए नेतृत्व को भी संविधान निर्माण के सर्ंभर्द में यही करना होगा। वैसे तो प्रधानमन्त्री खुद ही सुशिक्षित हैं और उनसे यह आशा की जानी चाहिए कि वे इन चीजों को संविधान में समाहित करेंगे। नेपाल के इतिहास में पहली बार एक सुशिक्षित व्यक्ति प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुआ है। वैसे विरोध या आलोचना प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया का ही एक अंग है लेकिन प्रधानमन्त्री भट्टर्राई की सफलता इसी पर निर्भर है कि वे इन चीजों से ऊपर उठ कर जनता, समाज और राष्ट्र के लिए कुछ कर दिखाएं।
यह हम सभी जानते हैं कि नेपाल में संवैधानिक विकास का इतिहास उज्ज्वल नहीं रहा है। विभिन्न समुदायों ने मिल कर एक राष्ट्र का निर्माण तो कर लिया लेकिन राष्ट्र का संचालन इन समुदायों ने अपने जीवन अपनी प्रथाओं एवं परम्पराओं के अनुरुप करना शुरु किया। ये नियम लिखित नहीं थे। ये पर्ूण्ातः परम्पराओं एवं प्रथाओं पर आधारित थे। नेतृत्व को चयन संपत्ति और परिवारों की संरचना जैसे महत्वपर्ूण्ा विषयों का निर्धारण इन्हीं के द्वारा किया जाता था। लिखित संविधान के अभाव में बहुत दिनों तक प्रशासनिक नियमों का निर्धारण राजा अथवा राणाओं के द्वारा स्वयं किया जाता था। नेपाल कभी भी उपनिवेशवादी शक्तियों के हाथों में पराधीन नहीं हुआ और वह विश्व की राजनैतिक हलचल से र्सवथा पृथक था। यही करण है कि अतीत में यहाँ संविधान तथा संवैधानिक पद्धति का विकास नहीं हुआ। नेपाल में पहली बार संवैधानिक शासन की व्यवस्था १९४८ में हर्ुइ। इस संविधान की घोषणा राणा प्रधानमन्त्री के धरा स्वेच्छा से किया गया था लेकिन इसके निर्माण में आम लोगों की सहभागिता नहीं थी। जब नेपाल में फिर से राजतंत्र की पुनर्स्थापना की गई तो महाराजा त्रिभुवन वीर विक्रम शाहदेव द्वारा १९५१ में नवीन संविधान की घोषणा मंत्रिपरिषद के परामर्श से किया गया। यह अंतरिम संविधान था जबिक संविधान सभा का विधिवत निर्माण होना बाँकी था। यह अंतरिम संविधान १९५९ तक कायम रहा, जब तत्कालीन राजा महेन्द्र ने नवीन संविधान की घोषणा की और यह नवीन संविधान १९९० तक लागू रहा जब तत्कालीन राजा वीरेन्द्र ने नवीन संविधान की घोषणा की।
१९९० का संविधान एक संवैधानिक आयोग की अनुशंसाओं पर आधारित था। इस आयोग ने आम लोगों से भी परामर्श लेकर इस संविधान का निर्माण किया था। इस संविधान धारा जनता की संप्रभुता को नेपाल में पहली बार स्वीकृति प्रदान की गई थी। जनसंप्रभुता लोगों ने जनआन्दोलन प्रथम से प्राप्त किया था। इसी संविधान द्वारा वास्तव में देश में बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली की शुरुवात हर्ुइ लेकिन अब भी राजा के हाथों में कुछ वास्तविक और शक्तिशाली शक्तियाँ विद्यमान थी। इन्हीं शक्तियों का दुरुपयोग कर तत्कालीन राजा ज्ञानेन्द्र ने २००५ में फिर से राजातंत्र की स्थापना करने का प्रयास किया। लेकिन जनआन्दोलन द्वितीय के कारण ज्ञानेन्द्र को भी जन संप्रभुता के सिद्धान्तों को स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया। नेपाली जनता की अब आकांक्षा है कि जन संप्रभुता की अभिव्यक्ति संविधान सभा द्वारा हो। इस संविधान सभा से यह भी आशा की जाती है कि जन आन्दोलन द्वितीय के सुधार प्रस्तावों के अनुरुप ही संविधान का निर्माण करेगा। अब देखना यह है कि भट्टर्राई सरकार इन कसौटियों पर खरी उतरती है या नहीं –
