नागरिकता या रिश्वत की डोर –

विनय दीक्षित:सरकार ने नागरिकता ऐन के हिसाब से प्रक्रिया पूरा कर चुके हर नागरिकको अनिवार्य नेेपाली नागरिकता देनेका प्रावधान बनाया है और उसे देश की हर सुविधा उपभोग करने का अधिकार भी दिया है। जहाँ एक तरफ कर्मचारी प्रशासन मुस्कान सहित की सेवाका भाषण मारता है वहीं ग्रामीण जनताको सामान्य कामकाज के लिए सरकारी निकाय में घण्टों लाइन लगना पडÞता है। भ्रष्टाचार विरुद्ध शून्य सहनशीलता का आलम और हेलो सरकार जैसे सुशासन की संरचना ऐसे लगता हैं, मानो कुत्त के सर पर सींग उग आई हो।Very
बाँके जिला मटेहिया गाबिस वार्ड नं.७ निवासी एक किशोरी कान्ति कुमारी यादव ने नागरिकता प्राप्त करने के लिए जो मुहिम छेडÞा, वह इस बातको स्पष्ट करता है कि सरकारी निकाय और कर्मचारी प्रशासन ने भ्रष्टाचार के कितने पडÞाव पार किए है। जहाँ मधेशी पार्टर्ीीर्राई में सम्मान सहित का अधिकार, आधा प्रदेश, मधेशी सेना, मधेशी पुलिस, मधेशी शासक की तलाश कर रही है, वहीं भ्रष्टाचारजन्य क्रियाकलाप में मधेशी कर्मचारी अव्वल दिखते हैं।
किशोरी ने २०६९ साल से नेपाली नागरिकता प्राप्त करने के लिए दर-दर की ठोकरें खाई। इलाका प्रशासन कार्यालय नरैनापुर ने नागरिकता देने के लिए हर दिन एक नई नौटंकी रची। प्रशासन में कार्यरत कर्मचारी शैलेन्द्र कुमार कर्ण्र्ााे किशोरी के सामने २ शर्तें रखीं। कान्ति यादव ने हिमालिनीको बताया पहली शर्त- इलाका प्रशासन कार्यालय नरैनापुर में तत्कालीन कार्यरत कर्मचारी शैलेन्द्र कुमार कर्ण्र्ाा १० विघा जमीन माँगा। दूसरी शर्त- किशोरीको अपने खास ब्यक्तिसे शसादी करने के लिए दबाव दिया, जिस का आडियो टेप हिमालिनी को भी प्राप्त हुआ।
किशोरी कान्ति यादव से जब रिश्वत माँगने का सिलसिला बढ्ता गया तो उसने भ्रष्ट और नैतिकताविहीन कर्मचारियों के चेहरे बेनकाब करने की मुहिम छेडÞी। कान्ति यादव ने २०७०।४।२१ गते न्याय की उम्मीद लेकर २४ निकायों को लिख भेजा कि उसके साथ क्या हो रहा है। अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग, मन्त्री परिषद कार्यालय, जिला प्रशासन बाँके, सहित के निकायों में उसने अपने दास्तान लिख भेजा और इन निकायों ने तत्काल एक्सन लेते हुए नागरिकता देने का निर्देशन दिया।
निर्देशन के भी दिन बीतते गए और नागरिकता प्राप्त करने की कोशिश जारी रही। प्रमुख जिला अधिकार जीवन कुमार वली ने किशोरी से मिल कर उसे नागरिकता देने का आश्वासन दिया। आवश्यक सहयोग करते हुये जिला अधिकारी ने तत्काल इलाका प्रशासन प्रमुख महेन्द्र जंग शाही को नागरिकता के लिए आवश्यक कागजात तयार कर नागरिकता देने का निर्देश दिया। किशोरी कान्ति यादव ने बताया कि जब वह नागरिकता लेने नेपालगन्ज से ४० किलोमीटर दूर इलाका प्रशासन कार्यालय नरैनापुर पहुँची तो इलाका प्रशासन प्रमुख महेन्द्र जंग शाही ने सरजमीन के लिए पाँच लोगों को लाने का आदेश दिया।
पाँच लोगों के सरजमीन के बाद ८ लोगों को लाने का आदेश दिया और हद तो तब हो गई जब एक हप्ते काठमांडू सैर के बाद लौटे प्रशासन प्रमुख शाही ने फिरसे १० लोगों को लानेका आदेश दिया और सहयोग के लिए किशोरी के साथ कार्यालय में पहुँचे मटेहिया-४ के स्थानीय मानव अधिकार कार्यकर्ता रामजी यादव को २ घण्टे हिरासत में रख दिया।
