नाग (नेता) मुक्त देश : बिम्मी शर्मा

 बिम्मी शर्मा, काठमांडू , ८ अगस्त |

इस देश को खुलाशौच मुक्त करने के लिए स्थानीय निकाय और आम जनता बडे जोर–शोर से लगे हुए हैं । समाचार आता रहता है कि फंला जिले को शौच मुक्त कर दिया गया । कभी क्षेत्र, गाँव, कस्बा व शहर ही शौच मुक्त हो जाता है । जिस देश मे गरीब जनता को खाने के लाले पड़े हुएं हो वंहाँ पर शौच मुक्त क्षेत्र की घोषणा अपने आप में हास्यास्पद है । जनता को भूख और रोग मुक्त तो बना नहीं सकते पर शौच मुक्त जरुर बनाएँगें । जब पेट में अन्न ही नहीं पडेगा तो शौच मुक्त स्वतः हो ही जाएगा । इस देश को सब से पहले नाग जैसे डसने वाले नेताओं से मुक्त होना जरुरी है ।

“भूखे पेट भजन ना होए गोपाला, चाहे ले लो कंठी माला” । जब भूखे पेट से भजन या गीत नहीं गाया जा सकता तो शौच कहां से होगी ? हां खाना न मिलने से आंत में गड़बड़ी के कारण कब्जियत जरुर हो सकता है । जिन नाग जैसे विषैले नेताओं के कारण देश दिन प्रतिदिन रसातल में जा रहा है वहां इन से मुक्त होना कोई नही चाहता । बस गरीबी हटाने के बहाने से गरीब को ही हटा दो । हो गया टंटा साफ । न रहेगा बांस न बजेगी बांसूरी ।

महंगाई इतनी ज्यादा बढा दो कि भूखे बैठ्ने की नौबत आए । देश के नागरिक सगरमाथा कभी चढ़ नहीं पाएँगें । पर महंगाइ प्रत्येक दिन चढ़ाई करते हुए सगरमाथा की चोटी पर विराज गई है । देश की जनता महंगाई को दूर से ही देवी मान कर दर्शन कर लेते है । महंगाई सच में देवी है जो धनिक, सेठों व नेताओं के घर में ही पूजी जाती है । नेता खुद ही काला बजारी और तस्करी को न्यौता दे कर घर में मेंहमान की तरह खातिरदारी करते हंै और महंगाई को अपने सर पर बिठा लेते हैं ।

नाग या सांप तो एक बार डसता है । पर ये नेता हमें बार–बार डसते हैं । हर बार हमलोग इन्हें दूध की जगह अपना वोट दे कर पालते हैं । पर अंत में यह हमारे वोटरुपी विश्वास को ही ठग कर डसते हैं । दूसरे देशों मे लोग आस्तीन में सांप पालते है पर हम नेताओं को पाल रहे है वह भी वोट और नोट (टैक्स) दे कर । वर्षों से सिहं दरवार में हम ६०१ साँपों को पाल कर विषैला बना रहे है । नाग तो प्रकृति के मित्र व रक्षक होते हैं पर यह सांप जैसे नेता हमारे रक्षक होना तो दूर की बात यह भक्षक बन कर हमें डर रहे है । जनता इनके विषैले डंक से तिलमिला कर भी सब कुछ सह रही है ।

संविधान और संघियता का बीन बना कर बजाया जा रहा हैं । नाग जैसे नेता इस की धुन पर नाच रहे हैं । इसी बहाने यह नाग अर्बौ रुपएं का दूध चाट चूके है । तब भी इन का मन नहीं भरा है । यह चाहते है कभी भूकंप के बहाने से, कभी पुननिर्माण के बहाने से और मधेश आंदोलन के बहाने से दूध या तर चाट्ने को मिलता रहे । जनता तो वैसे ही भूखी है उसे नयां नयां नारा और आश्वासन दे दो । वह बच्चे के झुनझुने की तरह उसी को बजा कर मस्त और व्यस्त रहेगी और दूसरों को भी बहलाएगी । जनता के लिए खुला शौचमुक्त क्षेत्र है ही भरमाने के लिए । नगां आदमी नहाएगा क्या और निचोडेÞगा क्या ? गरीब जनता को खाने को मिलता ही कितना है जो वह शौच जाएगी ? गरीबी खुद ही एक बिमारी है जिसे पाल, पोस कर सरकार देश को ही भिखमंगो का देश बना रही है ।

जनता के दिए वोट में ही शायद कुछ खोट है । इसी लिए हर बार गलत नेता चुन कर संसद में चले जाते है । एक बच्चे को पैदा होने में ९ महिना लगता है । पर हमारे यहां नौ महिनों में सरकारों का तख्ता पलट जाता है । नेता जनता के लिए नेतागिरी नहीं करता है । खुद के लिए सत्ता हथियाने के लिए कुर्सी पछाड़ का दादागिरी खेल खेलता है । इस खेल में जो पार्टी या पक्ष जीता वह सिकंदर और हारने वाली विपक्षी पार्टी बंदर कहलाती है । यह पब्लिक है सब जानती है पर मौन साध कर बैठी है ।

नेता और उन के कार्यकर्ता की नीयत में कितनी खोट है यह इसी बात से पता चलता है कि यह छोटे, छोटे सामान चुरा कर या गायब कर के अपने खोटी नीयत को सार्वजनिक करते है । जनता के दिए हुए टैक्स के पैसे से प्रधानमंत्री निवास का चूल्हा जलता है । और उसी चूल्हे और खाना बनाने वाले वर्तनों को प्रधानमंत्री निवास बालुवाटार से चुरा लिया जाता है । समाचार भी बनता है फंला, फंला पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं नें वह बर्तन चुराया । पर इस पर न नेता, न सरकार न दल किसी का भी ध्यान नहीं जाता या वह कारवाही नहीं करते । बस जनता ही इस में बंदर की तरह उछल कुद कर के हाय तौबा मचाती है ।

सरकार तो नींद मे है बर्तन गायब हुआ तो क्या हुआ दूसरा आ जाएगा । पैसा देने के लिए जनता की खून पसीने की गाढ़ी कमाई है ही । मच्छर की तरह जनता का खून चूस कर मोटे हो जाओ । अभी सिर्फ प्रधानमंत्री निवास बालुवाटार से वर्तन ही गायब हुए हैं या चुरा लिए गए हैं । कहीं ऐसा न हो कि सिहं दरवार से संविधान ही गायब हो जाए ? और संविधान का रक्षक यह सरकार बस देखता भर रह जाए ? जो एक वर्तन नहीं संभाल सकता वह संविधान को क्या खाक संभालेगा ? संविधान का रक्षक पार्टी और इनके नेता बर्तनों के भक्षक बन बैठे हैं ।

जहां से माल मिले, खाओ उड़ाओ और मस्त रहो । यही नेता और इनके दल का वाद और मेनिफेस्टो है । रहना और राज करना इस देश में है और अपनी पार्टी का नाम और वाद विदेशों से आयात करते है । कहने को तो यह खुद को क्रान्तिकारी कहते हैं । पर है यह असल में ख्रान्तिकारी हैं और जनता के लिए भ्रान्तिकारी है । इस देश को नाग से नहीं नेताओं से मूक्ति की जरुरत है । जिस दिन यह देश नेता मुक्त बनेगा उसी दिन यह भ्रष्टाचार, बेईमानी और अव्यवस्था से भी मुक्त हो जाएगा । इस के लिए जनता को सावधान हो जाना चाहिए । जब यह नेता गण चुनाव के समय में आप के द्धार पर वोट मागंने आए तब इन को वोट के बदले इन कि मीठी वाणी से लपलपाते फन पर चोट करना चाहिए । इन की नीयत में खोट है इसी लिए दीजिए इन्हें वोट नहीं चोट । (व्यग्ंय)

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