इस पृष्ठभूमि में नेपाल के नवीन संविधान के अर्ंतगत ऐसे प्रावधान किए जाने चाहिए, जिसमें जनसंप्रभुता की मान्यता की अभिव्यक्ति होनी चाहिए और इसके अर्ंतगत ऐसे प्रावधान भी होनी चाहिए कि जनता द्वारा प्रदत ये राजकीय सत्ता का उपभोग लोगों की स्वतंत्रता की रक्षा एवं सुशासन के अनुरुप हो। संप्रभुता की नवीन मान्यता के अर्ंतर्गत अब संप्रभु सत्ता केन्द्रित नहीं विकेन्द्रित होती है। सत्ता का विकेन्द्रीकरण इसी की विशेषता बन गई है। इथोपिया जैसे राज्य में तो जन संप्रभुता के सिद्धान्त के स्थान पर विभिन्न समुदायों के मध्य विभाजित संप्रभुता के सिद्धान्त को मान्यता प्रदान की गई है। नेपाल के नवीन संविधान के अर्न्तर्गत भी ऐसी कोई व्यवस्था करनी होगी। जिसके यहाँ निवास करनेवाले सभी समुदायों को सामान्य रुप से संप्रभु शक्ति की इकाई के रुप में मान्यता प्राप्त हो। उन्हें समस्त समुदाय की इकाई मानने के साथ ही उनकी पृथक पहचान कायम रह सके। इसके लिए यदि आवश्यक हो तो परंपरागत संघंवाद की मान्यता से अलग हटते हुए नवीन संघीय व्यवस्था का निर्माण किया जाए और विभिन्न समुदायिक इकाइयों को इसमें प्रतिनिधित्व एवं पृथक मान्यता प्राप्त हो। ऐसी स्थिति में सामुदायिक मत भिन्नताओं की संभावनाएँ पर्ूण्ातः समाप्त हो जाएगी।
नवनिर्वाचित प्रधामंत्री भट्टर्राई ने स्वदेशी गाडÞी का प्रयोग कर जो मिसाल दिया है, वह काबिले तारीफ है। अब तक के सभी प्रधानमंत्री भले ही वे र्सवहारा के नेता ही क्यों न हो, राजसी ठाट वाले जीवन जीते रहे हैं। उनका यह व्यवहार भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उस घटना की याद ताजा करती है, जब वे अपना ड्राइभिंग लाइसेंस नवीकरण कराने खुद चल कर उस कार्यालय तक गए थे। प्रधानमंत्री भट्टर्राई ने कुछ सराहनीय वक्तव्य देकर अपनी सुलझी हर्ुइ सोच का परिचय दिया है – जिसमें एक है कर्मचारियों के बेतन को दुगुना करने की बात, जिससे की वेतन को धीरे-धीरे स्तरीय बना कर र्सार्क मापदंडÞ तक पहुँचाया जा सके। वैसे यह जरुर है कि प्रधानमन्त्री भट्टर्राई के सामने बहुत सारी और बडÞी चुनौतियाँ हैं। जैसे कि मधेशियों की बढÞी हर्ुइ महत्वाकांक्षाओं की पर्ूर्ति करना, संविधान का समय में निर्माण करना, स्थायी शांति की स्थापना करना आदि। अभी तक अपनी सूझ-बूझ के कारण भट्टर्राई सरकार बनाने में तो सफल हो गए हैं लेकिन देश के दो प्रमुख प्रतिपक्षी दल नेपाली कांग्रेस और एमाले के तेवर को देखते हुए लगता है कि नए संविधान को संविधान सभा से कराना उनके लिए आसान नहीं होगा। दूसरी