नियोजित कालाबाजारी

स्पष्ट रूप से कहा जाए तो मधेश में अधिकार के आन्दोलन को कमजोर ‘कालाबाजारी’ करने वालो ने किया है

कैलाश दास:मधेश और काठमाण्डू की जनता पेट्रोल, डीजल, गैस और खाद्यान्न के अभाव में है । वहीं दूसरी ओर कालाबाजारी का धन्धा खुले आम चल रहा है । चार महीने के मधेश आन्दोलन से अगर सबसे ज्यादा फायदा किसी ने लिया है तो कालाबाजारी करने वालों ने लिया है । स्पष्ट रूप से कहा जाए तो मधेश में अधिकार के आन्दोलन को कमजोर ‘कालाबाजारी’ करने वालो ने किया है ।
संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा मधेश के सरकारी कार्यालय, भन्सार, पुलिस प्रशासन, शैक्षिक संस्थान, न्यायालय अर्थात सरकार के हरेक निकाय को असफल करने में सक्षम तो हुआ, किन्तु मधेश टू काठमाण्डू ब्लैकमार्केटिंग को नियन्त्रण करने में असक्षम सावित हुआ । ऐसा भी नही है कि प्रयास नही हुआ हो । जगह—जगह पर अवरोध और आगजनी कर नष्ट भी किया गया है । परन्तु जो मधेश आन्दोलन की परवाह न कर लाखों कमाना चाहते थे उन्हें हजारों गँवाने का डर नहीं था । एक तरफ जनता को बेरोजगारी, भूखमरी, शिक्षा, व्यापार और लक्ष्य की चिन्ता सता रही है तो दूसरी ओर तस्करी करने वाले इस मौका का फायदा उठाकर लाखों कमाने में लगे हुए हैं । भारतीय सीमा क्षेत्र से साइकल, मोटरसाइकल यहाँ तक की एम्बुलेन्स तक को कालाबाजारी के धन्धे में प्रयोग किया गया है । बन्द, हड़ताल और आन्दोलन की समय सीमा है, किन्तु तस्करी में लगे व्यक्ति के लिए कोई दिन–रात मायने नहीं रखता वो सिर्फ पैसा कमाना चाह रहे हैं । kalabazRI
अगर मधेश से तस्करी नहीं हुआ होता तो आज पहाड में जानेवाले बस,जीप जैसे साधनाें में आदमी की जगह पेट्रोलियम पदार्थ से भरा गैलन नहीं देखने को मिलता । आश्चर्य तो यह है कि न्यूज चैनल और समाचार पत्रो में प्रत्येक दिन तस्करी का समाचार आता है किन्तु उस समाचार का सरकारी तंत्र या निकायों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है । सरकार विहीन मधेश से खुलेआम पहाड़ की ओर तस्करी हो रहा है, किन्तु जहाँ की सरकार असक्षम हो और कहीं ना कहीं उनकी संलग्नता हो वह भला कैसे इस पर नियन्त्रण कर पाएगी ? कभी कभी तो लगता है कि अगर नेपाल सरकार तस्करी नियन्त्रण करने लगे तो उसकी कुर्सी गिरने में दिन तो क्या घण्टे भी नही लगेंगे । क्याेंकि सरकार पेट्रोल, गैस जनता को दे नहीं पा रही है और मधेश से तस्करी बन्द कर दिया जाए तो काठमान्डौ की जनता खुद सरकार के विरुद्ध खड़ी हो जाएगी ।
लगातार बन्द, हड़ताल से पहाड़ी क्षेत्र मे इन्धन और खाद्यान्न सामानों का अभाव है तो दूसरी ओर मधेश के जिला से कालाबाजारी शुरु है । बन्द, हड़ताल और नाका अवरुद्ध के कारण मधेश का ही नहीं देश का जनजीवन प्रभावित है । वहीं मधेश से ही लाखों की संख्या में तस्करी हो रही है । मधेश के नाका से दैनिक हजारों लीटर पेट्रोल, डीजल सहित सामग्री पहाड़ जाता है । मोर्चा के कड़े निगरानी के बावजूद भी छोटे–छोटे रास्ते से एम्बुलेन्स, मोटरसाइकल, साइकल आदि यातायात के साधन में गैलन भर–भरकर पहाड़ी क्षेत्रों में ले जाया जा रहा है ।
