नया शक्ति और सन्देह के बादल

रणधीर चौधरी :विवादित संबिधान निर्माण के वक्त डा. बाबुराम भट्टराइ को राजनीतिक संवाद तथा सहमति समिति का जिम्मेदारी सौपी गयी थी । भट्टराई एक क्षमतावाण नेता हैं इसमें शक की कोई गुंजाइस नहीं है । अर्थमंत्री के पद को सम्भाल कर जिस तरीके और इमानदारी के साथ राजस्व वसूली किए थे, उनको सलाम करना चाहिये । परंतु उनके द्वारा संविधान निर्माण के क्रम में हुई गलतियों का अब मूल्याङकन हो रहा है और सीमांतकृत वर्ग द्वारा इतिहास में उसका मूल्याङकन और गहन तरीके से किया ही जायगा ।
संविधान घोषणा के कुछ ही दिन बाद डा. भट्टराई ने एनेकपा माओवादी से अलग होने की घोषणा की । वैसे तो पार्टी मे आन्तरिक द्वन्द्ध बहुत पहले से चलता आ रहा था बाबुराम और पुष्मकमल के बीच मे । पार्टी से अलग होने के बाद नया शक्ति निर्माण करने का एलान किया गया बाबुराम के द्वारा और आज की तारीख में उन्होंने कर के भी दिखलाया है । परंतु इस शक्ति की सफलता और चुनौती के बारे में थोड़ी चर्चा करना सान्दर्भिक है ।
अतीत की आहट
बात है ४ फेब्रुअरी १९९६ की देश के प्रधानमंत्री थे शेरबहादुर देउवा । उसी दौरान डा. बाबुराम भट्टराई चालीस सुत्रीय लिखित मांग लेकर देउवा को अपने पार्टी की ओर से ज्ञावन वत्र देने गए थे ज्ञापनपत्र देते वक्त यह भी बोले थे कि अगर उन लोगाें की मांग को नही पूरा किया गया तो सशस्त्र क्रान्ति करेंगे और कर के भी दिखाये । उस चालीस बुंदे मांग में से एक दो बातों को यहाँ रखना शायद सान्र्दभिक होगा । उसमें लिखा था, नेपाल मे क्षेत्रीय भेदभाव का अन्त होना चाहिये, पहाड़ और तराई के बीच जो असमानता है उसका अन्त होना चाहिये, ग्रामीण और शहरी इलाकों के बीच रहे असमानताओं का अन्त होना चाहिये । विशेष कर राष्ट्रीयता से जोड़ते हुए उन्होंने कहा था— नेपाल और भारत के बीच रही खुली सीमा को अच्छे से संचालन और व्यवस्थित करना होगा । baburam
चालीस सुत्रीय मांग उठाए हुए आज बीस वर्ष हो चुके । उपर उल्लेखित मांगो की पुर्ति कितनी हुई या कहें डा.भट्टराई करबा सके अपने आप मे अध्ययन का विषय है । हलाँकि यह मुद्दा पूरा ना होने मे केवल भट्टराइ अकेले की गलती नहीं है । परंतु अहम बात यह है कि बाबुराम उस वक्त के माओवादी पार्टी का एक अहम हिस्सा थे । सरकार में आने के वक्त भी उनका दबदबा था नेपाली राजनीति में ।
अभी नहीं तो क्षेत्रीय विविधता का अन्त हुआ है, ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में जो असमानता हुआ करता था वह आज भी है । नेपाल भारत के बीच सीमा की जो अवस्था थी वह आज भी वैसी ही है इसमें ज्यादा कहने की आवश्यकता नहीं है ।
नयाँ शक्ति और आधार
नेपाल को प्रगति के मार्ग पर दौड़ाने के लिये नयाँ शक्ति की आवश्यकता है ये कहने वालाें की कमी नहीं है । अभी भी कुछ पत्रकार और अवकाश प्राप्त कर्मचारी है जो नया शक्ति स्थापना करने का अभ्यास जारी रखे हुए हैं । बाबुराम द्वारा नया शक्ति की औपचारिक उदघोष करने से पहले मैंने उनसे ट्वीटर पर पूछा था । डाक्टर साहब, जब आप सशस्त्र क्रान्ति के लिये निकले थे उस वक्त भी आप और आप के काफिले ने शायद यही कहा था जनता को, कि अब नेपाल मे नया शक्ति की आवश्यकता आ पड़ी है और जनता ने आप लोगो को सर आँखो पर बिठाया । जिसका उदाहरण था पहला संविधानसभा के चुनाव में माओवादियों का नेपाली सत्ता के अग्रपंत्ति में होना । मेरे उस ट्वीट का जवाव अब तक नहीं आया !
