नारी हिंसा: आखिर कब तब ?

मनोज बनैता :नेपाली समाज मे पुरुष को मुखिया मानने वाला रिवाज सदियों से चला आ रहा है । यहाँ के लोगों में खास करके पुरुष को प्रधान मानने की प्रवृत्ति मुख्य रूप से देखी जा सकती है । अगर गाँव का परिवेश, स्थानीय लोगाें की दृष्टिकोण, घरपरिवार के लोगों की सोच, शिक्षा आदि में बदलाव नहीं आया तो महिला वर्ग के स्तर में उन्नति होना असम्भव है । महिला हिंसा न्युनिकरण के लिए संञ्चार माध्यम द्वारा प्रसारित कार्यक्रम और सड़क नाटक से भी मनचाही उपलब्धियाँ हासिल नही हो सकी हंै । अगर मधेशी महिला की बात करें तो देह सिहरा देने वाली सच्चाई से हम अपना मुँह मोड़ नहीं सकेंगे । अधिकतर घरों मे बेटी को बोझ के रूप में लिया जा रहा है । मधेशीयों को एक अच्छी गोरी चिट्टी पत्नी चाहिए मगर बेटी नही । मधेशी समाज में व्याप्त रहे दहेज की प्रथा ने तो और हद कर दी है । सरकार ने कानून का तो निर्माण किया है मगर कार्यान्वयन शुन्य के बराबर है । आजकल दहेज में मोटर साईकल तो मानो आम सी बात हो गई है । दुलहा चाहे आठवी फेल क्यों ना हो मगर चाहिए सौ या डेढ सौ सिसि का मोटरसाइकल । विवाह पश्चात जब–जब इन्धन खरीदने में आर्थिक दिक्कतें आती हैं तब कोसते हैं अपनी पत्नी को और वहीं से शुरु होता है शोषण और दमन । मेरा एक सवाल है जिस व्यक्ति में अगर खैरात में आए बाईक के लिए ईन्धन जुगाड़ करने की औकात नही तो वे ऐसे चीज माँगते ही क्यों हैं आखिर ? दहेज मांगना ही नहीं देना भी जुर्म है मगर अफसोस मधेश की आवाम अभी तक इस बात को समझने में नाकाम रही है । लाहान का बाईक शो रुम में लगी भीड़ ने हमें इस तरह चौंकया कि हम शो रुम में काम करने वाले एक व्यत्ति, (नाम ना खोलने के शर्त) से पूछ बैठे । उसने कहा कि दहेज के लिए आर्डर किया गया बाईक का प्रेशर इतना है कि हमे क्षणभर के लिए भी साँस लेने की फुरसत नहीं । उन्होंने कहा कि इस फाल्गुन माह में सिर्फ एक शो रूम से करीबन २५० से ३०० बाइक बेची गई । पत्रकार भारती गुप्ता का कहना है कि वैदेशिक रोजगार ने दहेज प्रथा को और एक ऊँचाई दी है । गुप्ता के अनुसार मधेश में शिक्षा की कमी के कारण महिला की हालत गंभीर है । मधेश में अगर शिक्षा की बात करें तो अच्छे खासे शिक्षित लोगाें की लिस्ट हमारे हाथ लगती है मगर महिला की अवस्था की अगर बात करें तो हम अपने आपको परेशानी से घिरे हुए नजर आते हैं । हमारे समाज में अगर कोई महिला के साथ दुव्र्यवहार होता है तो ज्यादातर लोग कानुनी रूप से दोषी को कटघरे में खड़ा करने से बेहतर सामाजिक स्तर में बात मिलाने की कोशिस करता है । जिससे दोषी को और ऐसे ही घटना को अन्जाम देने का हौसला मिलता है ।
लाहान निवासी एक महिला नेतृ रंजिता मण्डल का कहना है कि जगह–जगह पे सिर्फ बड़ा बड़ा होर्डिंग बोर्ड लगाने से महिला हिसां मे कमी आना मुश्किल है । होटल में सेमिनार करने से नहीं बल्कि जनस्तर में महिला एवं पुरुष को जनचेतनामूलक कार्यक्रम में सहभागी कराने से होगी । कितनी मधेशी महिलाएँ बिगड़ती हुई अपने घर के हालात के कारण विष सेवन कर आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाती हंै । एक्कीइसवीं सदी में आने के बाद भी हमारे समुदाय में महिला की अवस्था वही पुरानी वाली है । पता नहीं हमारे समाज के लोग इस बात को क्यूँ नहीं मान रहे हंै कि महिला और पुरुष दोनो ही प्रकृति का बराबर हिस्सा है ? अगर महिला ही ना रही तो कैसे चलेगा वंश ? नेपाल की आधी जनसंख्या महिला की है । मगर अफसोस इस आधी आबादी का सिर्फ कुछ हिस्सा ही शिक्षित है बांकी अशिक्षा के अन्धकार में दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं । नेपाल सरकार को इस ओर ध्यान देना बहुत आवश्यक है । उपेक्षित महिला की अवस्था का सुदृढीकरण और उन्नति देश कोे एक अच्छा मार्ग दे सकता है । शिक्षा के प्रकाश द्वारा सभी महिलाओं का जीवन प्रज्जवलित करना हरेक सरकार का उत्तरदायित्व है । शिक्षा सुलभ होना आवश्यक है । शिक्षा ही केवल एक कड़ी है जो इस देश और समाज को शोषणरहित, हिंसारहित बना सकता है । मधेश लगायत नेपाल के सभी ग्रामीण इलाकों में व्याप्त रुढि़वादी परम्पराओं और कुरीतियों का अंत होना आवश्यक है । अगर बात क्षमता की, की जाए तो महिला कोई भी मामले में पुरुष के साथ बराबरी कर सकती है और वो कुछ दशक से देखा जा चुका है । इसीलिए महिला को अवसर चाहिए क्योंकि महिला पुरुषों से आगे नहीं बल्कि उसके कदम से कदम मिलाकर चलना चाहती है । अगर हम ये अवसर प्रदान करें तब जाकर ही एक अच्छे समाज का निर्माण हो सकता है । जीवित हरेक प्राणी को स्वतन्त्रता चाहिए । हम इस वास्तविकता से भलिभाँति परिचित होते हुए भी महिलाओं को दोयम दर्जे का जीवन व्यतीत करने पर मजबुर करते हैं ये सरासर अन्याय है । महिला केवल एक सौन्दर्य का सामान नहीं बल्कि देश के रीढ की हड्डी है । महिला माँ दुर्गा भी है और सरस्वती भी । ग्रामीण क्षेत्र की महिला में अशिक्षा, परम्परागत और रीतिरिवाज के कारण एकाएक परिवर्तन लाना मुश्किल है परंतु सरकार अगर चाहे तो घरेलुु उधोग तथा सीप विकास के तालिम द्वारा महिला सशक्तिकरण में जोर लगाया जा सकता है । महिला के साथ सहानुभूति नहीं बल्कि हौसला प्रदान करना चाहिए जो कि उन्हें अपनी बुलन्दी की उँचाइयों मे जाने मे कोई दिक्कत ना हो । अतः हम अपने समाज को लैंगिक विभेद से मुक्त करें तब जाकर ही निर्माण होगा हमारे स्वस्थ समाज की आधारशिला ।

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