मधेशी मोर्चा का कहना है कि भारत से व्यापक मात्रा में पेट्रोल और डीजल कालाबाजारी कर के पहाड़ में ले जाने मे शासक का ही पूर्ण सहयोग है, इसलिए तो इसे कैसे रोका जाए इस विषय पर कभी बहस नहीं हो रही है । बन्द, हड़ताल और नाका अवरुद्ध से सभी क्षेत्र प्रभावित हैं और यही कारण है कि भारत से मधेश भूमि होते हुए पहाड़ में कालाबाजारी जोर शोर से चल रही है । कई बार तो आन्दोलनकारियों ने नियन्त्रण में लेकर नष्ट भी किया है लेकिन इससे कालाबाजारी नियन्त्रित नहीं हो सकती । इसके लिए प्रशासन का सहयोग चाहिए । किन्तु कई जगह तो प्रशासन खुद इसमें संलग्न पाई गई ।
मधेश आन्दोलन के कारण प्रति व्यक्ति ऋण में डूबा हुआ है और कालाबाजारी करने वालों के पौ–बारह हैं । उन्हें कमाने से फुरसत नहीं है । भारत से सस्ते दरों में पेट्रोल, डीजल और अन्य सामान खरीदकर पहाड़ में चार पाँच गुणा ज्यादा लेकर बेचा जा रहा है । मोर्चा द्वारा नाका अवरुद्ध के कारण नेपाल आनेवाला तेल ८५ प्रतिशत कटौती कर दिया गया है । जबकि वार्षिक रूप में १ खर्ब ३० अर्ब का पेट्रोलियम पदार्थ भारत से नेपाल आता है ।
धनुषा, वीरगञ्ज, भैरहवा, विराटनगर नाका के छोटे–छोटे रास्तों से हजारो लीटर पेट्रोल, डीजल और खाना पकानेवाला गैस पहाड़ी क्षेत्र में जाने से वहाँ की अत्यावश्यक सेवा निजी सवारी साधन और सार्वजनिक यातायात सञ्चालन में हैं । तस्करी में संलग्न व्यक्ति पहले अपने घरों में पेट्रोलियम पदार्थ का भण्डारण कर के रखते हंै और फिर महंगी कीमत में बेचते हैं ।
धनुषा—महोत्तरी के भिठ्टामोड, खैरा, जटही, गोबराही, भडरिया सहित दर्जनों छोटे रास्ते हैं जहाँ से तस्कर पेट्रोलियम पदार्थ काठमाण्डौ भेजने का काम कर रहे हैं । आन्दोलनकारी भी धरना में बैठे है परन्तु नियन्त्रण कर पाना बहुत मुश्किल हो रहा है । तस्करी में संलग्न एक व्यक्ति से बातचीत करने पर उन्होंने कहा, ‘ शाम को भारतीय सीमा में पेट्रोल, डीजल, गैस भरकर रखते हंै, और सुबह चार बजे नेपाल आ जाते हैं । लाते वक्त गैस का प्रति सिलिण्डर भारतीय पुलिस एसएसबी को दो से तीन सौ और उसी प्रकार प्रति गैलन डीजल,पेट्रोल का भी देना पड़ता है । उतना ही नहीं कुछ आन्दोलनकारियों को भी मिलाकर रखना पड़ता है । अभी हमारा १२ मोटरसाइकल चल रहा है ।’ मैंने फिर से पूछा, ‘अभी कितना कमा लेते हो’ तो उसने कहा —‘देखिए हमें भारतीय दर से २०÷२५ प्रतिशत एक्स्ट्रा लगता है । हम यहाँ पर खुद्रा में नही थोक में बेचते हैं दो सौ पौने दो सौ का प्रतिलीटर और वह अपने काठमाडौं वाले को चार सौ से ज्यादा में बेचता है ।’ कितना कमा लेते हो ? ‘यह नही पूछिए, हम तीन मोटरसाइकल से कारोवार चालु किए थे अभी १२ मोटरसाइकल चल रहा है ।’
उसी प्रकार वीरगञ्ज—रक्सौंल नाका में भी आन्दोलनकारी धरना में हैं और मोटरसाइकल आन्दोलनकारी के नाम में सीमा पार जा कर पेट्रोलियम पदार्थ लाते हैं । वीरगञ्ज के उद्योगी के अनुसार सिमरा में दो सौ से ज्यादा मोटरसाइकल पेट्रोलियम पदार्थ ढुवानी में लगे हैं । प्रति मोटरसाइकल पर भारत के एसएबी और आन्दोलनकारी भी रकम लिया करते हैं । मधेशी मोर्चा के स्थानीय कार्यकर्ताओं का ही सिर्फ हाथ नहीं है बल्कि सरकारी निकाय की मिलीभगत से भी कालाबाजारी को अंजाम दिया जा रहा है । पेट्रोलियम पदार्थ का कारोबार करनेवाली एक मात्र संस्था नेपाल आयल निगम भी इन्धन का कालोबजारी कर रही है यह बात भी सामने आ चुकी है ।
