नारी शक्ति नए समय में नई चुनौतियां

कुमार सच्चिदानन्द:विश्व विश्रुत कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर को गीतांजलि पर साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला । टैगोर की इन कविताओं में एक दिव्य एवं व्यापक सौन्दर्यानुभूति के दर्शन होते हैं । उन्होंने सौर्न्दर्य को आध्यात्मिक रूप प्रदान किया और अपने दिव्य नेत्रों से विश्व व्यापी सौर्न्दर्य की वह झलक देखी जो कण-कण में विद्यमान है, सत्य है, अखंड है, शाश्वत है और जिसमें भोग और त्याग का पर्ूण्ा सामंजस्य है । इसी विश्वव्यापी सौर्न्दर्य के उपासक होने के कारण वे संसार में ब्रहृम की झलक देखते

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नारी शक्ति नए समय में नई चुनौतियां

थे, संसार को सत्य बतलाते थे तथा भोग और त्याग के सामंजस्य में  अथवा प्रवृत्ति और निवृत्ति के समन्वय में ही जीवन की र्सार्थकता सिद्ध करते थे । नारी को सृष्टि की सबसे सुन्दर संरचना कही गयी है क्योंकि उसकी जीवन-यात्रा में ‘अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी’ से लेकर ‘तुमुल कोलाहल में मैं हृदय की बात रे मन’ तक की यात्रा है । इसकी इस तरह की विरोधाभासी जीवन-यात्रा के मूल में एक ओर हमारी एकांगी प्रवृत्तिमार्गी चेतना है, जो सौर्न्दर्य के इस उपादान को किसी न किसी तरह भोगना चाहता है दूसरी ओर हमारी परम्परावादी सामाजिक संंरचना एवं पुरुषसत्तात्मक मनोवैज्ञानिक सोच है जो उसकी सत्ता को पूरी तरह कबूल करने में कतराती है ।
प्रत्येक वर्ष८ फरवरी को हम ‘विश्व नारी दिवस’ मनाते हैं । इसे मनाने का चाहे कारण जो भी रहा हो लेकिन इतना तो माना ही जा सकता है कि जो वर्ग उपेक्षित होता है और जिसकी ओर समाज का, राष्ट्र का ध्यान आकषिर्त करना होता है, उसी को आधार मानकर विशेष दिवस भी मनाया जाता है । विश्व की आधी आवादी महिलाओं की है । शारीरिक रूप से ये पुरुषों की तुलना में अबला मानी जाती हंै, शारीरिक संरचना भी इनकी पुरुषों की तुलना में जटिल होती है । कभी धर्म की आड में, कभी परम्परा की आडÞ में, कभी पारिवारिक-सामाजिक मर्यादा की आडÞ में महिलाओं को युग-युग से पुरुषों की ज्यादितियों का, उसकी उपेक्षा का शिकार होना पडÞा है । समाज के इस वर्ग की ओर लोगों का ध्यान आकषिर्त करने, उनकी समस्याओं के प्रति संवेदनशील होने के उद्देश्य से हम इस दिवस को मनाते हैं । यह सच है कि आज हम इक्कीसवीं शताब्दी में जी रहे हैं । महिलाओं के प्रति समाज के पारम्परिक दृष्टिकोण में परिवर्तन अवश्य आया है लेकिन आज भी किसी न किसी रूप में उन्हें असमानता, हिंसा, उपेक्षा का शिकार होना ही पडÞता है ।
पिछले दिनों जिस समय न केवल दिल्ली वरन् पूरा भारत ‘दामिनी बलात्कार काण्ड’ पर तप रहा था और बलात्कार की बढÞती घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिडÞा हुआ था, लगभग उसी समय त्रिभुवन अन्तर्रर्ाा्रीय विमानस्थल पर सउदी अरब से लौट रही भोजपुर की युवती को प्रहरी और अध्यागमन के कर्मचारियों ने लूटा । एक ने उसका धन लूटा और ओर दूसरे ने उसकी अस्मिता भी लूटी । इन्हीं घटनाओं के क्रम में बारा में घर से ट्यूसन पढÞने सुबह-सुबह निकली बिन्दु ठाकुर जली हर्ुइ अवस्था में पायी गयी और इस हत्या का रहस्य अभी भी बरकरार है । इससे पर्ूव वर्दिया के शिवा हासमी को नृशंस रूप में जिन्दा जलाया गया । ऐसी अनेक घटनाएँ हैं जिन्होंने संचार माध्यमों में जगह पायी इसलिए हम इससे रू-ब-रू हुए । लेकिन हमारे आसपास ऐसी भी घटनाएँ घटित होती हैं जो या तो दब जाती हैं या दबा दी जाती हैं । निश्चित ही इन घटनाओं के पीछे हमारी पारम्परिक मानसिकता, कुण्ठित यौनचेतना और महिलाओं को अबला समझने का मनोविज्ञान है ।
