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नागरिक एक ही है, चाहे डा.केसी हों या विकास तिवारी शीघ्र कार्यवाही होनी चाहिए : श्वेता दीप्ति

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श्वेता दीप्ति , काठमांडू ,६ दिसम्बर | ये लोकतंत्र है जहाँ अमीर और गरीब दोनों के जान की कीमत एक ही है क्योंकि हम लोकतंत्र में जी रहे हैं । जहाँ मौलिक अधिकार सभी के लिए एक जैसे होते हैं यह सर्वविदित है । त्रिभुवनविश्वविद्यालय के निकाय चिकित्सा विज्ञान संस्थान में हो रहे अनियमितताओं को लेकर डा. केसी कई बार अनशन कर चुके हैं । एक सार्थक और सही लडाई है उनकी । जब भी वो अनशन में जाते है. तो सबका ध्यान उस ओर स्वाभाविक रुप से जाता है और सभी मिलकर सरकार पर यह दवाब बनाते हैं कि समस्या का समाधान हो ।

इसी सन्दर्भ में एक चर्चा की अपेक्षा है यहाँ । सप्तरी के राजविराज में सगरमाथा अंचल अस्पताल के आगे गरीबों के स्वास्थ्य उपचार में हो रहे अनियमितता और गड़बड़ी के विरुद्ध अस्पताल में सुधार करने की मांग रखते हुए १४ दिनों से सद्भावना पार्टी (गजेन्द्रवादी) के अध्यक्ष विकास तिवारी अनशन कर रहे हैं । किन्तु यह विडम्बना ही है देश की कि इस ओर किसी ने भी ध्यान देने की आवश्यकता महसूस नहीं की है । न ही सम्बन्धित निकाय इस ओर ध्यान दे रहा है, न ही मानवअधिकार वाले ने आवश्यकता महसूस की है और नही सरकार की कोई दिलचस्पी है । जान की कीमत हर व्यक्ति की होती है और इसका खयाल रखने की जिम्मेदारी ओहदेदारों की होती है । संचार माध्यम ने भी अब तक इसे पर्याप्त जगह नहीं दिया है । बात एक छोटे से कस्बे की हो, किसी एक समाज की हो, एक जिले की हो या फिर सम्पूर्ण राष्ट्र की हो उस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता होती है । सडकों पर जब भीड उतरती है तो उसका विरोध होता है, चौक चौराहे पर टायर जलते हैं तो उसका विरोध होता है, अपनी बात सरकार तक पहुँचाने के लिए जब बंद की घोषणा होती है तो उसका विरोध होता है और यह विरोध जायज भी है । क्योंकि इन सारी बातों से अव्यवस्था होती है जो हमारी दिनचर्या को बाधित करती है । किन्तु अगर ऐसा न हो तो सरकार या सम्बन्धित निकाय तक जनता की आवाज पहुँचती ही नहीं है ।

मजबूरन जनता को यह राह चुननी पड़ती है नहीं तो उदाहरण हमारे सामने है कि अगर एक अकेला विकास तिवारी जैसा व्यक्ति व्यवस्था के खिलाफ भूख हड़ताल कर रहा है, आमरण अनशन कर रहा है तो उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है । ऐसे में एक आम व्यक्ति कौन सी राह चुने ? अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ अगर आवाज उठाने की साहस किसी ने की है तो समाज का फर्ज बनता है कि उसका साथ दें और सम्बन्धित निकाय पर दवाब बनाए । शिकायत दर्ज करने और तत्काल कार्यवाही होने की सम्भावना हमारी व्यवस्था में तो सम्भव ही नहीं है मजबूरन जनता को अपनी बात ध्यानाकर्षण कराने के लिए अनशन या आन्दोलन की राह को चुनना पडता है । सरकार और सम्बन्धित निकाय से अनुरोध है कि इस विषय पर ध्यान दें नागरिक एक ही है और उसके मूल्य भी एक ही है, वो चाहे डा.केसी हों या विकास तिवारी । एक व्यक्ति बिना किसी औषधि उपचार के अपने जीवन को दाँव पर लगाए हुए है, उनकी माँग क्या है और निदान क्या है यथाशीघ्र इस ओर कार्यवाही होनी चाहिए ।

 

 

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