नाक ? बेचारी नाक बार बार कटती है और अपने आप ही जुड़ जाती है : बिम्मीशर्मा

बिम्मीशर्मा , काठमांडू ,२७ जून |

विदेशियों के लिए नाक सिर्फ सांस लेने के लिए बनाया गया एक अंग है । पर हम नेपालियों के लिए यह सब से ज्यादा संवेदनशीलअंग है । हम नाक से सिर्फ सांस ही नहीं लेते, कंही बेइज्जत या अपमान हो कर कट न जाए इसीलिए हमेशा अपनी नाक को बचा कर चलते हैं । पर यह नाक है कि हर जगह हम से पहले ही चला जाता है और लहुलुहान हो कर घर आता है ।

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हम सबको पता है की रामायण मे शूंपर्णखा की नाक लक्ष्मण जी ने काटी थी । प्रेमातूर शूंपर्णखा नाक कटने के बाद अपने बडे भाई रावण से शिकायत करने चली गई थी । पर यहाँ तो लाखों शूंपर्णखा है और हजारों लक्ष्मण । किस की नाक किस बात पर कंहाँ कट जाती है पता ही नहीं चलता । और शिकायत करने भी किस के पास जाएं ।अब सभी का भाई शूंपर्णखा के भैया रावण कि तरह शक्तिशाली तो नहीं होता । इसीलिए अपने कटे हुए नाक पर खुद ही मलहम पट्टी करके चुप हो जाते हैं । अब तो सब से अच्छा है अपनी बेईज्जती से कटे हुए नाक को छूपाने के लिए मास्क लगा लो ।

हमारे शरीर में आंख, कान, किडनी, दिल, फेफड़ा, दिमाग जैसा महत्पवपूर्ण अगं के होते हुए भी यह इतनी सी छोटी नाक इन सब अंगपर भारी है । कुछ उपर नीचे हुआ कि नहीं लोग एक दुसरे की नाक काटने पर भीर जाते हंै । किसी की बेटी भाग गई, बेटा परीक्षा में फेल हो गया, पडोसी के घर में नईं चमचमाती कार आ गई, किसी रिश्तेदार नें बडा सा मकान बना लिया । हद हो गई, यह तो किसी की तौहीन हो गई भई । इस तरह किसी का कोई नाक काटता है भला ?

नेपाल में तो जब राणा शासन या राजतंत्र था तब भी और अब जब गणतंत्र और लोकतंत्र है तब भी सियासती चाल से जनता की नाक बार, बार कटती ही आई है । वैसे भी नेपाल के पहाडी और हिमाली जगह में रहने वाले, भोटे, लामा और शेर्पाओं की नाक के नाम पर सांस लेने के लिए बस दो छेद ही होते हैं । इसी लिए उनको कोई चिंता नहीं है नाक कटे या रहे । जो लंबे और तीखे नाकवाले समाज के तथाकथित“प्रतिष्ठित”लोग होते हैं उन्हे अपनी नाक की बड़ी ही फिक्र होती है ।

यह प्रतिष्ठित लोग अपनी नाक बचाने के लिए कान काटने और आंख फोड़ने के लिए तैयार हो जाते है । पर अपनी नाक पर मक्खी भी बैठने नहीं देते । जैसे हमारे प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली कर रहे हैं । पिएम ओली अपनी और पार्टी की नाक बचाने के लिए देश की आंख और कान फोड़ कर अपाहिज बना रहे है । देश के नए नवेले संविधान से अपनी नवोढा जैसा व्यवहार कर रहे हैं ओली । जैसे की गावँ मे अपनी प्रेयसी को कोई मनचला भला, बुरा कह दे तो उस की नाक (ईज्जत) बचाने के लिए खून खराबा तक हो जाता है । वैसे ही अपनी नवोढा संविधान को अच्छा बताने और उस की नाक को बचाने के लिए पिएम ओली ने मधेश में खून की होली खेल कर मधेशियों की आंख और कान फोड दिया । यदि सच में पिएम ओली को देश की नाक की इतनी फिक्र होती तो अफगानिस्तान के काबुल में मारे गए नेपालियों को लेने विमान स्थल गए और उनको श्रद्धांजली दी उसी तरह मधेश में मारे गए ५० लोगों के परिवार से मिल कर उन के प्रति संवेदना क्यों नहीं प्रकट की । क्या मधेश अलग देश है ? यदि नहीं तो वंहा की जनता के लिए इतनी अवमानना क्यों ?कहिए पिएम ओली नाक किस की कटी ? आपकी, क्योंकि आप कि नाक तो २०२८ साल के झापा कांड में ही कट चुकी थी । अब तो आप के पास आंख, कान और दिल भी नहीं है । एक रोबोट जैसा संवेदनाहीन आदमी सत्तासीन हो कर देश को अपाहिज बना रहा है । और उस की मुर्खता भरी बातें सुनने और झेलने के लिए हम अभिशप्त हैं । नाक तो हमारी आप जैसा आदमी पिएम बनने से कटी है सर जी ।

शरीर के किसी भी अंग में गंदा या काला लग जाए कोई फर्क नहीं पड़ता पर नाक में कोई दाग नहीं लगनी चाहिए । आंख मे काला काजल जंचता है पर नाक में गलती से काला लग जाए तो बड़ी जग हंसाई होती है । दूर से ही और सब से आगे दिखने वाली नाक प्रतिष्ठा का विषय है । भले ही नाक कि लंबाई, चौड़ाई कैसी भी हो पर नाक पर आंच नहीं आनी चाहिए । इस नाक को बचाने के लिए लोग कितने झूठ बोलते है, पापड़ बेलते है फिर भी नाक बेचारी कट जाती है ।

इस देश में लोगों के पास संपति के नाम पर एक बेचारी नाक ही है जो बेचारी बार बार कटती है और फिर अपने आप ही जुड़ जाती है । नेता और भ्रष्ट लोग अपने बार बार के अपमान से कटे हुए नाक को सुपरग्लू और क्विकफिक्स लगा कर जोड़ते हंै । पर इन की असलियत पब्लिक जानती ही है । इन की नाक रात के अंधेरे मे कटती है और दिन के उजाले में पूजा, पाठ और भजन, किर्तन से अपने आप जुड़ जाती है । लागों की खोटी नियत, बेईमानी और भ्रष्टाचार के कारण सीधी साधी नाक बेचारी नाक वलि का बकरा बन जाती है । कटनी तो गर्दन चाहिए थी पर कटती नाक है, वह भी अदृश्य ।

नेपाल में जो नाक ही है । लंबी, सुंतवा, तीखी, चपटी और नेप्टा नाक के कारण ही आरक्षण और सुविधा मिलती है देश के नागरिकों को । नाक देख कर बता देते है की वह आदमी किस जाति, धर्म और क्षेत्र का है । जितनी चपटी नाक उतनी ही सेवा, सुविधा से वंचित । और जितनी तीखी और लंबी नाक उतनी ही राजनीति और दूसरे क्षेत्र में सुविधा और मान सम्मान । तो देखा आपने यह छोटे से नाक से र्इंसान की पौ बारह हो जाती है । और जब यही नाक सार्वजनिक अपमान से किसी जगह कटती है तो १२ चेहरे में बज जाता है और और दिन में ही तारें नजर आने लगते है । (व्यग्ंय)

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