ओर उन्हें अपनी ही पार्टर्ीीे उपाध्यक्ष मोहन वैद्य किरण के विरोध का भी सामना करना पडÞ रहा है। हालाँकि नेपाली कांग्रेस जिस समय अलग-थलग पडÞ गई थी, उस समय भट्टर्राई ने ही कहा था कि किसी भी कार्य के लिए नेपाली कांग्रेस को भी साथ लेकर चलना अनिवार्य हैं। देश की दशा-दिशा को देखते हुए सभी राजनीतिक दलों को सहयोगात्मक रुख अपनाने की जरुरत है। सदन में अनगिनत बार मुंहकी खाए रामचन्द्र पौडेल की वर्तमान गठबंधन अप्रजातान्त्रिक दिखाई दे रहा है जबकि सत्ता में रहते हुए मधेशियों का देश में प्रतिशत मात्र १३% बताने वाले खनाल इसे अप्रासंगिक मान रहे हैं। भट्टर्राई के व्यक्तित्व की चौरतफी प्रशंसा सुनकर प्रचण्ड भी हौले स्वर में कह रहे हैं कि व्यक्ति नहीं पार्टर्ीी्रधान होता है। जो भी हो वर्तमान जटिल परिस्थिति में बाबुराम भट्टर्राई भले ही सफल हो, या असफल, लेकिन इतना तो तय है कि पूरा देश इस बात को मान रहा है कि बाबुराम भट्टर्राई एक इमानदार, सिद्धान्तनिष्ठ सकारात्मक, क्रान्तिकारी तथा देश हितके लिए कार्य करने वाले प्रधानमंत्री हैं।
नेपाल के सामुदायिक जीवन में नेतृत्व का चुनाव अब तक लोकतांत्रिक आधार पर नहीं होता रहा है। उनका नेतृत्व सामान्य तौर पर अभिजन वर्ग के द्वारा होता रहा है। अब लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना के साथ ही यहाँ र्सार्वभौम मताधिकार पद्धति के आधार पर निर्वाचन पद्धति का श्रीगणेश हुआ है। यह लोकतंत्र के र्सवमान्य सिद्धान्त पर आधारित है। लेकिन आम मतदाता अपने इस अधिकार का उपभोग किस प्रकार कर सकेंगे – क्या वे इस के महत्व को समझ सकेंगे – क्या बहुदलीय पद्धति के अर्न्तर्गत इस अधिकार के उपयोग विवेकपर्ूण्ा ढंग से कर सकेंगे। क्योंकि यह व्यवस्था ऐसे समाज में प्रारंभ की जा रही है, जहां की बहुसंख्यक जनसंख्या अशिक्षित एवं गरीब है। जो अभी भी अपने मत का महत्व नहीं समझ पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में पुनः सत्ता का दायित्व समाज के अभिजन वर्ग के हाथों में होगा और उन्हें पहले से कहीं अधिक शक्तियाँ एवं अधिकार प्राप्त होंगे। ऐसे लोगों को जन कल्याण का दायित्व प्रदान किया जाना क्या वांछनीय होगा, जिन का लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता अभी भी संदेहास्पद है – निश्चय ही लोकतंत्र के अर्ंतर्गत एक नई अभिजनवादी मान्यता का विकास होगा, जो नवीन प्रकार का होगा। इस क्रम में एक अन्य समस्या यह भी उत्पन्न हो सकती है कि यदि समाज का कोई समूह या समुदाय लोकतान्त्रिक मूल्यों की उपेक्षा करता है या उन का अनुपालन नहीं करता है तो क्या होगा – क्या ऐसे स्थिति में लोगों को बलपर्ूवक उन शर्ताें का अनुपालन करने को बाध्य किया जाएगा – जिनके द्वारा नवीन व्यवस्था एवं सामाजिक एवं राजनीतिक संरचना का निर्माण किया गया है। इन सभी गम्भीर विषयों पर नई सरकार को ध्यान देते हुए काम करना होगा।
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