मोरङ जिला के नौ छोटे भन्सार में से रङ्गेली, मायागन्ज डाइनिया, मधुमल्ला, तरिगामा, कदमाहा, चुन्नीबारी, डोरिया और महदेवा गाविस से तस्करी हो रहा है ।
कहाँ से शुरु हुआ कालाबाजारी का धन्धा
चार दलीय सत्ता गठबन्धन (एमाले, काँग्रेस, एमाओवादी, फोरम लोकतान्त्रिक) ने १६ बुँदे समझौता किया । जिस समझौते में एक भी मधेश नेतृत्वकर्ता को नही रखा गया । यहाँ तक कि १६ बुँदे समझौता मधेश के विभेद में था । बारम्बार मधेश नेतृत्वकर्ताओं ने इसका विरोध किया । इसके बावजूद भी दलीय गठबन्धन ने एक न सुनी । बाध्य होकर २०७२ साउन २९ गते मधेश में आन्दोलन शुरु हो गया । सत्ता गठबन्धन दल ने उस समय भी मधेशी जनता और नेतृत्वकर्ताओं का वास्ता नहीं करते हुए भादौ ४ गते प्रारम्भिक मसौदा को मधेश के जिला में लाया । जिससे मधेश आन्दोलन ने और भी उग्र रूप लिया ।
एक महीना तक मधेश में शान्तिपूर्ण आन्दोलन हुआ परन्तु सरकार ने किसी प्रकार की दिलचस्पी नहीं दिखाई । मधेश का प्रत्येक क्षेत्र प्रभावित होता गया और सरकार नीन्द की गोली खाकर सोई रही । इससे मधेश का आन्दोलन कमजोर बनता गया । अधिकार के आन्दोलन को सरकार द्वारा अनदेखा करना मधेश नेतृत्वकर्ताओ के लिए चुनौती बन गई । तब संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा ने निर्णय लिया कि भारत नाका अवरोध किया जाए । मोर्चा का कहना था कि मधेश में कलकारखाना, व्यापार, शिक्षण संस्था, यातायात बन्द है और सरकार दीपावली मना रही है । आखिर क्यो नही नाका अवरुद्ध किया जाए जिससे उसका भी दाना पानी बन्द हो जाए । जबकि अपने ही देश में नाका अवरुद्ध करना न्यायोचित नहीं है । इससे अपने ही देश की जनता प्रभावित होती है । लेकिन कहते है कि ‘मरता क्या नहीं करता’ । एक महीना तक मधेश बन्द रहा, यहाँ की बेरोजगार जनता इन्तजार करती रही कि सरकार अब मधेश के माँग को सम्बोधन करेगी, तब करेगी । परन्तु उस वक्त न तो पहाड़ की जनता ने सरकार के ऊपर दवाव दिया और न ही सरकार ने कोई सही कदम उठाया ।
मधेश की आक्रोशित जनता जमकर नाका अवरुद्ध के लिए नेपाल—भारत सीमा नाका में पहुँची । किन्तु सरकार ने मधेशी जनता के साथ जानवर से भी बदतर व्यवहार किया । गोलियाँ दागी, लाठी बरसाई गई जिससे आन्दोलन और भयांनक बनता गया । नाका अवरुद्ध से नेपाल में सब कुछ का अभाव होने लगा । जिसका मौका तस्करों ने उठाया, और यही से कालाबाजारी का धन्धा चालु हुआ जिसमें सरकारी निकाय भी साथ दे रहे हैं ।
दो धु्रवों की राजनीति की उपज है कालाबाजारी
मधेश में अधिकार का आन्दोलन चार महीना पार कर चुका है । फिर भी दो ध्रुवों में विभाजित राजनीति और जनता एक दूसरे के ‘हठ’ को स्वीकार करने के लिए राजी नहीं हैं । जबकि मुल्क में आर्थिक, समाजिक, शैक्षिक वातावरण कमजोर बन गया है । दो धु्रवों की राजनीतिक ‘हठ’ के कारण जनता त्राहिमाम है । जहाँ खाना पकाने का गैस, यातायात के लिए पेट्रोल डीजल का अभाव ही नहीं है बल्कि खाने का तेल, चावल, दाल, स्कूल के विद्यार्थियाें के लिए बिस्कुट तक मिलना मुश्किल है ।