इन कठिनाइयों के बावजूद अच्छी बात यह है कि समय के साथ साथ महिलाओं की अवस्था में भी परिवर्त्तन आया है जिस में वह खुद को पत्नी, माँ, सहेली, प्रेयसी आदि परम्परागत सम्बन्धों से आगे कुछ नया महसूस कर रही है । अपने अंदरुनी आत्मविश्वास तथा आत्म निर्भरता को दर्शाने वाला परिवेश उनकी पहली पसंद है । उनके बनने सँवरने में भी आत्मविश्वास का पुट झलकता है । परम्परागत मेंहदी रचाने के साथ-साथ अब उनका आकर्षा टैटू की ओर भी दृष्टिगत होता है । यह बदलता हुआ परिवेश ही हैै कि वह रिश्तों की सीख प्राइम टाइम सीरियलों से लेने लगी हैं और पति के पीछे-पीछे चलने की जगह खुद हालीडेज पैकेट बनाने लगी हैं और परेशानी से घिरने पर अपनी आवाज भी उठाने लगी हैं । इन परिवर्तनों का कुछ नकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिलता है । समाज में रोमांस, सेक्स, झूठ, दिलों का जुडÞना और टूटना धडÞल्ले से चल रहा है । विवाहेत्तर सम्बन्ध और हाईटेक रिश्तों के कारण विश्वासघात भी बढÞा है । आज की महिलाओं में छोटे कद या साँवले रंग के कारण किसी प्रकार का काँम्पलेक्स नहीं । उनके व्यक्तित्व का आकर्षा अब आत्मविश्वास भरे मुस्कुराहट में झलकता है । आज वह पुरुषों की अनुगामिनी नहीं बल्कि सहगामिनी है । उसके साथ-साथ कदम मिलाकर यात्रा करती है और आवश्यकता पडÞने पर अपने अधिकारों के लिए लडÞती भी है ।
आँकडÞे गवाह हैं कि नेपाल में आधी से अधिक जनसंख्या महिलाओं की है । लेकिन इस देश का दर्ुभाग्य है कि लगभग सत्तर प्रतिशत महिलाएँ गरीबी रेखा से नीचे अपना जीवन गुजारने के लिए विवश हैं । यहाँ के श्रम बाजार में सक्रिय जनसंख्या में ६०.५ प्रतिशत महिलाओं की ही सहभागिता है । लेकिन यह सहभागिता मात्र कृषि के क्षेत्र में ही देखने को मिलती है । शिक्षा के अभाव में अन्य क्षेत्रों में महिलाओं की उपस्थिति न्यून है । कृषि क्षेत्र में व्यापक संलग्नता के बावजूद भूमि पर इनका स्वामित्व कम है । यह सच है कि महिलाओं के अधिकारों के लिए दर्जनों कानून हैं और अनेक संघ संस्थाएँ उन्हें अधिकार दिलाने के लिए कार्यरत हैं, लेकिन इसका लाभ कुछ गिनी-चुनी महिलाओं को ही मिला है ।
आज महिलाओं के सामाजिक रूप में अवमूल्यन का सबसे बडÞा कारण दहेज जैसी घातक पारम्परिक प्रथाएँ हैं, जिसके कारण एक ओर तो महिलाओं को पारिवारिक और सामाजिक धरातल पर तनावों से गुजरना होता है दूसरी ओर मनोवैज्ञानिक हीनता-बोध से भी गुजरना होता है । इसके कुपरिणामों के रूप में कभी-कभी हत्या, आत्महत्या और आत्मदाह तक की स्थितियों से उन्हें गुजरना होता है । यह सच है कि इसके विरुद्ध कानून हैं लेकिन कानून को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है । दहेज हमारे समाज में प्रतिष्ठा के मानदण्ड के रूप में अभी भी स्थापित है और इसे इस रूप में बरकरार रखने में पुरुषों के अतिरिक्त महिलाओं की भी भूमिका कम नहीं । आवश्यकता है इस क्षेत्र में कानून की दोषियों तक सही पहुँच और हमारे समाज के मनेविज्ञान में परिवर्त्तन ।
आज स्त्रियों के अस्तित्व पर सबसे बडÞी चुनौती है- भ्रूणहत्या । जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर भ्रूणहत्या आज जघन्य अपराध नहीं माना जा रहा । शहरों से लेकर गाँव-गाँव तक इसके संजाल फैले हुए हैं । दिनानुदिन इस क्षेत्र में विज्ञान और तकनीक का विकास इसे सहज और सुलभ बनाता जा रहा है । लेकिन कहीं न कहीं इस प्रविधि का दुरुपयोग भी हो रहा है और इसका उपयोग कन्या भ्रूण की हत्या के लिए विशेष रूप से किया जाता है । निश्चय ही कन्याओं के इस जन्म के अधिकार को हनन करने में महिलाओं