ना बाबा ! ना बाबा !! बाबा नहीं बनना !!!:
मुकुन्द आचार्य

बुढापे में यह काया अपनी माया खूब दिखाती है । कभी कान दर्द, कभी दाँत दर्द कभी घुटनों में दर्द, कभी कमर दर्द, कभी पेट दर्द, कभी पीठ दर्द-यानी दर्दों से सच्ची दोस्ती हो जाती है । इस बढÞती उम्र में सारी की सारी विमारियाँ थोक भाव में मिल जाती है- हमसफर हमदर्द हो जाती है । रक्तचाप, मधुमेह और दिल की बिमारी तो स्थायी मेहमान बनकर शरीर में काबिज रहती है ।
मैं भी अनेक रोगों का मारा योगासन सीखने एक मित्र के घर पहुँचा । वे मित्र एक पहुँचे हुए योगी की शरण में कई बार पहुँच चुके थे । योग और भोग दोनों में उनकी गहरी पैठ थी । बेचारे आदर्श गृहस्थ जो ठहरे !
मैं जब उनके योगाश्रम -घर) पहुँचा, वे ‘कुक्कुटासन’ कर रहे थे । उनका नन्हामुन्ना सुपुत्र भी ‘कुक्कुटासन’ सीखने के क्रम में मर्ुर्गे की तरह बोल रहा था । शायद मर्ुर्गे की तरह सुबह सबेर ब्रेकफास्ट भी कर लिया हो, क्या पता ! योगी मित्र सनातन यौगिक परम्परा की नींव मजबूत कर रहे थे- बच्चे को योग सीखाकर । मैं भी अनुशासित छात्र की तरह, तकरीबन निर्वस्त्र होकर योग साधने लगा ।
मित्र पुत्र अपने पिता से बोला, ‘पापा ! मैं बडÞा होकर और कुछ भी बन जाऊँ, मगर बाबा नहीं बनेने वाला !’ दालभात में मसुलचन्द की तरह में भी पिता-पुत्र संवाद में घुस पडÞा ‘क्यों बेटे – बाबा नहीं बनना चाहते – बाबा बनने के बहुत सारे फायदे हैं । आजकल टिवी में देखते नहीं हो, हर चैनल में कोई न कोई बाबा कुछ न कुछ बोलते बल्यिाते रहते हैं । अनेक आसन पर भाषण देकर रोगों को लतियाते रहते है । देश-विदेश में सुविधा सम्पन्न बडेÞ-बडेÞ आश्रम बनवाते हैं । दवा-दारू की दूकान भी धडÞल्ले से चलाते हैं ।’
योगी मित्र कुछ बोल नहीं रहे थे । शायद मौनासन में थे । उनका सुपुत्र अपने पिता का लायकी के साथ प्रतिनिधित्व कर रहा था । गर्दभासन में बैठते हुए योगी पुत्र बोलने लगा, ‘ना बाबा ! ना बाबा !! मुझे बाबा नहीं बनना !!!’ “क्यो बेटे, क्यों’ -मैं फिर चहका ।
देखिए न अंकल । आजकल बाबा को पुलिस आतंकवादी की तरह मारती-पीटती है । खदेडÞती है, रातों रात गायब करके मील दूर फेंक आती है । जैसे किसी हिंसक जंगली जानवर को रिहायसी इल्ााके में पकडÞकर जंगल में छोडÞ आते हैं । बाबा के चेले चपाटों की लाठियों से रामधुलाई होती है । पुलिसिया आतंक से बचने के लिए पुलिंग होकर भी स्त्रीलिंग बनकर छुपते-छुपते बाबा को भागना पडÞता है । अंकल इतना जानते हुए भी आप मुझे बाबा बनने को कह रहे हैं ‘ हमारे पापा से कोई दुश्मनी है क्या आपको, जो उनके इकलौते बेटे को इस तरह बिगाडÞने पर लगे हुए हैं ! बचवा एक सांस में बहुत कुछ बोल गया ।
मैंने उपदेश उडेल दिया, ऐसा नहीं कहते बेटे ! सिर्फपेट हिलाने से भगवान नहीं मिलते हैं । भ्रष्टाचार की जडÞों को हिलाना भी तो जनता जनार्दन की सच्ची सेवा है । नेता लोग के भरोसे बैठने से तो देश का बेडÞा गर्त हो जाएया ।
योगी पुत्र गर्दभासन करते करते कुछ कुछ समझदार हो चुका था । लगा मुझे समझाने, अंकल ! योगी को भोगियों की तरह राजनीति में कलाबाजियाँ नहीं दिखानी चाहिए । राजनीति बहुत गन्दी होती है । वह तो काजल की कोठरी है । उ में कैसे भी घुसे, दो चार दाग तो लगना ही है ।
इतने में योगी मित्र हगासन करने के लिए बाथरुम में घुस गए । मैंने सोचा, बेटा जब इतना पकारश है, बाप मूँह खोलेगा तो जलाकर राख कर देगा । पतंजली योगपीठ, हरिद्वार, एलोवेश अनुलोम विलोम, कपालभाती- इन्हीं शब्दों के चुमलाता रहेगा । चलो खिसक लेते हैं ।
मैं भागकर घर आ गया ।

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz