नागपंचमी पर करें यात्रा नागद्वारी की, यहाँ मिला था भीम को हजार हाथियों का बल

भोपाल08naagdwari_pachmari_14701

7 अगस्त को नागपंचमी का त्यौहार मनाया जा रहा है।  आज जानिए उस जगह के बारे में  जहां सिर्फ साल में 15 दिन ही जाया जा सकता है। रास्ते में जहरीले सांपों को डेरा लगा रहता है। इस यात्रा के लिए सिर्फ 15 दिन के लिए पूरा गांव बसाया जाता है। दुर्गम पथ और रोमांचक यात्रा के बीच पचमढ़ी में नागद्वारी पद यात्रा महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश प्रांतों में आस्था का मुख्य केन्द्र है।

हर साल सावन मास में नागद्वारी यात्रा प्रारंभ होती है और 15 दिन तक चलने वाले नागद्वारी मेले का समापन नागपंचमी के दिन हो जाता है।केवल 15 दिन के लिए सतपुड़ा अंचल की सुरम्य वादियों में बसी ये सात पहाडिय़ां श्रद्धालुओं के हर हर महादेव और जय नागदेव के जयघोष से गुंजायमान हो रही है।रास्ते में जहरीले सांप यहां-वहां मिलते हैं लेकिन वह किसी भी यात्री को डसते नहीं
प्रसिद्ध नागद्वारी यात्रा का पथ सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के बीच आता है।वन विभाग इस पथ पर यात्रा के लिए केवल 15 दिन की स्वीकृति देता है। श्रद्धालु 15 दिन के बीच ही इस पथ पर यात्रा कर सकते हैं।यह यात्रा नागपंचमी से 15 दिन पूर्व शुरू हो जाती है और नागपंचमी को यात्रा की समाप्ति भी हो जाती है।टाइगर रिजर्व होने के कारण ही इस यात्रा के मुख्य ग्राम काजरी में रहने वाले 250 ग्रामीणों को कुछ वर्षों पूर्व यहां से हटा दिया गया। साल में एक बार ही यह गांव फिर से आबाद होता है।इस गांव में पूरा मेला लगता है गांव के लोग फिर से अपने गांव में आकर नागद्वारी यात्रा करने वालों की सेवा में लग जाते हैं।

नागद्वारी की गुफा की ये कहानियां हैं प्रचलित

नागद्वारी यात्रा का मुख्य केन्द्र सतपुड़ा अंचल की पहाडिय़ों में बसा गांव काजरी है।मान्यता है कि इस गांव की काजरी नामक एक महिला ने संतान प्राप्ति के लिए नागदेव को काजल लगाने की मन्नत मानी थी।उसे संतान की प्राप्ति भी हुई। लेकिन जब वह काजल लगाने पहुंची तो नागदेव का विकराल रूप देखकर उसकी वहीं मृत्यु हो गई।तभी से उस गांव का नाम काजरी पड़ा। और यात्रा की शुरुआत भी यहीं से होती है।दूसरी मान्यता के अनुसार नागद्वारी यात्रा से कालसर्प दोष दूर होता है।नागद्वारी की पूरी यात्रा सर्पाकार पहाडिय़ों से होकर गुजरती है। इस दुर्गम मार्ग में चट्टानें एक दूसरे के ऊपर रखी प्रतीत होती है।मान्यता है कि जो भी एक बार नागद्वारी की दुर्गम यात्रा पूर्ण कर लेता है उसका कालसर्प दोष दूर हो जाता है हालांकि इस यात्रा के कुछ कठिन नियम भी प्रचलित हैं।

नागलोक से जुड़ी है पांडु पुत्र भीम की कथा
कहा जाता है कि पांचों पांडवों में अकेले भीम के पास हजारों हाथियों का बल था। यह बल उन्हें जहां से मिला था, वह नागलोक ही था।
महाभारत की कथा के अनुसार बलशाली भीम का बल देखकर दुर्योधन काफी ईर्ष्या रखता था। उसने भीमसेन को मारने के लिए एक दिन युधिष्ठिर के समक्ष गंगा तट पर स्नान, भोजन तथा क्रीडा करने का प्रस्ताव रखा।
इसके बाद गंगा तट पर विविध व्यंजन तैयार करवाया। स्नानादि के बाद जब सभी ने भोजन किया तो मौका पाकर दुर्योधन ने भीम को विषयुक्त भोजन खिला दिया।
भोजन के बाद सब बालक वहीं सो गये। भीम को विष के प्रभाव से मूर्छा आ गई। मूर्छित भीम को दुर्योधन ने गंगा में डुबो दिया।
मूर्छित भीम डूबते-उतराते नागलोक पहुंच गए। वहां उन्हें भयंकर विषधर नाग डसने लगे। विषधरों के विष के प्रभाव से भीम के शरीर के भीतर का विष नष्ट हो गया और वे सचेतावस्था में आ गए।
चेतना लौटने पर वे नागों को मारने लगे। भीम के इस विनाशलीला देख कुछ नाग भागकर अपने राजा वासुकि के पास पहुंचे और उन्हें घटना से अवगत कराया।
नागराज वासुकि अपने मंत्री आर्यक के साथ भीम के पास आए। आर्यक नाग ने भीम को पहचान लिया और उनका परिचय राजा वासुकि को दिया।
वासुकि नाग ने भीम को अपना अतिथि बना लिया। नागलोक में आठ ऐसे कुंड थे, जिनका जल पीने से मनुष्य के शरीर में हजारों हाथियों का बल आ जाता था।
नागराज वासुकि ने भीम को उपहार में उन आठों कुंडों का जल पिला दिया। इन कुंडों का जल पीने के बाद भीम गहन निद्रा में चले गए।
आठवें दिन जब उनकी निद्रा टूटी तो उनके शरीर में हजारों हाथियों का बल आ चुका था। भीम के विदा मांगने पर नागराज वासुकी ने उन्हें उनकी वाटिका में पहुंचा दिया।

भक्तों को नुकसान नहीं पहुंचाते सांप
आज से लगभग 100 वर्ष पूर्व आरंभ हुई नागद्वारी की यात्रा कश्मीर की अमरनाथ यात्रा की तरह ही अत्यंत कठिन तथा खतरनाक है। कई मायनों तथा परिस्थितियों में तो यह उससे भी ज्यादा खतरनाक और चुनौतीपूर्ण है।
यहां एक अन्य समस्या भी है। ऊंची-नीची तथा दुर्गम पहाड़ियों के बीच बने रास्तों पर श्रद्धालुओं के लिए किसी तरह का आश्रय अथवा विराम स्थान नहीं है। अर्थात आपको अनवरत चलते ही रहना है।
यहां तक वे भक्त ही पहुंच पाते हैं, जिनके अंदर पूरे रास्ते मंजिल तक पंहुचने का जज्बा कायम रहता है। नागद्वारीी की यात्रा करते समय रास्ते में आपका सामना कई जहरीले सांपों से हो सकता है, लेकिन राहत की बात है कि यह सांप भक्तों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।

नागद्वार यात्रा गुप्त गंगा में पूजन अर्चन के साथ समाप्त

अंबामाई से महज 2 किमी दूर नागद्वार यात्रा गुप्त गंगा में पूजन अर्चन के साथ समाप्त होती है। यह प्रकृति का इतना मनोरम स्थल है कि यहां पहुंचने के बाद यहीं रुक जाने की कामना करने लगते हैं। झरनों और नदियों के समागम के बीच पहाड़ी के नीचे स्थित शिवजी की प्रतिमा में पूजन अर्चन से पूर्णता की अनुभूति स्वत: ही जाती है।

 

Loading...