नवीनतम वैदिक तिथिपत्र -पञ्चाङ्ग)

वैदिक तिथिपत्र -वैदिक पञ्चाङ् ग) का प्रकाशन हाल ही में काठमाण्डू -हात्तिगौँडा) स्थित स्वाध्यायशाला कुटुम्ब ने वैदिक तिथिपत्र -पञ्चाङ्ग) का नवीन अङ्क प्रकाशित किया है। वैदिक नववषर्ारम्भ के अवसर पर मार्ग १८ गते शुक्लप्रतिपदा में इसका लोकार्पण किया गया था। यह तिथिपत्र वेदाङ्गज्योतिष के आधार पर निर्मित है। भारतवर्षमें सम्पर्ूण्ा विद्याओं का मूल वेद माना जाता है। वेदाङ्ग शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्दःशास्त्र और ज्योतिष हैं।

ज्योतिष में श्रौत और गृह्य कर्मों में अपेक्षित काल का निरूपण होता है। श्रुति स्मृति पुराण से प्रमाणित और नित्य स्वाध्याय परम्परा से सुरक्षित “पञ्चसंवत्सरमयम्” इत्यादि लगध मुनि प्रोक्त वेदाङ्गज्योतिष की सोमाकर की प्राचीन व्याख्या प्राप्त है। श्री शिवराज आचार्य कौण्डिन्न्यायन रचित नवीन कौण्डिन्न्यायन व्याख्यान भी वाराणसी के चौखम्बा विद्याभवन से प्रकाशित है। इसी के आधार पर यह तिथिपत्र बना है। वेदाङ्गज्योतिष में पञ्चवषर्ात्मक युग माना गया है। वे पाँच वर्षसंवत्सर, परिवत्सर, इदावत्सर, इद्वत्सर और वत्सर हैँ। इनका उल्लेख वेदों में है। लगधमुनि प्रोक्त वेदाङ्गज्योतिष में तपःशुक्ल प्रतिपदा में अर्थात् वेदाङ्गज्योतिष के अनुकूल परिभाषा के माघ की शुक्लप्रतिपदा में वर्षका आर म्भ बताया गया है। यह माघ वर्तमान काल में प्रचलित मकर, कुम्भ, मीन मेष इत्यादि राशियों से परिभाषित माघ नहीं है। यह तो शिशिर ऋतु से सम्बद्ध है। इस वैदिक माघ के निर्ण्र्ााका आधार उक्त वेदाङ् गज्योतिष ग्रन्थ के व्याख्यान में निरूपित है।

प्रसिद्ध ज्योतिषी निर्मलचन्द्र लाहिडी ने अपने एफेमेरिज में वैदिक अथवा वेदाङ् गज्योतिषोक्त माघ मास को आधुनिक राशि परिभाषित माघ मास मानकर इसी राशि परिभाषित माघ मास की शुक्ल प्रतिपदा से वेदाङ्गज्योतिषोक्त नववर्षका आरम्भ मानने की परम्परा चलाई है। किन्तु वैदिक ग्रन्थों में राशिपरिभाषित महीनों की बात न होने से यह बात यथार्थ नहीं है। वेदाङ्गज्योतिषोक्त माघ मास तो वास्तविक दिनमान के अथवा छाया के निर ीक्षण से निश्चित होनेवाले दृक् सिद्ध सौर उत्तरायण बिन्दु से नियन्त्रित होनेवाला माघ मास है। वैदिक परम्परा में मुख्य वर्षचान्द्र है। मुख्य वैदिक परम्परा की कालगणना में युग, संवत्सर, अयन ऋतु, मास, पक्ष, तिथि सब ही मुख्य रूप में चान्द्र और र्सर्ूयगति सापेक्ष भी होने से गौण रूप में सौर भी हैं।

अतएव इन सब को सौर-चान्द्र माना जाता है। वर्षके सबसे छोटे दिन में -सब से न्यून दिनमान वाले दिन में पडÞनेवाली तिथि को देखकर उस के आगे या ५-६ दिन पीछे की शुक्लप्रतिपदा से वैदिक तपोमास का आर म्भ माना जाता है। विविध ग्रन्थों में वैदिकर् धर्मकृत्य के ऋतुओं को चान्द्र बताया गया है। मास चान्द्र ही लिए गए हैं। विवाह में भी चान्द्र मास को ही लेने की बात गृह् यसूत्रों से अवगत होती है। वैदिक चान्द्र मास शुक्लपक्षादि कृष्णपक्षान्त है। वेदाङ् गज्योतिष के अनुसार अयन के अन्त में ही आषाढÞ -वैदिक शुचिमास) और पौष -वैदिक सरहस्यमास) में ही अधिक मास माना जाता है। यह बात महाभारत के विर ार्टपर्व में और कौटिलीय अर्थशास्त्र में भी है। वेद में अहोरात्रात्मक तिथि मानीर् गई है -मा.वा.शुक्लयजर्ुर्वेद २२।२८)।

इन सब आधारों पर यह नवीन तिथिपत्र निर्मित है। वैदिक धर्मकृत्यों के लिए नक्षत्रदेवता के आधार पर नाम र खने का विधान है। इस तिथिपत्र में इसका भी विवरण है। वेदाङ्गज्योतिष को समझने के लिए विगत में वेबर, थीबो, जनार्दन बालाजी मोडक, शङ्कर बालकृष्ण दीक्षित, लाला छोटेलाल बार्हस्पत्य, सुधाकर द्विवेदी, बालगङ्गाधर तिलक, शामशास्त्री इत्यादि के प्रयास पर्ूण्ा रूप में सफल नहीं हुए थे। भारत सरकार से नियुक्त पञ्चाङ् ग सुधार समिति ने भी वेदाङ्गज्योतिष में विशेष ध्यान नहीं दिया था। उक्त वेदाङ् गज्योतिष ग्रन्थ में प्रोक्त वैदिक कालगणना पद्धति का प्रमाणपुष्ट व्याख्यान से स्पष्टीकर ण करके उसके आधार में अब नेपाल से यह वैदिक तिथिपत्र का प्रकाशन हो र हा है। मूल वैदिक परम्परा को अच्छी तरह पहचान कर उसका अध्ययन, संरक्षण और अनुसरण करने वाले वैदिक विद्वानों को यह तिथिपत्र लाभदायक हो सकता है। J प्रस्तुतिः प्रमोदवर्धन कौण्डिन्न्यायन बअजबचथबउचamयमटद्दद्द२gmबष्।अिom

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