रामजी यादव ने आपबीती हिमालिनी से बताया कि भ्रष्टाचार की कडÞी इतनी मजबूत है कि नागरिकता प्राप्त करना इतना आसान नहीं। यादव ने कहा- ‘लडÞकी को  पिछले १ वर्षसे विभिन्न बहानों पर सताया जा रहा है। मैं उसकी आन्तरिक समस्याओं को समझने के लिए पहुँचा था। प्रशासन प्रमुख शाही ने कानून और शिष्टाचा को अपने दोनों पैरो से कुचलतु हुए मुझे हिरासत में ले लिया।’ स्थानीय स्तर पर गहमा गहमी बढÞी और यादव को २ घण्टे बाद छोडÞ दिया गया। जब एक मानवअधिकार कार्यकर्ता के साथ यह आलम है तो आम आदमी की औकात क्या होगी यह अब बताना आवश्यक नहीं रहा।
क्या है समस्या –
कान्ति यादव ने बताया कि उसके पिता पारस नाथ यादव का सन् २००१ में एच.आई.भी./एड्स संक्रमण के कारण निधन हो गया और दादा दादी का सन् २००३ में। किशोरी की उम्र ८ साल थी, जब उस की माँ केशरानी यादव सन् २००५ में हुलासपर्ुवा गाँव के इबरार अहमद शाह और इनायत अली शाह के साथ उपचार कराने भारत स्थित बहर्राईच गई थी। उसी समय से किशोरी की माँ का पता नहीं है। इबरार अहमद शाह और इनायत अली शाह खुलेआम घूम रहे हैं। लेकिन प्रशासन की नजर उनपर नहीं पडÞती। परिवार में कोई सदस्य जीवित नहोने के कारण नाबालक अवस्था में कान्ति यादव को उसके मामा ने अपने घर में शरण दिया और उसकी माँ की तलाश जारी रखी। इसी दौरान इबरार अहमद शाह ने केशरानी यादव की २० बिघा जमीन मिति २०६७।१२।२८ गते रजिष्ट्रेशन नं.५३२८/क से अपने नाम कर ली। जमीन पास करने के लिए आवश्यक कागजात मटेहिया गाबिस कि सिफारिस में हेरफेर कर नकली कागजों के दमपर करिब ३६ लाख रुपए की जमीन र्साईं ने हथिया लिया और केशरानी का नाम निशान मिटा दिया। बाँकी बची जमीन पर प्रशासनिक निकाय के कर्मचारियों की बदनीयत है और बस इसी कारण नागरिकता नहीं बनाया जा रहा। कान्ति यादव ने बताया कि वह अब तक ३ बार अनुसूची फारम भर चुकी है। लेकिन हर बार नई समस्या आ जाती है। सिर्फबहाने बनाए जा रहे हैं, कान्ति यादव ने हिमालिनी से बातचीत में बताया।
कितने चेहरे हुए बेनकाब –
हिमालिनी ने जब अन्दर के पहलुओं पर नजर डÞाली तो चैनल इतना बडÞा मिला कि इन को झेलने में आम आदमी की सारी उमर गुजर जाएगी। हमारे सूत्रों ने बताया कि केशरानी यादव भी एच.आई.भी की चपेट में थी, लिहाजा उसे भी इस संक्रमण से निजात पाने के लिए स्थानीय जुनकीरी नामक संस्था से दवा लेना पडÞता था। आरोपी इबरार अहमद शाह लगातार जुनकीरी की मिली भगत में केशरानी यादव को दवाएँ खिलाता रहा और उस संस्था के कर्मचारियों ने पारिवारिक सदस्यों को सूचना नहीं दी। संस्था के कोर्डर्ीीटर युद्ध पछाही और कार्यालय सहायक श्रीराम चौधरी का जो कनेक्सन था, वह हिमालिनी टीम को हैरान कर देने वाला था। कोर्डर्ीीटर पछाही से जब केशरानी का विवरण मागा गया तो पहले उन्होने देने से मना कर दिया। लेकिन जब मरीजों का अभिलेख मागा गया तो सहायक चौधरी ने अपनी ब्यक्तिगत डायरी से सारे विवरण दिए। मतलब अभिलेख में केशरानी यादव नाम का कोई मरीज नहीं था। सन २००८ में केशरानी यादव जुनकीरी संस्था के सर्म्पर्क में आई और २३ मार्च २०१२ से १९ अप्रिल २०१२ तक लगातार संक्रमण की ए.भी.आर.दवा लिया, जिस का अभिलेख संस्था के पास नहीं है।र्