दो धु्रवों की राजनीति का मतलव एक जो पहाड़ी समुदाय के हक–हित का संरक्षण कर रहे हैं और दूसरे वो, जो मधेश अधिकार प्राप्ति की लड़ाई में आन्दोलित हैं । हाँ, यह जाहिर है कि पहाड़ की जो राजनीति कर रहे हैं वह शक्तिशाली हंै, उसके पास सत्ता शासन है और मधेश की राजनीति करने वाले मधेशी जनता के बल पर टिके हैं । अगर दोनाें की शक्ति सन्तुलित रहती तो जिस प्रकार पहाड़ी राजनीतिकर्मी ने मधेश में शोषण, दमन, हत्या, हिंसा की कहर ढाली उस स्थिति में गृहयुद्ध निश्चित था ।
मधेश के आन्दोलन ने विश्व का इतिहास को तोड़ा है । आज तक इतना लम्बा आन्दोलन कहीं नहीं हुआ है । फिर क्या वजह है कि आज तक यह निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सका है ? क्यों विश्व समुदाय की दृष्टि इस ओर नहीं जा रही है ? सीमा अवरुद्ध करने के बावजूद मधेशी अपने लक्ष्य की प्राप्ति तक नहीं पहुँच पाए हैं । आखिर आन्दोलनकर्ता या नेतृत्वकर्ता से कहाँ क्या चूक हो गई है कि कोई सटीक निर्णय सामने नहीं आ पा रहा है ? एक ओर खस शासकों की दासता अब मधेश की जनता को स्वीकार नहीं है इसके लिए वो जान की बाजी लगाए हुए हैं । अपना कारोबार, घर सब दाँव पर लगाकर सड़क पर डटे हुए हैं । कितनों ने अपनी जान गँवाई । वहीं दूसरी ओर कुछ मधेशी नेता आज भी काठमान्डौ का मोह त्याग नहीं कर पा रहे हैं । लेकिन आज का सच तो यह है कि मधेश आन्दोलन न तो किसी पार्टी का है और नहीं व्यक्ति विशेष का, यह आन्दोलन वहाँ की जनता की है, जो करो या मरो की लड़ाई लड़ रहे हैं । उनके जेहन में एक ही बात है आज नहीं तो कभी नहीं ।
२०७२ आश्विन ३ गते नेपाल का संविधान आया । उससे पहले अर्थात श्रावन २९ गते से मधेश में बन्द हड़ताल किया जा रहा है । मधेशी जनता पुलिस दमन का शिकार हो रही है परन्तु इन सबके बीच कालाबाजारी करने वालों की मानवता और नैतिकता दोनों मर चुकी है । वो सिर्फ मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं । बड़े बड़े गोदामों में भी पर्याप्त सामान छुपा कर रखे गए हैं और उनका कृत्रिम अभाव दिखाकर अधिक कीमतों पर बेचा जा रहा है । इन सबके बीच हर हाल में बेचारी जनता पिसती है । जीना है तो किसी भी हाल में आवश्यक सामान तो चाहिए । नेताओं की तरह राष्ट्रवाद का नारा लगाकर पेट तो भरा नहीं जा सकता । नेता तो कल भी मालामाल थे और आज भी मालामाल हैं ।
मधेशी जनता आन्दोलन में लाखों की ऋणी हो चुकी है । यहाँ तक कि दैनिक कामकाज कर जीवन यापन करनेवाले भारत पयालन होने लगे हैं । किन्तु इन सबके बीच कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने कालाबाजारी के बल पर करोड़ों कमाया है । नेपाल एक ऐसा देश है जो परनिर्भर है और यहाँ के शासक हमेशा अल्पसंख्यक, दलित, मुस्लिम, मधेशी, थारु समुदाय पर शोषण दमन कर हुकमत करते आए हैं । इनके पास न तो गैस है, न ही पेट्रोलियम पदार्थ । यहाँ तक की खाद्यान्न के लिए भी भारत पर निर्भर होना पड़ता है । अगर शासक में राष्ट्रीयता होती तो वन जंगल का धनी देश आज धरासायी नहीं होता । मधेश आन्दोलन में सरकार की भूमिका निरीह रही इतना ही नही सरकार द्वारा ही कालाबाजारी होना कितनी लज्जास्पद बात है जो नेपाली काँग्रेस का नेता रामचन्द्र पौडेल ने संसद में भी कहा था । उन्होंने तो एमाले की सरकार असफल होने का दावा भी किया । ‘देश डूबता है तो डूब जाने दो, जनता मरती है तो मर जाने दो’ देश और जनता को कंगाल बनाकर फिल्मी शैली में सरकार द्वारा कालाबाजारी के बावजूद भी अगर यहाँ की जनता राष्ट्राद का दावा करती है तो यह एक महज खोखला दावा है ।
