नियमों पर दृढ विश्वास

मनुष्य के लिए शिक्षा का महान् महत्व है, उसके धारण और आचरण का भी महान महत्व है । अतः किसी भी प्रकार की शिक्षा की बात कही जाये, यदि उसके सुनने के साथ ही उसे धारण कर लिया जाय तो बहुत ही शीघ्र काम हो जाय, परंतु यदि सब करके काम में न लाया जाए तो चाहे रोज सुना करे, फिर उसका असर नहीं होता । वही स्थिति अपने लोगों की हो रही है । थोड़ी देर या ज्यादा देर शिक्षा की बात सुनी जाती है, पर उसे कामों में बहुत कम लाया जाता है । एक तो इस दृष्टि से अपने काम में लाये कि यह बात शास्त्र कहते है, इसे महात्मा लोग कहते हैं, तो अपने लोगों को यही करना चाहिये, तिलभर भी उसके आगे पीछे नहीं जाना चाहिये । चाहे जो कुछ भी हो, मामुली बात के लिये भी चाहे प्राण जाय, अपने को वही बात करनी चाहिये जो सुनी और महात्माओं ने बतलायी । यदि इतनी दृढ़ धारणा कर लें तो बहुत जल्दी काम हो जाय और यदि आपने आलस्य के कारण, शरीर के आराम के कारण या किसी भी कारण से अवहेलना कर दी तो वही काम एक तरह से मुश्किल हो जाय ।Godkrishna-hindi magazine
कल हमने महाभारत की कथा पढ़ी, पढ़ कर मन में यह आश्चर्य हुआ कि देखो जरतकारु जो ऋषि है, उनकी स्त्री ने सायंकाल में उन्हें उठा दिया, इसलिये कि उनके सन्ध्या का समय हो गया । वह दोपहर से तीसरे पहर तक सो गये थे । अब वह स्त्री जो है, उसने उन्हें उठा दिया तो वे अपनी स्त्री पर क्रोध करके बोले– तुमने मुझे क्यों उठाया ? उसने कहा– स्वामि सूर्य भगवान् आस्ताचल को जा रहे है, यानी सूर्य अब छिपने वाले है, आपका यह नियम है कि सूर्य के रहते ही सन्ध्या कर लेना । मैं यदि इस समय आपको न उठाती तो आपके धर्म में बाधा आती, इसलिये मैंने आप को उठा दिया । मैंने सोचा कि सूर्य अस्ताचल को जा रहे हैं तो उठा दूँ । तो उन्होंने कहा– मैं सोता रहूँ और सूर्य अस्ताचल चले जाये, यह उनमें सामथ्र्य नहीं है । यह हो ही नहीं सकता । मेरे हृदय में यह निश्चय है कि मैं जब तक उठ कर सन्ध्या नहीं कर लूंगा, सूर्य नहीं छुपेंगे । इतना दृढ़ विश्वास है । तो इसका भाव यह है कि यदि आदमी सूर्य की उपासना करे तो सूर्य की भी उस आदमी की उपासना पर निगाहे रखनी पड़ेगी । ऐसा जिसका नियम है कि सूर्य के रहते ही सन्ध्या करनी है तो सूर्य भी उसके लिये ठहर जाते है । तो यह बात देखने में कितनी आश्चर्य की मालूम देती है । आजकल ऐसा दिखता ही नहीं है कि सूर्य भगवान भी ठहर सके ।
किंतु महाभारत में उसने यही बात कही है । इसी प्रकार से पतिव्रता स्त्री की बात सुनी गयी है । एक पतिव्रता स्त्री ने कहा कि सूर्य उदय होने से यदि मेरे पति ही मर जाय तो सूर्य उदय ही क्यों हो ? सूर्य की चाल बन्द हो गयी और सूर्य ठहर गये । जयद्रथ के लिए सूर्य भगवान ने ऐसी आश्चर्यजनक बात दिखलायी कि जब जयद्रथ मारा गया तो हो–हल्ला मचा कि यह अन्याय हो गया, सूर्य के अस्त होेने पर जयद्रथ मारा गया । भगवान वहां खड़े थे, बोले– सूर्य भगवान अभी मौजूद है, प्रत्यक्ष बात है । सूर्य अभी अस्त नहीं हुए है, वे दीख रहे है । भगवान सृष्टि की रचना करने वाले है, वे चाहे जैसा कर सकते है । भगवान के बिना भी सन्ध्या करने वाले व्यक्ति का प्रभाव और पतिव्रता स्त्री