नारी व्यथा ः छाउपड़ी प्रथा

लक्ष्मी जोशी
यूँ तो संसार के सारे समाजों में माहवारी (mभलकतभगबतष्यल) को एक विशेष अवस्था के रूप में देखा जाता है । यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है । खासकर यह प्रक्रिया किशोरावस्था में प्रवेश करने वाली १० से १६ साल की नवकिशोरियों के शरीर में होनेवाले सामान्य हर्मोन परिवर्तन से प्रारम्भ होती है, जो चक्र के रूप में प्रत्येक महीने ५÷६ दिन तक लगभग ५० से ५२ साल तक निरन्तर चलती रहती है । युरोपियन मुल्कों में इस प्रक्रिया को सामान्य शारीरिक परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है, लेकिन एशियन मुल्कों में इसे धर्म और संस्कार से जोर दिया जाता है । जिसके कारण महिलाओं को ५–६ दिन तक पुजा, पाठ करने, मठ–मन्दिरों में प्रवेश करने एवं सामान्य दैनिक कामकाज करने पर भी रोक लगा दी जाती है । इस तरह के असामान्य व्यवहार से महिलाओं की मानसिकता पर बुुरा प्रभाव पड़ता है । जिससे वह अपने आप को पुरुषों की तुलना में कमजोर एवं अयोग्य समझने लगती है । महिलाओं की इसी अवस्था का फायदा उठाकर परुषवादी सोच रखने वाले पुरुषों ने वैदिक काल में होने वाले उसके उपनयन संस्कार एवं वेदपुराण वाचन करने पर रोक लगा दिया और धीरे–धीरे उसकी इन्हीं कमजोरियों को हथियार बनाकर वैदिक काल की उसकी प्रतिष्ठा को अपदस्थ करके पुरुषवादी सत्ता को स्थापित किया । तब से लेकर आज तक पुरुष अपने–आपको संसार का श्रेष्ठ प्राणी मानता आया है और अपने सर्वस्व को कायम रखने के लिए कभी धर्म की आड़ पर कभी परम्परा की आड़ पर तो कभी अपने पशुबल से महिलाओं पर नियन्त्रण बनाए हुए है । इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण नेपाल के सुदूरपश्चिम में यथावत छाउपड़ी प्रथा है ।
सूदुरपश्चिम की भाषा (डोटेली) में छाउ का अर्थ ‘अछूत’ होता है । अछूत यानी छूने के लिए वर्जित की जाने वाली अवस्था । सुदूरपश्चिम के लगभग सभी जातियों में यह प्रथा पाई जाती है । अन्य जातियों की तुलना में ब्राह्मण जाति के लोग इस प्रथा को अधिक प्रश्रय देते है । हिन्दू धर्म की मान्यता अनुसार रजस्वला के समय में महिलाएं अपवित्र (अशुद्ध) होती है, अतः इन दिनों उनके द्वारा या उन्हें छू कर किया गया कोई भी कार्य अशुद्ध एवं अपवित्र होता है, जिसे करने पर उन्हें पाप का भागीदार बनना पड़ेगा । इसी धार्मिक मान्यता के कारण सूदुरपश्चिम में छाउपड़ी प्रथा जड़ जमाकर बैठी हुई है और यहाँ की महिलाओं का जीवन अत्यन्त कष्टकर बना दिया है । छाउपड़ी में छाउ यानी रजस्वला होते ही विवाहित एवं अविवाहित महिलाओं को ५–६ दिन तक घर से दूर गोठ अथवा छाउ होने पर रहने के लिए बनाए गए छोटे से अव्यवस्थित एवं असुरक्षित झोंपड़े में रहने के लिए भेज दिया जाता है । इस दौरान महिलाओं को पेड़ पौधें लगायत किसी भी चीज को छूने की अनुमति नहीं दी जाती है । सार्वजनिक स्थालों जैसे स्कूल, कॉलेज, मठ, मन्दिर, जलाशय आदि जगहों पर आना–जाना बर्जित किया जाता है । ५–६ दिन तक पोषक तत्व जैसे दूध, दही, घी, छाछ महिलाएं खा नहीं सकती । इस प्रथा में विवाहित महिलाओं की तुलना में अविवाहित लड़कियों के मासिक श्राव का अधिक दोष माना जाता है । पहली बार मासिक श्राव होने वाली लड़कियों को २२ दिन तक रसोई एवं पूजा घर में प्रवेश करने नहीं दिया जाता । ५–६ दिन तक स्कूल, कॉलेज, दोस्तो से मिलना–जुलना खेलना, कूदना बंद कराके पिता, भाई और सूर्य की दृष्टि तक न पड़ने वाली जगह पर घर से दूर ५–६ दिन तक रखा जाता है । माना जाता है कि पहली बार रजस्वला होने वाली कुमारी कन्याओं की दृष्टि इन पर पड़ने से अशुभ होता है । इस तरह का व्यवहार केवल रजस्वला होने वाली महिलाओं के साथ ही नहीं बल्कि प्रसुति होने वाली महिलाओं के साथ भी किया जाता है । इससे माँ और नवजात शिशु पर हमेशा खतरा बना रहता है । सुदूरपश्चिम में छाउपड़ी प्रथा सम्बन्धी कार्यरत विभिन्न संघ–संस्थाओं के द्वारा किए गए तथ्यांक संकलन के अनुसार यह प्रमाणित होता है कि सुदूरपश्चिम के विकट जिलों में प्रति वर्ष ५–६ महिलाओं की मृत्यु इसी छाउपड़ी प्रथा के कारण होती है । किसी की मृत्यु जंगली जानवरों के आक्रमण से, किसी की साँप के काटने से तो किसी की सरसफाई की कमी के कारण संक्रमण फैलने से होती है ।