आज की तारीख में देश को आर्थिक उन्नति की आवश्यकता है कह कर बाबुराम ने नयाँ शक्ति के कारवां को आगे बढ़ाया है । अच्छी बात है । पर नेपाली कांग्रेस, एमाले यहाँ तक कि धर्मवादी और राजावादी राप्रपा—नेपाल जैसे पार्टी भी आजकल सिर्फ आर्थिक संवृद्धि की बात करते हैं । खास कर हमारे प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद ओली तो देश विकास की चमत्कारी योजनाओं को जनता के समक्ष रखने मे सफल हुए हंै । ऐसे में भला जनता क्यों विश्वास करेगी बाबुराम पर ?
बाबुराम को यह बात नहीं भूलनी चाहिये कि जिस तरह नया शक्ति सीमांतकृत वर्ग के मुद्दों को स्पेस दिया है शायद इनको भारी ही पड़ने वाला है । क्योंकि माओवादी के सत्ता में आने के बाद जिस तरह धारासाई हुआ है उसकी एक अहम कड़ी है माओवादीओं द्वारा सीमांतकृत वर्ग के मुद्दों को ले कर चलना और इस देश के कुलीनवर्ग को यह पसंद नही कि सीमांतकृत आगे आए । यही कारण हो सकता है प्रचंड ने भी मधेशी लगायत सभी सीमांतकृत के मुद्दाें को अघोषित रूप में ही सही परंतु छोड़ दिया । नया शक्ति के सफलता का कोई आधार नहीं है । जिस तरह नेपाल के संविधान २०१५ में समाजवाद के प्रावधान को रखा गया उस समय नेपाल के लगभग सारे उद्योगपति चिंतित दिखे थे । जिनको प्रधानमंत्री ओली एण्ड कंपनी ने समझाया था । पता नही क्या कहा था ओली ने ?
कहा जाता है किसी भी राजनीतिक परियोजना को सफल करने के लिये अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के अहम सहयोग की आवश्यकता होती है वो भी नेपाल जैसे अविकसित देश में । और सच्चाई यह भी है कि अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय कभी भी उन शक्तियों से अपना सम्बन्ध बनाये रखना चाहता है जहाँ से उसको उनके निवेश के सदुपयोग की ग्यारेंटी नजर आती हो । आज नेपाली राजनीति जिस दिशा में जाती दिख रही है उससे लोगों में यह डर बैठ गया है कि शायद नेपाल यथास्थितिवादियों के ग्रीप में फिर से फँस गया और इसका एक अहम कारण है नेपाल का प्रतिगामी संविधान, जिसको लाने में बाबुराम ने भी एक अहम किरदार निभाया था ।
नया शक्ति से आस लगाना वा न लगाना जनता की अपनी स्वतन्त्रता की बात है और होनी भी चाहिये । परंतु मुझे शक के बादल नजर आते हैं,
बाबुराम की नया शक्ति की परियोजना के सफलता प्रति । जिस तरह नेपाल ने एकबार फिर संसदीय प्रणली का चयन किया है । मुझे नही लगता इस प्रणाली मे बाबुराम की राजनीतिक परियोजना इतनी आसानी से सफल होगी । और जब तक सत्ता मे सटीक पकड़ नहीं होती अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय उन पर विश्वास नहीं करेगी ।