जहाँ की जनता गैस के लिए हपm्तों लाइन में लगी हो । दो लीटर पेट्रोल के लिए दो दिन के वाद भी निराश होकर लौटना पड़ता हो । लकड़ी पर खाना पकाने के लिए लकड़ी का बन्दोवस्त हो चुका कहकर हल्ला फैलाने पर भी लकड़ी नहीं मिल पा रही हो । खाने तेल, दाल नहीं मिल रहा हो । वह देश कब तक गतिशील रह सकता है ? सरकार अपनी शासन व्यवस्था टिकाने के लिए अपने सांसद और मन्त्रालय में स्र्किर्टंङ कर ढुवानी करे और जनता को उसी मन्त्रालय के मार्फत कालाबाजारी में समान उपलब्ध कराबे और उस पर आलम तो यह कि इसके बावजूद भी यहाँ की जनता सरकार की जय–जयकार करे । ऐसा सौभाग्य कहाँ के सरकार को मिलेगा ? किसी भी देश के बारे मे ऐसा नहीं सुना है कि सरकार द्वारा ही कालाबाजारी में समान उपलब्ध होता है । यह तो जाहिर है कि सत्ता शासनकर्ता मधेश नेतृत्वकर्ता और मधेशी जनता के साथ विभेद कर रही है किन्तु जो जनता सरकार को मधेश मुद्दो पर कमजोर नहीं होने का बल पहुँचा रही है उसी जनता के साथ सरकार द्वारा कालाबाजारी कहाँ तक न्यायसंगत है ।
हिन्दी में एक कहावत है, ‘भूखे पेट भजन नही होबे’ । नेपाल हिन्दु राष्ट्र था, लेकिन यहाँ के शासक एवं जनता शायद हिन्दु ग्रन्थ का अध्ययन नहीं कर पाई । इसीलिए तो आज नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषणा करना पड़ा । अगर ग्रन्थ का अध्ययन सही मायने में किया गया होता तो यह सच सभी जानते कि जीत हमेशा सच्चाई की हुई है । एक सच इस देश का यह भी है कि इसे दूसरों पर निर्भर रहने की आदत हो गई है । सरकार से अनुरोध है कि इस सच को स्वीकार कीजिए और सुधार लाइए अपनी सोच में तभी कोई दावा कीजिए । कालाबाजारी कर के कब तक जनता की भूख मिटाएँगे ? कोई ठोस निदान सोचिए तभी जिसे आप अपनी जनता मानते हैं वो भी आपका दूर तक साथ निभाएगी । नहीं तो कश्ती को भँवर में लाकर वही डुबाने वाली बनेगी और तभी आप यही कहेंगे हम थे जिनके सहारे. ।
काला झण्डा लगाकर कालाबजारी
मधेश में आन्दोलनरत मोर्चा सहित ने मधेश में कालाबजार बढ़ने पर व्यापक हल्ला मचाया था । सभी तरफ से आरोप प्रत्यारोप लगने पर मोर्चा ने साइकल, मोटरसाइकल सहित के साधनाें पर रोक लगा दिया । इसका भी विरोध जमकर हुआ । क्याेंकि एक तो बन्द हड़ताल दूसरी ओर साधन का अभाव, ऐसे में अत्यावश्यक काम कैसे किया जा सकता है ? यहाँ तक कि बीमारी को अस्पताल तक भेजने का साधन तक नहीं रहा तो मोर्चा ने दूसरा निर्णय किया कि अगर मोटरसाइकल चलाना चाहते हैं तो काला झण्डा लगाकर चला सकते हैं ।
मोर्चा का यह निर्णय बहुत फेमस हुआ । मधेश की जनता अपने अपने साधन में काला झण्डा लगाकर चलाने लगी । उस समय कुछ दिनो के लिए तस्करी तो बन्द रही परन्तु ज्यादा दिन तक नहीं । तस्करी में संलग्न सबसे बड़ा काला झण्डा लगाकर तस्करी करने लगे । तस्करों की गाड़ी के आगे सबसे बड़ा झण्डा और पीछे पेट्रोल डीजल का गैलन । कालाबजारी करनेवालो को काले झण्डे ने और जमकर साथ दिया । मोर्चा का काला झण्डा लगाने के निर्णय का पालन आज भी हो रहा है । मधेश के प्रत्येक मोटरसाइकल, साइकल, जीप, बस चले न चले परन्तु काला झण्डा अवश्य लगा रहता है ।

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