कई दिनों की रस्सा-कसी के बाद जब पता चला कि केशरानी यादव ने भेरी अंचल अस्पताल नेपालगन्ज में भी उपचार कराया है तो आवश्यक विवरण के लिए हिमालिनी टीम वहाँ भी पहुँची। सामान्य सूचना के लिए करीब २ हप्ते लगे और फिर पता चला कि केशरानी यादव अब इस दुनिया में नहीं है। अस्पताल प्रमुख पीताम्बर सुवेदी के अनुसार न् द्यिभिभमष्लन ९एीध्ज्ब्० के कारण २०६८।१२।२७ में उपचार के लिए भर्ना हर्ुइ यादव का २०६९।१।७ में मृत्यु हो गई। फिर भी सवाल कई थे, उपचार कौन करा रहा था – लाश किधर गई – अन्तिम संस्कार हुआ या कहीं लाश फेंकी गई – आखिर कोई रहस्य नहीं था तो इबरार शाह ने मौत को क्यो गोप्य रखा – लेकिन अस्पताल के पास कोई जवाब नहीं था। अस्पताल के रेकार्ड में हेरफेर हुआ और जब केशरानी के उपचार में प्रयोग की गई दवाएँ और अभिलेख मांगे गए तो वह भी नदारद था। अस्पताल को तो यह भी नहीं पता कि किस रूम में किस बेडÞ पर केशरानी का उपचार हुआ था।
कान्ति यादव का घर स्थानीय लच्छु यादव और रुपा यादव ने कब्जा किया है और बाँकी बची जमीन करिब २० बिघे पर मटेहिया-८ निवासी मैकु पठान तथा मटेहिया-७ निवासी भगोले उर्फहरिराम यादवका कब्जा है। इन सभी ने यह दावा किया कि उन्हों ने केशरानी यादव को आवश्यक रकम दिया है। इस विषय पर जिला अदालत बाँके में कई मुकदमे चल रहे हैं।
क्या कहती है स्थानीय सरकार –
जितना आवश्यक कागजात चहिए सभी कागजात कान्ति यादव के पास है। मटेहिया गाबिस सचिव मोहम्मद इस्माइल खाँ ने कहा- नागरिकता न प्राप्त होना ही एक मात्र समस्या है। गाबिस कार्यालय ने नाता प्रमाणित से लेकर सिफारिस तक की सभी कागजातों को मुहैया करवाया है लेकिन नागरिकता नहीं मिल रही है।
सूत्रों के मुताबिक आचरण सही न होने के कारण जमीन माग करने के आरोपी कर्मचारी शैलेन्द्र कुमार कर्ण्र्ााो प्रशासन ने २०७० बैशाख में ही जिला में बुला लिया है। कर्ण्र्ााे जिला प्रशासन कार्यालय बाँके में अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत कर उसमें जिक्र किया हैं कि उन्हे प+mसाया जा रहा है। जब उनसे हिमालिनी ने पूछा कि आखिर आप को कौन और क्यों प+mसा रहा है – उन का जवाब था- कुछ गलतियाँ तो हर्ुइ हैं जिन्हे मैं दुहराना नहीं चाहता। हजार सही काम में एकाध गलतियाँ हो जाती है, यह समान्य वात है। कर्ण्र्ााे आगे कहा- नागरिकता देना जिला अधिकारीका काम है। मैं तो एक निम्नस्तर का कर्मचारी हूँ। उन्हो ने प+mसाने वालों का नाम उल्लेख नहीं किया। उन्होने आग्रह किया कि कृपया उन्हे परेशान न किया जाए।
आपने तो मानव अधिकार कार्यकर्ता को भी नहीं बक्सा – यह सवाल जब इलाका प्रशासन कार्यालय नरैनापुर के प्रमुख महेन्द्रजंग शाही से किया गया तो उनका कहना था- कार्यालय सम्बन्धी काम के लिए कार्यालय समय में बात किया जा सकता है, रात में ९ बजे फोन पर धम्की देने का आरोप लगाते हुए शाही ने कहा पुलिस र्सजमीन हो रही है, नागरिकता सम्बन्धी प्रक्रिया पूरा होते ही उसे नागरिकता दी जाएगी, अब समस्या कुछ नहीं है।
क्या कान्ति यादवको नागरिकता मिलेगी – आम नागरिक कैसे झेल पाएगा इतनी समस्याएँ – कौन है- जिसकी नजर अब भी कान्ति की सम्पत्ति पर है – क्या न्याय तक पहुँच पाएगा कान्तिका मिसन – सवाल कई हैं। अगर प्रक्रिया पूरा होते ही नागरिकता देने का प्रावधान है तो नजर क्यों नहीं आता – ऐसे कई प्रश्न हैं जिन का जवाब आना बाँकी है। स्थानीय स्तर के लोगों को इस भ्रष्ट कर्मचारी तन्त्र के विरुद्ध खुलकर सामने आने की जरूरत है ताकि उन्हे पता चले की रिश्वत का अर्थ क्या होता है। िि
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