एक अहम बात जो अक्सर सोचने पर मजबूर करती है, क्या चीन बाबुराम पर विश्वास करेगा ? अगर करेगा तो क्यों ? आज जिस तरह चीन नेपाल में खुल कर खेलने लगा है, इससे पता चलता है कि वो नेपाल में कथित कम्युनिस्ट पार्टियाें का पृष्ठपोषण करने की ठान ली है और यह सत्य है कि नेपाल मे आर्थिक क्रान्ति लाने के लिये देश के विकास के लिये चीन की एक अहम भूमिका रहेगी । ऐसे में चीन भला बाबुराम से क्यों नहीं नाराज होगा । वामपंथी पृष्ठभूमि वाले बाबुराम और अन्य नेपाली वामपंथी अलग रहने के एलान ने चीन को जरुर तकलीफ ही पहुँचाया होगा । तो ऐसे में देखना है कि बाबुराम चीन को कैसे अपने कनफिडेंस मे ले पाते हैं ।
बेस्ट अफ लक
कहते हैं कि, कारवां जिसको आप और आगे तक नहीं ले जा सकते है उसे अच्छा मोड़ दे कर छोड़ देना चाहिये । शायद बाबुराम ने यही किया था एनेकपा—माओवादी के साथ । देश सैकड़ों कुलीनों के चंगुल में फंसा हुआ है, इस बात को जनता को गंभीरता के साथ लेनी चाहिये । हम अगर वास्तव में समग्र देश की भलाई की बात करेंगे तो शायद अब नये सिरे से सोचने का वक्त आ गया है । संसदीय प्रणाली अपने आप में अच्छा अभ्यास हो सकता है । परंतु जिस तरह नेपाल में इसका मजाक उड़ाया जाता है । शायद आने वाले अगले चुनाव मे हर एक पार्टी जो इस देश का विकास चाहता है उनको संसदीय प्रणाली के विरुद्घ में मुहिम चलानी होगी । खास कर बाबुराम जैसे नया शक्ति का सपना बांटने वाले नेताओं को जन जन तक संसदीय प्रणाली की कुरीति और इसके कारण देश के विकास पर हो रहे असर के बारे में अभियान चलाना चाहिये, अभी से । बाबुराम एण्ड कंपनी को सिर्फ और सिर्फ युवा पीढ़ी को अपने विश्वास में लेना होगा । नेपाली “डाइसपोरा” सब को यह यकीन दिलाना होगा की नया शक्ति अलग है । सुनने मे थोड़ “प्योरिस्टिक” लग सकता है, परंतु मैं कहना चाहूंगा कि बाबुराम को यह दिखाना होगा कि नया शक्ति नाम मात्र का समावेशी नहीं है । अगर मधेशियाें की बात करें तो, रामकुमार शर्मा, रामचन्द्र झा, रामरिझन यादव और डा.प्रवीण मिश्र जैसे नाम भी है नया शक्ति में । परंतु क्या ये लोग कभी भी नया शक्ति का ड्राइवर बन सकते हैं ? जरुरत तो इस बात की है कि, बाबुराम जी चाहिए कि मधेशियो में से भी जो पिछड़े हैं उनको शामिल करें नया शक्ति में । क्योंकि जो नाम ऊपर लिखा है वे सब नेक इनसान हंै, इसमें कोई शक नहीं । लेकिन “मधेशी सम्भ्रान्त” हंै । आप वैसे इंसानो को रखिये जिसका इतिहास खुद बोले कि– ये लोग वह हंै जो पावर में जब थे तब भी जमीन पर ही थे । शायद बाबुराम भट्टराइ के बाद किसी का नाम आता है नया शक्ति में तो वो हैं रामेश्वर खनाल । यानि कि खस बाहुन । अलग अर्थ न निकाले । परंतु क्या मधेशी, दलित, थारु, महिला, विकलांग जैसे समूह से कोई नया शक्ति का नेतृत्व कर पाएँगे ? क्या ये जनता की शक्ति बन पायेगी ? क्या नया शक्ति आने वाले दशकों तक देश को नए नए पैकेज दे कर देश को प्रगति के मार्ग पर ले जाने मे सफल हो पाएंगे ?
मुझे विश्वास है । मेरे इन सवाल और सन्देह का निवारण तब ही सम्भव होगा जब बाबुराम भट्टराई की आवाज जन–जन तक पहुँच पाएगी ।

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