नवरात्र में अनुशासन :अंशु झा


अंशु झा
नवरात्र की अनुष्ठान साधना का अत्यधिक महत्व माना गया है । इसमें पूजा–अर्चना की निर्धारित विधि–व्यवस्था का अपना महत्व है और ऋतु संधि की अवसर पर इस बेला की समय परक विशेषता है । इतने पर भी इस रहस्य को भली प्रकार हृदयंगम किया जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के साथ जुड़ी रहने वाली सिद्धियों की दृष्टि से इन अनुष्ठानों का मर्म उस अवसर पर पालन किए जाने वाले अनुबंध, अनुशासनों के साथ जुड़ा हुआ है । वे नियम सामान्य व्यवहार में कुछ कठिन तो पड़ते है, पर ऐसे नहीं हैं, जिन्हे सच्ची इच्छा के रहते व्यस्त समझे जाने वाले व्यक्ति भी पालन न कर सकें । समझे जाने योग्य तथ्य यह है कि इन अनुशासनों का इन दिनों अभ्यास करने के उपरान्त आगे भी जीवन में स्थायी रूप से सम्मिलित करने की जो प्रेरणा है, उसी को अपनाने पर प्रगति एवं सिद्धि का समस्त आधार केन्द्रीभूत है ।
नवरात्र साधन को प्रखर बनाने और साधक की निष्ठा परिपक्व करने के लिए अनुष्ठानों में जो अनुबन्ध रखे गये है, उन्हें व्रत कहते हैं । नवरात्र में स्वयंसेवा, भूमिशयन, चर्मत्याग, उपवास, ब्रह्मचर्य जैसे कुछ नियमपालन की परम्परा इसी दृष्ट से शास्त्रकारों ने बनाई है कि उपासना में अधिक प्रखरता का समावेश हो सके जो सुविधा, सरलता के वातावरण में उपलब्ध नहीं होता ।
स्वयंसेवाः अपनी सेवा स्वयं करे अर्थात् मनुष्य के नित्य क्रियाएं में जितने भी कार्य आते हें, वो स्वयं करना चाहिए । सभी क्रियाओं में भोजन ग्रहण की प्रक्रिया करना चाहिए अर्थात् बाजार से वह आहार न खरीदा जाए, जिस में दूसरों का कुसंस्कारी श्रम लगा हो । घर में शुद्धिपूर्वक बनाया हुआ भोजन ही ग्रहण करना चाहिए ।
भूमिशयनः– भूमिशयन से तातपर्य है कोमलता के स्थान पर कठोरता अपनाना । यह प्रयोजन पलंग छोड़कर लकड़ी के तख्त से भी चल सकता है । बात चिन्ह पूजा से नहीं तपश्चर्या में सन्निहित आदर्शों के लिए कष्टसहन में प्रसन्नता अनुभव करने की मनःस्थिति निर्माण करने से बनती है ।
चर्मत्यागः चमड़े के उपयोग से न कवेल नवरात्र में वरन अन्य समय में भी कमी करने या बचने की आवश्यकता है क्योंकि इन दिनों ९९ प्रतिशत चमड़ा पशुवध से ही उपलब्ध होता है । चर्मत्याग की चिन्हपूजा तो ऐसे भी हो सकती है कि नौ दिन रबड़ की चपल पहनकर काट लिए जाएँ । परन्तु यहाँ बात उठती है अहिंसा की । एक नैतिकवान व्यक्ति संसार के कोई भी प्राणी पर अत्याचार होते हुए नहीं देख सकता । अतः नवरात्र में चर्मत्याग के पीछे अहिंसा वृत्ति के विकास का तत्वज्ञान जुड़ा हुआ समझा जाना चाहिए ।
उपवासः नवरात्र में उपवास का भी अपना एक नियम है । कठिन उपवास जल पर चलता है उसमें नीबू, गुड़ आदि का उपयोग हो सकता है, पर जिसे उपवास से अति दुर्बलता आ जाती है, वे दूध, दही, फल, शाक आदि अन्नहार से रहित वस्तुओं को प्रयुक्त कर सकते हैं । एक समय ही भोजन करना उपवास की परिधि में आता है । यहां तक कि दोनों समय रोटी–शाक जैसी वस्तु ग्रहण करने वाले भी हल्के उपवासकर्ता गिने जाते हैं ।
उपवास का तत्वज्ञान ‘आहार–शुद्धि से संबंधित है, ‘जैसे खाए अन्न वैसा बने मन’ वाली बात आध्यात्मिक प्रगति के लिए विशेष रूप से आवश्यक समझी गई है । उपवास में फल, शाक, दुध जैसे सुपाच्य आहार को प्रमुख माना गया है और चटोरपन अर्थात् समाले, खटाई, मिठाई चिकनाई की अधिकता से परहेद बताया गया है । यही कारण है कि उपवासों की एक धारा ‘अस्वाद व्रत’ भी है । साधक सात्विक आहार लें और चटोरपन के कारण अधिक खा जाने वाली आदत से बचें, यह गरीरगत उपवास हुआ । मनोगत यह है कि आहार को प्रसाद एवं औषधि की तरह ग्रहण किया जाए । वस्तुतः आम आदमी जितना खाता है, उससे आधे में उसका शारीरिक एवं मानसिक पोषण भली–भांति हो सकता है । अति अपनाने पर तो अमृत भी विषय बनता है । एक तत्वज्ञानी का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि ‘आधा भोजन हम खाते हैं और शेष आधा हमें खाता रहता है ।’
आध्यात्मिक दृष्टि से पौष्टिक एवं सात्विक आहार वह है, जो ईमानदारी व मेहनत के साथ कमाया गया है । उपवास का अपना तत्वज्ञान है ।
ब्रह्मचार्यः नवरात्र अनुष्ठान में ब्रह्मचर्य प्रतिबंध के साथ–साथ कुमारिका पूजन भी एक प्रक्रिया है । कुमारिकाएं किशोरियां होती है, जिसे देवी का रूप माना जाता है । नवरात्र की व्रतशीलता में रतिक्रम से विरत रहने का अनुबंध है । पथ यह ब्रह्मचार्य का स्थूल एवं प्रारम्भिक निर्वाह है ।
नर और नारी के बीच भाई–बहन का, पिता–पुत्री का, माता–सन्तान का रिश्ता चले और यदि वे दाम्पत्य सूत्र में बंध हैं तो परस्पर पत्नी और पति बनकर उच्च स्तरीय आत्मीयता एवं सहकारिता का प्रमाण प्रसतुत करें । यही है ब्रम्हचार्य का तत्वज्ञान ।
इस प्रकार के इत्यादि अनुशासनों का नियमिता और निष्ठापूर्वक पालन करने से ही अनुष्ठान का उद्देश्य पूरा होता है ।

 

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