का प्रभाव आपने देखा । किंतु आजकल कोई ऐसा प्रभावशाली व्यक्ति नहीं दिखायी दे रहा है । क्या मालूम सब मर गये परंतु, उस समय ऐसी–ऐसी आश्चर्यजनक बाते होती थी । आपको विश्वास करना चाहिए कि ये बाते जो शास्त्रों में लिखी है, वे ठीक ही है । कोई गलत नहीं है । क्योंकि उस समय के लोग नियम के बड़े पक्के थे । चाहे जो हो, अपने नियम का पालन करते थे और अपने में यह दोष आ गया है कि थोड़ी भी आपत्ति यदि आ गयी तो अपने नियम के वास्ते अलग जा खड़े होते थे ।
शास्त्र के विधान अनुसार किसी प्रकार से भी यदि एक बार भी मदिरा पी ले तो बड़ा भारी दास होता है, इसका शास्त्र विरोध करता है । यदि आप इसका प्रायश्चित करना चाहे तो गायत्री मन्त्र का, जिनका यज्ञोपवीत हो गया, उनको एक हजार जप रोज तीन साल या एक साल तक कम्ती में करने का विधान है । यदि रोज पीये तो सोचो वह कितने वर्ष करे ? अभी के लोगों ने थोड़ा भी आपत्ति आ जा तो लोग उसे बर्दाश्त नहीं कर पाते । झट से अनेकानेक प्रकार की दवा खाना शुरु कर देते । किंतु वे लोग नियम के इतने पक्के थे कि प्राण भले ही चला जाये, परंतु अपने धर्म का त्याग नहीं करते थे । तभी तो धर्म उनको प्रत्यक्ष फल दिखाता था, तो इसमें आश्चर्य मानने की क्या बात है ।
राजा युधिष्ठिर पर भारी से भारी आपत्ति आयी, किन्तु उन्होंने अपने धर्म का त्याग नहीं किया । उसका यह प्रभाव था कि जिस देश में राजा युधिष्ठिर वास करते, उस देश में अकाल नहीं पड़ता, महामारी नहीं आती, दैवी प्रकोप नहीं होते । राजा नहुष ने उससे वार्तालाप किया तो नहुष के पाप का नाश हो गया । अगर आप सत्य कर्म करने वाले व्यक्ति से बातचीत करते हैं, या उनके समझ में रहते हैं तो उनकी प्रत्यक्ष प्रभाव संगत करनेवाले व्यक्ति पर अवश्य पड़ता है । इसलिए शास्त्र में कहा गया है, अगर संगत करे तो सदाचारी से, चुकी न व्यविचारी से । जब युधिष्ठिर रथपर पैर रखते, तब जमीन से रथ के पहिये ऊपर उठ जाते । अपनी आयु भर में एक ही बार वे झूठ बोले । उस झुठ का नतीजा यह हुआ कि उसी दिन उनके रथ के पहिये जमीन पर गिर गये, जिस दिन उन्होंने अश्वत्थामा के मरने के विषय में थोड़ा जबान दबा करके कह दिया कि अश्वथामा तो मरा किंतु मरा हाथी । तो शब्द तो सच कहा, किंतु गुरु दोणाचार्य ने सुना नहीं कि हाथी मरा या मेरा बेटा ही मरा है । उन शब्दों को सुनकर गुरु ने अपने प्राण त्याग दिये । तो ऐसे भी झूठ बोलने का पाप युधिष्ठिर को लगा, क्योंकि दोणाचार्य ने जो समझा वही बात सच मानी गयी । आप किसी को कोई बात कहे और समझाये तो वह जो समझे वही बात सच मानी जाय, वही ठीक है । यदि वह ठीकसे नहीं समझे तो अपने कहने का कोइृ मूल्य नहीं है । अपनी नियत में कोई दोष नहीं होनी चाहिये, शब्द तो कह दिया किंतु यदि वह कपटयुक्त है तो वह मिथ्या है ।
इस प्रकार सत्य के प्रभाव को भी दिखाया है और सत्य के त्याग का प्रभाव भी दिखाया है, इन सब बातों को याद करके अपने नियम पालन में बहुत ही दृढ़ रहना चाहिये । जो व्यक्ति अभी भी नियम पर दृढ़ है और धर्म पर विश्वास हैं तो वही व्यक्ति सफल होता है । चाहे जीवन में कितनी आंधी तुफान क्यों न आवे !

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