निरणायाक मोड पर मधेशी मोर्चा:

जयप्रकाश गुप्ता

गत जेठ १४ गते हुए ५ सूत्रीय समझौते में मेधशी मोर्चा द्वारा हस्ताक्षर ना किए जाने के बावजूद इसको निर्ण्यक मोडÞ तक लाने में मोर्चा की भूमिका काफी अहम रही । इसलिए अब मोर्चा का दृष्टिकोण व कार्यसूची भी राष्ट्रीय राजनीति में उल्लेखनीय हो सकती है । जेठ १४ गते शान्ति प्रक्रिया के बारे में नेपाली कांग्रेस व एमाले के माधव-ओली गुट ने भी अडान लिया लेकिन मोर्चा द्वारा उस दिन आगे की गई ५ सूत्रीय मांगों से नेपाली सेना में मधेशी समुदाय से १० हजार लोगों का सामूहिक प्रवेश व प्रधानमन्त्री के तत्काल इस्तीफे जैसे निर्ण्ाायक सवाल पर कांग्रेस व एमाले का यही पक्ष किंकतर्व्यविमूढ दिखा । अभी एक बार फिर प्रधानमंत्री का इस्तीफा तथा नई सरकार गठन के बारे में नेपाली कांग्रेस अपने ही दाँव पर इस विषय को और पेंचीदा बना रही है ।
यद्यपि मोर्चा ने खुद को प्रजातांत्रिक गठबंधन में रखा है । यह स्वभाविक भी है । लेकिन इतना कह देने से मोर्चा के कांग्रेस व एमाले के साथ विजातीय गठबंधन में फँस गया है । इस गठबबंधन मे कारण नए संविधान में स्वायत्त मधेश प्रदेश की संरचना संबंधी अपनी प्रतिबद्धता को दरकिनार करने का आरोप भी मोर्चा पर लग रहा है । इसलिए गणतत्र, संघीयता, धर्मनिरपेक्षता, मधेश प्रदेश का सीमांकन व समावेशीकरण जैसे अहम मुद्दों पर कांग्रेस व एमाले के साथ स्पष्ट होना जरुरी है इन विषयों में गणतंत्र, संघीयता और धर्मनिरपेक्षता, जैसे विषयों पर कांग्रेस व एमाले में अभी भी द्विविधा की स्थिति है तो मधेश प्रदेश का सीमांकन व समावेशी के मुद्दे पर तो दोनों पार्टिया मधेशी मोर्चा से लगभग असहमत ही है । लेकिन ये मुद्दे ऐसे हैं जिनके समाप्त होने पर मधेशी दल का अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है । मधेशी मोर्चा की इन मांगों को नजरअंदाज किया गया तो मधेश राजनीति अलगाव का खतरनाक शिकार हो सकती है । राज्य के रुपान्तरण तथा आमूल परिवर्तन के नाम पर बनी मधेशी राजनीतिक दलों का प्रश्न श्रलंका की अमृतालिंगम की पार्टर्ीीी तरह असांदर्भिक हो सकता है । इसकी असंतुष्टि से मधेश सशस्त्र द्वंद्व की चपेट में भी फँस सकता है ।
शांति प्रक्रिया की इमान्दार कार्यान्वयन के लिए इमान्दारी से जुटी मधेशी मोर्चा सहित अन्य परिवर्तनकारी शक्तियाँ कांग्रेस, एमाले जैसे एकात्मक सोच वाली पार्टियाँ तथा एकदलीय कम्यूनिष्ट उग्रवामपंथी माओवादी के बीच फँसी हर्ुइ है । इनमें से कांग्रेस व एमाले के पास परिवर्तन व राज्य रुपांतरण का कोई खास एजेण्डा नहीं है तो माओवादी अग्रगामी परिवर्तन के नारा में एकदलीय अधिनायकवाद थोपने पर जुटी हर्ुइ है । ऐसे में मधेशी मोर्चा इस विषम परिस्थिति में समन्वय की भूमिका में सक्रिय नहीं हर्ुइ तो माओवादी का एकदलीय शासन के खतरा को रोकने के नाम पर यथास्थितिवादियों का पिछलग्गु बनने और माओवादी का पक्ष लेने पर अराजक शासन पद्धति तथा एकदलीय तनाशाही का खतरा बढÞने की संभावना है । दोनों ही तरफ से मधेशी शक्ति को ही नुकसान उठाना पडÞ सकता है ।
मधेशी दलों को मिली मधेशी जनता की रणनीति जनमत को एकबद्ध होकर व्यवहारिक शक्ति के रुप में सकारात्मक ढंग से उपयोग करने पर ही देश को सही दिशा के तरफ ले जाया जा सकता है । इसके लिए मधेशी शक्ति को र्सवप्रथम कुछ आधारभूत सवालों पर सहमत होते हुए भी किसी एक पक्ष का सहयोगी मात्र ना बनकर समस्या समाधान तथा मधेश आन्दोलन की उपलब्धियों की रक्षा के लिए विद्यमान राजनीतिक घटनाक्रम में र्सार्थक हस्तक्षेपकारी पहल करने में जरा भी देरी नहीं करनी चाहिए । मधेशी मोर्चा को इस समय दोनों धार माओवादी और इसके विपरीत रही शक्तियों का प्रक्रियागत विश्लेषण करने की आवश्यकता है ।
-लेखक फोरम गणतांत्रिक का अध्यक्ष हैं ।)

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