की भूमिका अधिक सक्रिय होती है और इस क्षेत्र में महिला चिकित्सकों का भी योगदान अधिक होता है । सम्भ्रान्त पुरुष इस अपराध से स्वयं को अलग नहीं रख पाते । इस धरातल पर महिलाएँ इसलिए प्रोत्साहित होती हैं क्योंकि वह पुत्रहीनता के तानों को नहीं झेलना चाहतीं और पुरुष दहेज या भविष्य के असुरक्षा-बोध से ग्रसित होकर उनके इस कदम को प्रश्रय देते हैं । यद्यपि यह प्रथा पहले भी किसी न किसी रूप में विद्यमान थी । कहा जाता है कि पुराने जमाने में कन्याओं को जन्म लेते ही परमधाम भेज दिया जाता था । आज ऐसी हत्याएँ कम होती हैं परन्तु किसी न किसी रूप में इस तरह की भ्रूण हत्या वर्षों पर्ूव प्रचलित जन्म लेते ही मार देने की प्रथा की ही यह आधुनिक कडÞी है ।
यह सच है कि आज समय बदला है, मूल्य बदले हैं और समाज में महिलाओं की स्थिति में भी परिवर्त्तन आया है । असुरक्षा का भाव घटा है । कार्यक्षेत्रों में उसकी भागीदारी बढÞी है और सडÞकों पर उसकी उपस्थिति भी बढÞी है । यही स्थिति उन असामाजिक तत्वों को प्रोत्साहित करती है जिनमें महिलाओं के भोग की नकारात्मक प्रवृत्ति होती है और वे पाशविक रूप में उनका यौन शोषण करते हैं या करना चाहते हैं । इसी नकारात्मक और पाशविक प्रवत्ति का चरमोत्कर्षहै- आए दिन होनेवाली बलात्कार की घटनाएँ । हमें यह कबूल करना ही चाहिए कि बलात्कार या यौन शोषण की जितनी घटनाएँ प्रकाश में आती हैं वे बहुत कम हैं । क्योंकि अधिकांश घटनाओं को लोक-लाज या बदनामी के भय से छुपा दिया जाता है । इस सर्न्दर्भ में कहा जा सकता है कि पारम्परिक कानूनों से ऐसे अपराधों की घटनाओं में कमी नहीं लायी जा सकती । इसके लिए नए सिरे से सोचना होगा और ऐसा संयन्त्र विकसित करना होगा जिससे न तो इस कानून का दुरुपयोग हो और न ही अपराधी इसके पाश से बच सकें ।
आज का एक कटु यथार्थ यह भी है कि देश की बिगडÞती अर्थव्यवस्था और अस्थिर राजनैतिक अवस्था के कारण एक साथ इस देश को प्रतिभा-पलायन के साथ-साथ श्रम-पलायन की स्थिति से भी गुजरना पडÞ रहा । अपनी आर्थिक अवस्था के सुधार के लिए आज नेपाल की महिलाएँ पुरुषों के साथ-साथ सक्रिय हैं । अपने गाँवों को छोडÞ शहरों की ओर वे आती हैं जहाँ उनपर गिद्ध-दृष्टि रखने वालों की कमी नहीं होती और एक तरह से वे अनैतिक आचार में लिप्त हो जाती हंै । इतना ही नहीं आज नेपाल की महिलाएँ अपने बेहतर आर्थिक भविष्य के लिए घरेलू कामदार के रूप में सही-गलत तरीके से विदेशों की यात्रा करती है, जहाँ उनहें श्रम-शोषण से लेकर यौन-शोषण तक की त्रासदी से गुजरना होता है । इस क्षेत्र की अवस्था ऐसी है कि इसे कम से कम सम्मानजनक तो नहीं कहा जा सकता । मगर आर्श्चर्य है कि सरकार तथ्यों से अवगत होकर भी इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठा पा रही ।
यह कहा जा सकता है कि आज की नारी पुरुषों की आश्रति नहीं, वह माँ, बहन, पत्नी या प्रेमिका मात्र नहीं, उनका स्वतंत्र व्यक्तित्व भी है जिसकी बदौलत आज वह महत्वपर्ूण्ा पदों को सुशोभित करती है । लेकिन ऐसे उदाहरणों को लेकर उनकी स्थिति के सुधार की दिशा में हमें सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए । उन्हें सामाजिक सम्मान दिलाने की दिशा में चुनौतियाँ आज भी हैं । इस दिशा में प्रथमतः महिलाओं को सचेत होना ही होगा और समाज के उस मनोविज्ञान पर आघात करना होगा जिससे किसी न किसी रूप में महिला मात्र के अपमान का बोध हो । पुरुषों का दायित्व यह है कि नए सन्दर्भों में महिलाओं के सम्बन्ध में पारम्परिक मान्यताओं को खण्डित करने में व्यवहार और चिंतन के आधार पर अपना योगदान दें ।

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