इस तरह का भयानक एवं अमानवीय वातावरण उनके परिवार वाले ही सृजित करते है । न जाने कितनी महिलाएं इस प्रथा का शिकार हुई । धर्म, संस्कृति, परम्परा मानव द्वारा निर्मित है मानव ने इन्हें अपनी सुविधा के लिए निर्मित किया है, परन्तु आज अवस्था ये है कि धर्म, संस्कृति, परम्परा मानव के जीवन से अधिक मूल्यवान हो गई है । मानव का यह व्यवहार अवश्य ही उसके अन्धाविश्वास एवं अज्ञानता का सूचक है । २१वीं शताब्दी के प्रारम्भ में जहां महिलाएँ हर क्षेत्र में पुरुषों से प्रतिस्पर्धा कर रही है । वही सुदूरपश्चिम की महिलाएँ अपने ही परिवार द्वारा की कई अमानवीय यातना सहने पर बाध्य है । अपने ऊपर हो रहे अत्याचार का विरोध करने तक का साहस नहीं जुटा पा रही है । ऐसी अवस्था में महिला उत्थान एवं राष्ट्र निर्माण अभियान में जुटे हुए लोगों का सहयोग इनके लिए आवश्यक है । सुदूरपश्चिम में कार्यरत सरकारी तथा गैर सरकारी संरचनाओं ने कुछ हद तक इस कुप्रथा उन्मूलन के सम्बन्ध में जनचेतना फैलाने का काम किया है । साथ ही स्थानीय स्तर से ही आवाज उठाकर इस कुप्रथा उन्मुलन के लिए सरकार समक्ष पैरवी भी की है । इसी आधार पर नेपाल सरकार ने छाउपड़ी प्रथा उन्मुलन सम्बन्धी निर्देशिका २०६४ लागू किया । २०७२ साल में सर्वोच्च अदालत ने इसे कुप्रथा घोषणा किया । नेपाल सरकार के अन्तरिम संविधान में भी महिला सम्बन्धी घोषणापत्र ने यह उल्लेख किया गया कि लिंगभेद दण्डनीय अपराध है । कही पर ऐसी अवस्था देखी जाने पर अभियुक्त पर कडी कारवाही की जाएगी । संयुक्त राष्ट्रसंघ के मानव अधिकार सम्बन्धी घोषणापत्र में भी यह उल्लेख किया गया है कि लिंग के आधार पर किसी के साथ भी किया गया भेदभाव अमानवीय है । यह मानव अधिकार का उल्लंघन है । अधिकार और संरक्षण के बाद भी आवस्था में कोई सुधार न आ पाना एक बहुत बड़ा सवाल है समाज तथा राष्ट्र के समक्ष ।
महिलाओं की ऐसी दयनीय अवस्था में सुधार लाने के लिए सर्वप्रथम पीडि़त महिलाओं को स्वयं जागरुक होना होगा । अपने अन्दर की भीरुता का अन्त कर निडर होकर अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों का खुल कर विरोध करने की क्षमता का विकास करना होगा । वैदिक काल से जो धर्म और परम्परा के नाम पर पाप और पुण्य का डर दिखाकर महिलाओं का जो शोषण होता आया है, उसके लिए महिलाओं को तर्क का हथियार निर्माण करना होगा जो सिर्फ शिक्षा से सम्भव है । धर्म, संस्कृति और परम्परा का हस्तान्तरण अनिवार्य है मनुष्यों में अच्छा आचरण एवं नैतिकता बनाये रखने के लिए, परन्तु उसमें निहित कुरुतियों एवं कुसंस्कारों को हटाकर मानव उपयोगी तत्व का ही हस्तान्तरण किया जाए तो यह मानव विकास एवं राष्ट्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कर सकता है ।
आत्मनिर्भरता आवश्यक है समाज में बढते हुए महिला पुरुष बीच के विभेद का अन्त करने के लिए महिलाओं की अवस्था में सुधार लाने के लिए । परन्तु आधुनिक समाज महिलाओं के लिए समान अवसर की मांग करता हुआ आगे बढ़ रहा है जबकि यहाँ समान दृष्टि का ही अभाव दिखाई देता है, अतः जब तक समान दृष्टि का विकास नहीं होगा, तब तक समान अवसर कोई मायने नहीं रखता । राज्य को अपने दीर्घकालीन योजनाओं में महिलाओं की शिक्षा, उसके अधिकार, उसकी स्वतन्त्रता, उसकी स्वावलम्बनता को अनिवार्य रूप में समावेश करके उसे कार्यान्वयन करना राज्य का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए । जब तक राज्य इन सब चीजों के प्रति संवेदनशील नहीं होगा, तब तक विकास की कल्पना असम्भव है ।

Loading...
%d bloggers like this: